पत्रकार ने जब सफ़ेद दाढ़ी वाले बुजुर्ग से पूछा " जब इंसान का दिल साफ है तो ज़ाहिरी दाढ़ी क्यों जरूरी है
दाढ़ी वाले बुजुर्ग ने बड़ा ही बेहतरीन जबाब दिया उन्होंने कहा " जिस तरह बिना वर्दी के भी फौजी, फौजी ही रहता है लेकिन बर्दी इसीलिए पहनी जाती है की देखकर पता चल सके किस फौज का सिपाही है
ठीक उसी तरह ये दाढ़ी हमारे नबी ﷺ की वर्दी ( यूनिफार्म ) है
अगर उत्तर प्रदेश विधानसभा में अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठे सतीश महाना यह कहें कि "जिन्होंने राम मंदिर का विरोध किया, अगर उन्होंने चंदा दिया है तो रसीद दिखाएँ, तब देखेंगे कि उनका पैसा चोरी हुआ या नहीं," तो सवाल सिर्फ़ एक बयान का नहीं, बल्कि विधानसभा की गरिमा का है।
क्या अब कोई चुनी हुई विधानसभा का सदस्य अपनी आस्था के आधार पर चोरी को चोरी भी नहीं कह सकता? क्या अब हत्या को हत्या, डकैती को डकैती कहने से पहले लोगों को अपने मज़हब का हलफ़नामा देना होगा?
फिर यही उसूल वक़्फ़ बोर्डों पर क्यों लागू नहीं होता, जहाँ ग़ैर-मुस्लिमों को ज़बरन शामिल किया जाता है? हिन्दू एंडोमेंट बोर्डों को मिलने वाली संवैधानिक सुरक्षा औक़ाफ़ को क्यों नहीं? और जिस पार्टी का लोकसभा में एक भी मुस्लिम सांसद नहीं है, उसे तीन तलाक़ जैसे असंवैधानिक क़ानून (जो सिर्फ़ मुसलमानों से जुड़ा है) बनाने का अधिकार कैसे मिल जाता है?
अगर उसूल एक है, तो सब पर बराबर लागू होना चाहिए।
यह बिना वर्दी में कौन लोग थे?
इन्होंने युवाओं को बेदर्दी से मारा
क्या यह दिल्ली पुलिस के थे?
कौन थे यह अज्ञात लोग?
भाड़े के गुंडे भी मंगवाये थे क्या मोदी जी?
सीजेपी प्रोटेस्ट को आगे बढ़ाने का काम केजरीवाल ने किया है। उन्होंने एक बार फिर दिखा दिया कि रोड पर उतर कर कैसे राजनीति की जाती है। आज जंतर मंतर मनीष जी और संजय सिंह युवाओं के साथ कंधा से कंधा मिलाकर खड़े रहे।
धर्मेंद्र प्रधान पर कार्रवाई करने के बजाय जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण तरीके से अपने हक़ की आवाज़ उठाने वाले छात्रों पर लाठीचार्ज करवाना प्रधानमंत्री मोदी की कायराना हरकत है, जो बेहद शर्मनाक है।