दिल को न पूछ मारका-ए-हुस्न-ओ-इश्क़ में
क्या जानिए ग़रीब कहाँ काम आ गया
ये क्या मक़ाम-ए-इश्क़ है ज़ालिम कि इन दिनों
अक्सर तिरे बग़ैर भी आराम आ गया
अहबाब मुझ से क़त-ए-तअल्लुक़ करें 'जिगर'
अब आफ़्ताब-ए-ज़ीस्त लब-ए-बाम आ गया
-जिगर मुरादाबादी
#Artykite#JigarMoradabadi#poetry
है क़हर गर अब भी न बने बात कि उन को
इंकार नहीं और मुझे इबराम बहुत है
ख़ूँ हो के जिगर आँख से टपका नहीं ऐ मर्ग
रहने दे मुझे याँ कि अभी काम बहुत है
होगा कोई ऐसा भी कि 'ग़ालिब' को न जाने
शाइ'र तो वो अच्छा है प बदनाम बहुत है
-मिर्ज़ा ग़ालिब
#artykite#art#urdulovers#ghalib
है क़हर गर अब भी न बने बात कि उन को
इंकार नहीं और मुझे इबराम बहुत है
ख़ूँ हो के जिगर आँख से टपका नहीं ऐ मर्ग
रहने दे मुझे याँ कि अभी काम बहुत है
होगा कोई ऐसा भी कि 'ग़ालिब' को न जाने
शाइ'र तो वो अच्छा है प बदनाम बहुत है
-मिर्ज़ा ग़ालिब
#artykite#art#urdulovers
ये हम जो हिज्र में दीवार-ओ-दर को देखते हैं
कभी सबा को कभी नामा-बर को देखते हैं
वो आए घर में हमारे ख़ुदा की क़ुदरत है
कभी हम उन को कभी अपने घर को देखते हैं
नज़र लगे न कहीं उस के दस्त-ओ-बाज़ू को
ये लोग क्यूँ मिरे ज़ख़्म-ए-जिगर को देखते हैं
-मिर्ज़ा ग़ालिब
#MirzaGhalib