#आओ_जानें_सनातन_को
सनातन धर्म महान है 🚩🚩🙏🙏
📖📖 चारो वेद सनातन धर्म के प्रमुख आधार है।
चारो वेदों मे सनातन परमात्मा कबीर साहेब जी की महिमा की गई है।
హిందూ ధర్మం గొప్పది
#आओ_जानें_सनातन_को
🪴 सनातन धर्म महान 🪴
सनातन धर्म के आधार ग्रंथ ऋग्वेद मण्डल 10 सूक्त 161 मंत्र 2 में लिखा है कि पूर्ण परमात्मा रोगी को स्वस्थ करके 100 वर्ष का जीवन प्रदान कर सकता है।
वर्तमान में Sant Rampal Ji Maharaj सनातन धर्म की भक्ति बता रहे हैं
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जगत कल्याण हेतु वर्तमान समय में केवल सतगुरु रामपाल जी महाराज ही सनातन शास्त्रों होगी (गीता वेद पुराणों) के गूढ़ रहस्यों को उजागर कर पूर्ण मोक्ष की यथार्थ भक्ति विधि प्रदान कर रहे हैं,
హిందూ ధర్మం గొప్పది
#What_Is_Meditation
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मेडिटेशन का सीधा सा अर्थ है लगातार के अभ्यास से अपनी इंद्रियों को नियंत्रित करना।
लेकिन पूर्ण संत इस तरह के अभ्यास को क्षणिक लाभ देने वाला बताते हैं जिसका मोक्ष से कोई लेना देना नहीं है।
🙇🙇
Sant Rampal Ji Maharaj
#What_Is_Meditation
हठयोग करना जैसे एक पैर में खड़ा होकर जप करना व्रत उपवास रहना आदि आदि,
इनसे लाभ किंचित होते है हानि ज्यादा।
Sant Rampal Ji Maharaj जी के ज्ञान को सुने और मन में विचार कर नामदीक्षा लें।
अपना जीवन सफल बनाए।
#What_Is_Meditation
जितने भी संतों ने परमात्मा को पाया है अर्थात मोक्ष प्राप्त किया है।
उन्होंने पूर्ण परमात्मा को पाने का सहज और सरल भक्ति मार्ग बताया है जिसमें काम करते करते नाम (मंत्र) का सुमिरन करना होता है।
यही वास्तविक ध्यान है।
नाम उठत नाम बैठत, नाम सोवत जाग रे।
#What_Is_Meditation
शास्त्र विरुद्ध मनमाना आचरण करने से कोई लाभ नहीं होता है। इस विषय में श्रीमद्भगवत गीता अध्याय 16 श्लोक 23 में कहा गया है कि शास्त्रविधि को त्यागकर जो व्यक्ति मनमाना आचरण करता है उसे न कोई लाभ होता है, न सुख प्राप्त होता है और न ही परमगति यानी मोक्ष मिलता है।
#What_Is_Meditation
पवित्र गीता जी अध्याय 16 श्लोक 23 व 24 में कहां है कि जो पुरुष शास्त्र विधि को त्याग कर मनमाना आचरण करते हैं उनको सुख,शांति ,सिद्धि ,परम गति कुछ भी प्राप्त नहीं होता अर्थात व्यर्थ है l
पवित्र गीता जी के अनुसार
Sant Rampal Ji Maharaj
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हठयोग से न तो परमात्मा मिलता है और न ही जन्म-मृत्यु से मुक्ति मिलती है।
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Sant Rampal Ji Maharaj
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संतमत में परमेश्वर कबीर साहिब जी ने हठयोग/मेडिटेशन नहीं बताया बल्कि सहज समाधि बताया है।
संतों सो सतगुरु मोहि भावै, जो नैनन अलख लखावै। आंख न मूंदे कान न रूंधे, ना अनहद उलझावै।
योग युक्त क्रियाओं से न्यारा, सहज समाधि बतावै।।
#What_Is_Meditation
शास्त्र विरुद्ध मनमाना आचरण करने से कोई लाभ नहीं होता है। इस विषय में श्रीमद्भगवत गीता अध्याय 16 श्लोक 23 में कहा गया है कि शास्त्रविधि को त्यागकर जो व्यक्ति मनमाना आचरण करता है उसे न कोई लाभ होता है, न सुख प्राप्त होता है और न ही परमगति यानी मोक्ष मिलता है।
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गीता अध्याय 17 श्लोक 5 व 6 में मनमाने घोर तप (हठयोग) करने वालों को गीता ज्ञान दाता ने अज्ञानी, आसुर स्वभाव वाले बताया है।
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Sant Rampal Ji Maharaj
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मेडिटेशन करने से शारीरिक सुख मिल सकता है लेकिन आध्यात्मिक लाभ नहीं मिल सकता है। परमात्मा से साक्षात्कार करने वाले संतों ने सहज समाधि बताई है जिसमें चलते–फिरते, उठते–बैठते परमात्मा का नाम सिमरन करना होता है।
Sant Rampal Ji Maharaj
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जिन्हें सत्य भक्ति विधि प्राप्त नहीं वही भोले श्रद्धालु मेडिटेशन की तरफ जाते हैं।
पूर्ण संत की शरण प्राप्त होने के बाद वास्तविक मोक्ष मंत्रों की प्राप्ति हो जाती है जिसके बाद साधक विचलित नहीं होता और मेडिटेशन आदि गलत भक्ति विधियों का त्याग कर देता है।
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गीता अध्याय 5 श्लोक 2 में कहा गया है कि तत्वदर्शी संत न मिलने के कारण वास्तविक भक्ति का ज्ञान न होने से साधकों द्वारा गृहत्याग कर वन में चला जाना या कर्म त्याग कर एक स्थान पर बैठ कर कान, नाक आदि बंद करके या तप आदि करना दोनों ही व्यर्थ हैं अर्थात श्रेयकर नहीं
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हठयोग करना जैसे एक पैर में खड़ा होकर जप करना व्रत उपवास रहना आदि आदि,
इनसे लाभ किंचित होते है हानि ज्यादा।
Sant Rampal Ji Maharaj जी के ज्ञान को सुने और मन में विचार कर नामदीक्षा लें।
अपना जीवन सफल बनाए।
Sant Rampal Ji Maharaj
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गीता अध्याय 5 श्लोक 2 में कहा गया है कि तत्वदर्शी संत न मिलने के कारण वास्तविक भक्ति का ज्ञान न होने से साधकों द्वारा गृहत्याग कर वन में चला जाना या कर्म त्याग कर एक स्थान पर बैठ कर कान, नाक आदि बंद करके या तप आदि करना दोनों ही व्यर्थ हैं अर्थात श्रेयकर नहीं
गीता अध्याय 5 श्लोक 2 में कहा गया है कि तत्वदर्शी संत न मिलने के कारण वास्तविक भक्ति का ज्ञान न होने से साधकों द्वारा गृहत्याग कर वन में चला जाना या कर्म त्याग कर एक स्थान पर बैठ कर कान, नाक आद बंद करके या तप आदि करना दोनो ही व्यर्थ हैं
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मेडिटेशन का सीधा सा अर्थ ह ै लगातार के अभ्यास से अपनी इंद्रियों को नियंत्रित करना। लेकिन पूर्ण संत इस तरह के अभ्यास को क्षणिक लाभ देन े वाला बताते ह ै ं जिसका मोक्ष से कोई लेना देना नहीं है।
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