सांसद हनुमान बेनीवाल का माननीय मुख्यमंत्री श्री भजनलाल शर्मा जी के प्रति दिया गया बयान उनके मानसिक दिवालियापन, बड़बोलेपन और संस्कारहीन राजनीतिक सोच को दर्शाता है। अहंकार के कारण भाषा और विवेक दोनों का संतुलन खो बैठे हैं। सार्वजनिक जीवन में जिस मर्यादा, शिष्टाचार और संयम की अपेक्षा एक जनप्रतिनिधि से की जाती है, उसका पूर्ण अभाव उनके शब्दों में दिखाई देता है।
मुख्यमंत्री श्री भजनलाल शर्मा जी के प्रति अभद्र एवं अमर्यादित भाषा का प्रयोग केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि राजस्थान की जनता और लोकतांत्रिक मूल्यों का अपमान है।
लोकतंत्र में वैचारिक मतभेद स्वाभाविक हैं, लेकिन राजनीति को व्यक्तिगत कटाक्ष, अशोभनीय शब्दों और स्तरहीन बयानबाजी तक गिराना दुर्भाग्यपूर्ण है। राजनीति मुद्दों, विकास और जनहित पर आधारित होनी चाहिए, न कि सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के लिए की जाने वाली बयानबाजी पर। प्रदेश की जनता सब देख रही है और समय आने पर मर्यादा और संस्कारहीन राजनीति का जवाब भी अवश्य देगी।
एक कमी थी, आज पूरी हुई है
सांस्कृतिक रूप से समृद्ध राजस्थान की बोली बोलने वाला कोई चैनल राजस्थान में नहीं था। आज गणगौर टीवी के रूप में इस कमी को पूरा किया गया है। हम राजस्थानी भाषा प्रेमी इस पहल का हार्दिक स्वागत करते हैं और इसे शुरू करने के लिए तहे दिल से आभार व्यक्त करते हैं।
करीब 10-12 साल पहले ईटीवी पर शाम को आधा घंटे का एक समाचार कार्यक्रम शुरू हुआ था जिसमें एंकर राजस्थानी में समाचार पढ़ा करते थे और उस कार्यक्रम के दौरान जितने भी नेताओं या अन्य लोगों के बयान आते थे वे राजस्थानी भाषा में लिए जाते थे।
मेरे जैसे कम समझ वाले लोगों को तब तक यह लगता था कि राजस्थान की अलग-अलग इलाके की बोलियों में बहुत बड़ा फर्क है और इसीलिए हमारे नेता-अधिकारी और अन्य लोग राजस्थानी में बात नहीं करते हैं। लेकिन जब अलग-अलग क्षेत्र के नेताओं के बयान उस चैनल पर सुनना शुरू किया तो समझ में आया कि राजस्थान के अलग-अलग हिस्सों की बोलियों में फर्क तो है लेकिन इतना बड़ा फर्क भी नहीं है कि वह एक दूसरे क्षेत्र के लोगों की समझ में नहीं आए।
बाद में पता नहीं क्यों यह कार्यक्रम बंद कर दिया गया। आज खुशी इस बात की है कि राजस्थानी भाषा साहित्य और संस्कृति को समर्पित एक चैनल शुरू किया गया है और मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने आज इसका विधिवत्त शुभारंभ किया है। मैं चैनल शुरू करने के लिए पवन अरोड़ा जी का धन्यवाद ज्ञापित करता हूं। निश्चित रूप से जब राजस्थानी भाषा में चैनल होंगे तो राजस्थानी भाषा की मान्यता की हमारी मांग को भी बल मिलेगा और एक न एक दिन राजस्थानी भाषा को मान्यता जरूर मिलेगी। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा जी से निवेदन है कि अब राजस्थानी भाषा को राजभाषा बनाने की दिशा में जरूर पहल करें। मान्यता की दिशा में आपका यह एक बड़ा और निर्णायक कदम होगा।
@BhajanlalBjp
कालूराम मीणा जी के सुपुत्र थे श्री नारायण मीणा जी।
श्रीनारायण मीणा जी गांव में सरपंच थे। एक बेटे नमो नारायण मीना जी IPS से रिटायर्ड होकर केंद्र में मंत्री रहे। दूसरे बेटे भवानी सिंह मीणा महाराष्ट्र कैडर से रिटायर्ड IAS।
हरीश मीणा जी IPS थे फिर BJP सांसद बने। एक बेटा ओपी मीणा जी IAS फिर मुख्य सचिव बने। पांचवे बेटे धर्म सिंह मीणा जी कस्टम अधिकारी।हैरानी ये कि आगे भी इनके बच्चों को ST आरक्षण मिलेगा।
अब आप ईमानदारी से बताइए क्या दूर-दराज के क्षेत्रों में रहने वाले भील, भिलाला, सहरिया, गोंड, संथाल, मुंडा, भील, उरांव जैसी जनजातियों के गरीब बच्चे इनसे कंपटीशन कर पाएंगे? सोचिए…..सोचिए……सोचिए…..फिर जवाब दीजिए।
विष्णु तिवारी
फर्ज़ी SC ST केस में 20 साल जेल
परिवार बर्बाद हुआ, माता पिता का निधन
कानूनी लड़ाई लड़ते लड़ते दो भाईयों की मौत
ज़मीन, जायदाद बिक गई
20 साल जेल के बाद हाईकोर्ट से बेकसूर साबित और केस फर्जी निकला।
पिछड़ों को न्याय, GENERAL CASTE से अन्याय की कीमत पर नहीं 🙏🏻
#UGC
"मैं ब्राह्मण समुदाय के सभी जन प्रतिनिधियों से अपील करता हूं कि वे तुरंत इस्तीफा देना शुरू करें"
◆ बरेली सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने कहा
#UGCRegulations | Alankar Agnihotri
UGC के नए नियमों के विरोध में बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया है।
उन्होंने सामान्य श्रेणी के साथ होने वाले भेदभाव का हवाला देते हुए अपना इस्तीफ़ा भेज दिया है।
यह बेहद शर्मनाक है। इतने दिन से मामला पूरे मीडिया में है लेकिन सरकार के कानों में जो तक नहीं रेग रही है।
सीधी सी बात है कि अगर वोट लेते वक्त हिंदू एक है तो सेफ़ है बताते हैं तो कायदे बनाते वक्त जनरल और OBC-SC-ST में बाँटकर वो सेफ्टी क्यों छीन रहे?
जब सब एक होकर सेफ़ हैं हीं तो सवर्णों से ख़तरा क्यों दिखने लगता है?
#UGCRollBack
UGC New Rule Explained 👇🏾
https://t.co/hKytUU6pC7
'करणी सेना की चेतावनी'
अगर UGC का नया नियम वापस नहीं लिया गया।
तो भाजपा कार्यकर्ताओं को दौड़ा-दौड़ाकर मारेंगे।
करणी सेना मध्य प्रदेश ने UGC के नए नियमों का विरोध किया। और प्रधानमंत्री के ग़लत नीतियों का पुतला दहन किया।
#UGC_Roll_Back पर पिछले 24 घंटे में हड़कंप मच चुका है।
- शुभांकर मिश्रा ने वीडियो बनाया
- सुशांत सिन्हा ने वीडियो बनाया
- Zee न्यूज़ ने DNA शो में दिखाया
- ट्विटर पर लगातार ट्रेंडिंग में बना हुआ है
- अब तक कई लाख लोगो ने पोस्ट डाला
- MP निशिकांत दुबे ने सफ़ाई दी
- करनी सेना आंदोलन की तैयारी में जुटी
- अनिल मिश्रा ने वकीलों से मीटिंग की
इधर सवर्ण समाज एकदम एकजुट है। खबर है, मोदी तक यह बात पहुँच चुकी है। 🔥
आरक्षण का पहला और वास्तविक अधिकार उसी को मिलना चाहिए जो वास्तव में गरीब, वंचित और ज़रूरतमंद है न कि उसे जो पहले से ही संपन्न, प्रभावशाली और संसाधनों से युक्त है।यह लड़ाई आसान नहीं है। यह संघर्ष लंबा है और कठिन भी। हमारे सामने कई लोग विपक्ष के रूप में खड़े हैं, जो यथास्थिति बनाए रखना चाहते हैं। परंतु हमें पूर्ण विश्वास है कि हम इस ऐतिहासिक संघर्ष में पीछे नहीं हटेंगे।आज 150 करोड़ की जनसंख्या वाले देश में सरकार को 85 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन देने के लिए मजबूर होना पड़ा है। यह आंकड़ा स्वयं इस बात का प्रमाण है कि देश में गरीबी कितनी गहरी और व्यापक है। जब इतनी बड़ी आबादी आज भी बुनियादी आवश्यकताओं पर निर्भर है, तब आरक्षण जैसी नीतियों का उद्देश्य केवल जाति नहीं, बल्कि गरीबी, भूख और असमानता का उन्मूलन होना चाहिए।
हमारी लड़ाई उन लोगों के लिए है
जो पंक्ति में सबसे अंत में खड़े हैं,
जो आज भी अवसर से वंचित हैं,
जो वास्तव में गरीब, लाचार और ज़रूरतमंद हैं।
गरीबी को मिटाने की यह लड़ाई केवल नीति परिवर्तन की नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, समान अवसर और मानवीय गरिमा की लड़ाई है। यह संघर्ष इतिहास में एक निर्णायक मोड़ सिद्ध होगा।
संघर्ष जारी रहेगा।
संकल्प अडिग है।
और न्याय तक यह यात्रा नहीं रुकेगी।
#न्याय
#गरीबी
#supremecourtofindia
#आरक्षण #जातिगतआरक्षण
भगवान को ये लोग क्या मुँह दिखाएँगे?
दाल पूरी तरह काली है। गुलाब चंद कटारिया का पेपर लीक को लेकर राजस्थान विधानसभा में दिया गया भाषण सुनने के बाद किसी भी व्यक्ति को यह समझने में संदेह नहीं रहेगा कि इन सरकारों ने व्यवस्था का सत्यानाश करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।
इतनी बड़ी गड़बड़ी केवल एक व्यक्ति के बूते की बात नहीं हो सकती। बड़े स्तर की सत्ता-संरक्षण, विश्वास और राजनीतिक शय के बिना कोई अधिकारी इतना साहस नहीं कर सकता।
अब समय आ गया है कि SOG को पूर्णतः स्वतंत्र किया जाए, उसे सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराए जाएँ और पिछले वर्षों में हुई सभी भर्ती परीक्षाओं की अत्यंत गहन जाँच कराई जाए। चाहे दोषी कितना ही बड़ा मगरमच्छ क्यों न हो, उसे सख़्त सज़ा मिलनी चाहिए।
जो भी व्यक्ति अनाधिकृत रूप से नौकरी कर रहा है, वह प्रदेश के लिए कलंक है।
आज मैं अपनी प्रोफाइल पिक्चर (DP) बदलकर #SaveAravalli अभियान का हिस्सा बन रहा हूँ। यह सिर्फ एक फोटो नहीं, एक विरोध है उस नई परिभाषा के खिलाफ जिसके तहत 100 मीटर से कम ऊंचाई वाली पहाड़ियों को 'अरावली' मानने से इंकार किया जा रहा है। मेरा आपसे अनुरोध है कि अपनी प्रोफाइल पिक्चर बदलकर इस अभियान से जुड़ें:
अरावली के संरक्षण को लेकर आए इन बदलावों ने उत्तर भारत के भविष्य पर एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। यह निर्णय हमारे अस्तित्व के लिए खतरनाक है क्योंकि:
1️⃣ मरुस्थल एवं लू के खिलाफ दीवार: अरावली कोई मामूली पहाड़ नहीं, बल्कि कुदरत की बनाई 'ग्रीन वॉल' (Green Wall) है। यह थार रेगिस्तान की रेत और गर्म हवाओं (लू) को दिल्ली, हरियाणा और यूपी के उपजाऊ मैदानों की ओर बढ़ने से रोकती है। अगर छोटी पहाड़ियाँ (Gaping Areas) खनन के लिए खुल गईं, तो रेगिस्तान हमारे दरवाज़े तक आ जाएगा और गर्म हवाएं तापमान को बढ़ा देंगी।
2️⃣ प्रदूषण से रक्षा: ये पहाड़ियाँ और यहाँ के जंगल NCR और आसपास के शहरों के 'फेफड़ों' (Lungs) की तरह काम करते हैं। ये धूल भरी आंधियों (Dust Storms) को रोकते हैं और जानलेवा प्रदूषण को कम करने में सबसे बड़ी भूमिका निभाते हैं। दिल्ली और आसपास के इलाके में अरावली के बावजूद इतनी गंभीर स्थिति है तो अरावली के बिना कैसी स्थिति होगी, उसकी कल्पना करना भी वीभत्स है।
3️⃣ भूजल (Groundwater): अरावली हमारे लिए पानी का मुख्य रिचार्ज ज़ोन है। अरावली की चट्टानें बारिश के पानी को ज़मीन के भीतर भेजकर भूजल रिचार्ज करती हैं। अगर पहाड़ खत्म हुए, तो भविष्य में पीने के पानी की गंभीर कमी का सामना करना पड़ेगा,जिससे वन्यजीव लुप्त होने की कगार पर आ जाएंगे तथा इकोलॉजी को खतरा होगा।
वैज्ञानिक सच यह है कि अरावली एक निरंतर शृंखला (Continuous Chain) है। इसकी छोटी पहाड़ियाँ भी उतनी ही अहम हैं जितनी बड़ी चोटियाँ। अगर दीवार में एक भी ईंट कम हुई, तो सुरक्षा टूट जाएगी।
📢 हमारी अपील:
हम केंद्र सरकार और माननीय सुप्रीम कोर्ट से विनम्र निवेदन करते हैं कि भावी पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य के लिए इस परिभाषा पर पुनर्विचार (Reconsider) करें। अरावली को 'फीते' या 'ऊंचाई' से नहीं, बल्कि इसके 'पर्यावरणीय योगदान' (Ecological Impact) से आंका जाए।
#SaveAravalli
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में ऐसी रिपोर्ट पेश की है जिससे अरावली का दायरा सिमट गया है। अरावली राजस्थान का केवल पर्वत नहीं, हमारा 'रक्षा कवच' है। केंद्र सरकार की सिफारिश पर इसे '100 मीटर' के दायरे में समेटना, प्रदेश की 90% अरावली के 'मृत्यु प्रमाण पत्र' पर हस्ताक्षर करने जैसा है।
सबसे भयावह तथ्य यह है कि राजस्थान की 90% अरावली पहाड़ियाँ 100 मीटर से कम हैं। यदि इन्हें परिभाषा से बाहर कर दिया गया, तो यह केवल नाम बदलना नहीं है, बल्कि कानूनी कवच हटाना है। इसका सीधा मतलब है कि इन क्षेत्रों में अब वन संरक्षण अधिनियम लागू नहीं होगा और खनन बेरोकटोक हो सकेगा।
पहाड़ की परिभाषा उसकी ऊँचाई से नहीं, बल्कि उसकी भूगर्भीय संरचना (Geological Structure) से होती है। एक छोटी चट्टान भी उसी टेक्टोनिक प्लेट और पर्वतमाला का हिस्सा है जो एक ऊंची चोटी है। इसे अलग करना वैज्ञानिक रूप से तर्कहीन है।
अरावली थार रेगिस्तान को आगे बढ़ने से रोकने वाली दीवार है। विशेषज्ञों की चेतावनी है कि 10 से 30 मीटर ऊंची छोटी पहाड़ियां (रिज) भी धूल भरी आंधियों को रोकने में उतनी ही कारगर होती हैं। इन छोटी पहाड़ियों को खनन के लिए खोल देने का मतलब दिल्ली और पूर्वी राजस्थान तक रेगिस्तान को खुद निमंत्रण देना है।
अरावली की चट्टानी संरचना बारिश के पानी को रोकती है और उसे जमीन के भीतर भेजती है। ये पहाड़ियाँ पूरे क्षेत्र में भूजल रिचार्ज का काम करती हैं। इन्हें हटाने का मतलब पहले से ही पानी की कमी से जूझ रहे उत्तर-पश्चिम भारत में सूखे को निमंत्रण देना है।
अरावली वह दीवार है जो पश्चिम से आने वाली जानलेवा 'लू' (Heat Wave) और थार रेगिस्तान को पूर्वी राजस्थान, दिल्ली और उत्तर प्रदेश के उपजाऊ मैदानों में घुसने से रोकती है।
यह फैसला पर्यावरण संरक्षण नहीं, बल्कि खनन माफियाओं के लिए 'रेड कार्पेट' है। थार के रेगिस्तान को दिल्ली तक जाने का निमंत्रण देकर सरकार आने वाली पीढ़ियों के साथ जो अन्याय कर रही है, उसे इतिहास कभी माफ नहीं करेगा।
विडंबना ये है कि सुप्रीम कोर्ट में यह सुनवाई इसलिए शुरू हुई थी ताकि अरावली को स्पष्ट रूप से पहचाना और बचाया जा सके। लेकिन केंद्र सरकार की जिस सिफारिश को कोर्ट ने माना, उसने अरावली के 90% हिस्से को ही तकनीकी रूप से 'गायब' कर दिया।
मैं सुप्रीम कोर्ट से आग्रह करता हूं कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को देखते हुए अपने इस फैसले पर पुनर्विचार करे। यह फैसला सीधा विनाश को निमंत्रण देने वाला है।
#SaveAravalli
दैनिक भास्कर में विधायकों द्वारा 'विधायक निधि' जारी करने के बदले रिश्वत/कमीशन लेने संबंधी प्रकाशित खबर अत्यंत गंभीर और चिंताजनक है।
मुख्यमंत्री श्री @BhajanlalBjp एवं विधानसभा अध्यक्ष श्री @VasudevDevnani को तत्काल इस मामले का संज्ञान लेते हुए इसकी उच्च स्तरीय जांच करवानी चाहिए। जनप्रतिनिधियों के लिए सार्वजनिक जीवन में शुचिता और ईमानदारी सर्वोपरि होनी चाहिए।