दिल्ली पुलिस, दिल्ली सरकार के अधीन नहीं केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय के अधीन आती है. गृह मंत्री अमित शाह दिल्ली पुलिस के बॉस हैं.
यह सूचना :
पुष्कर सिंह धामी
अजय भट्ट
अजय टम्टा
रविंद्र नेगी
आदि तमाम भाजपा नेताओं के लिए है, जो दिल्ली पुलिस द्वारा गिरफ्तार शेफ केशव नेगी के इंसाफ दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता से बतिया रहे हैं और बता रहे हैं कि रेखा गुप्ता ने उन्हें केशव नेगी मामले में इंसाफ का आश्वासन दे दिया है.
यह सूचना अनिल बलूनी और त्रिवेंद्र रावत के लिए भी है, जो बात करने में पुलिस कमिश्नर के आगे नहीं बढ़ पाए !
मुख्यमंत्री, सांसद, विधायक गण एवं भाजपा के पधाधिकारी जनो, आपके अपनी पार्टी के बड़े नेताओं से बात करने पर पाबंदी है क्या ? क्या ऐसा कोई अघोषित नियम है कि अमित शाह तो जिससे चाहें, उससे बात कर लेंगे, लेकिन कोई अमित शाह से सीधे बात नहीं कर सकता ? या फिर अमित शाह का नाम सुनके ही आपका हलक सूख जाता है, टांगें कांपने लगती हैं, दिल थरथराने लगता है ?
अंकिता भंडारी हत्याकांड में वीआईपी कौन था या कौन थे, इसको लेकर तीन साल बाद भी लगातार सवाल उठ रहे हैं. अंकिता भंडारी के चैट पढ़ कर स्पष्ट होता है कि वीआईपी एक व्यक्ति नहीं था बल्कि एक से अधिक व्यक्ति थे.
उन तथाकथित वीआईपी लोगों के नाम भी समय- समय पर लिए जाते रहे. अंकिता भंडारी की माता जी ने वीआईपी के तौर पर भाजपा के उत्तराखंड संगठन महामंत्री अजेय कुमार का नाम लिया.
फिर दिसंबर 2025 में जो भाजपा के पूर्व विधायक सुरेश राठौर और उर्मिला सनावर का ऑडियो वायरल हुआ, उसमें भी वीआईपी के तौर पर भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री दुष्यंत कुमार गौतम के साथ ही भाजपा के उत्तराखंड संगठन महामंत्री अजेय कुमार का नाम लिया गया.
इस तरह देखें तो सार्वजनिक तौर पर अजेय कुमार पर दो- तीन बार उक्त संगीन आरोप लगा. लेकिन जब-जब अजेय कुमार का नाम अंकिता भंडारी हत्याकांड में वीआईपी के तौर पर लिया गया तो उन्होंने आरोपों पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी यानि ऐसे गंभीर आरोपों के मामले में सार्वजनिक तौर पर कभी इंकार नहीं किया और ना ही कभी आरोपों को गलत बताया.
यह भी उल्लेखनीय है कि उनसे पहले वाले उत्तराखंड भाजपा के संगठन मंत्री संजय कुमार भी यौन शोषण के आरोपों के बाद हटाए गए थे और आरोप लगाने वाली भाजपा कार्यालय में काम करने वाली युवती थी.
अब खबर आ रही है कि अजेय कुमार को भाजपा ने राजस्थान का संगठन महामंत्री बना दिया है.
अंकिता भंडारी हत्याकांड के वीआईपी होने जैसे गंभीर आरोपों के बाद, न्याय और नैतिकता का तकाजा तो यह है कि अजेय कुमार और उनके साथ दुष्यंत कुमार गौतम को भाजपा सभी पदों से हटा करके इन गंभीर आरोपों में जांच और कानून का सामना करने को कहती. पर न्याय और नैतिकता से भाजपा का दूर- दूर तक कोई वास्ता नहीं है, इसलिए इतने गंभीर आरोपों पर चुप्पी बरतने वाले व्यक्ति को उसने छोटे राज्य से बड़े राज्य के सांगठनिक पद पर भेज दिया है.
जब भाजपा न्याय और नैतिकता को कोई कसौटी नहीं मान रही तो फिर सचेत तो राजस्थान वालों को रहना पड़ेगा. उत्तराखंड में तो अंकिता भंडारी के न्याय का संघर्ष जारी रहेगा, चाहे भाजपा किसी को कहीं भी भेज दे.
नीट का पेपर कभी लीक नहीं होगा, बस एग्जाम का नाम बदलकर VB-NEET RAM G रख दो.
VB-NEET RAM G = विकसित भारत नेशनल एलिजिबिलिटी कम एंट्रेंस टेस्ट रोग एवम मेडिसिन गुरू
@indreshmaikhuri नीट का पेपर कभी लीक नहीं होगा, बस एग्जाम का नाम बदलकर VB-NEET RAM G रख दो.
VB-NEET RAM G = विकसित भारत नेशनल एलिजिबिलिटी कम एंट्रेंस टेस्ट रोग एवम मेडिसिन गुरु
@AshokShrivasta6 मोदी जी ने मूर्खों की फौज जमा की है, गधे, क्लास 5 की मैथ्स पढ़, 10 में से 6 या 7 भी देंगे तो भी तेरे मालिक को 42 से 49 फीसद मिलेंगे, जीतेंगे कैसे।
काठ की हांडियो के बूते चुनावी नियोजन
किसी सकारात्मक टोन के साथ आखरी चुनाव सन 2014 में लड़ा गया था। मुद्दा था- सबका साथ सबका विकास।
सबका विश्वास।
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नरेटिव इकॉनमी पर था। बेहतर प्रबंधन, बेहतर नियोजन, मैक्सिमम गवटनेन्स- मिनिमम गवर्मेन्ट, गुजरात का फ्लोरिडा बन जाना, और उस मॉडल का देश भर में प्रसार कर देने का वादा..
2018 आते आते यह ढह गया। नोटबन्दी ने इकॉनमी के परखच्चे उड़ा दिये। जीएसटी ने गाड़ी उल्टी दिशा में घुमा दी। अब सत्ता में बैठे लोगों को समझ आ गया- दिस इज नॉट अवर कप ऑफ टी।
वे वही करें, जिसमे उनकी मास्टरी है।
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तो कपड़ो से पहचानने का दौर शुरू हुआ। हिन्दू मुस्लिम नरेटिव का स्वाभाविक वृहत्तम लक्ष्य पाकिस्तान होता है। तो वाया पुलवामा, वालाकोट हुआ।
ठीक वोटिंग के पहले।
तो 2019 पाकिस्तान के बूते जीता गया।
लेकिन इकॉनमी कॅरोना के कुप्रबंधन के नीचे चूर चूर हो गयी। और राजनीति का फोकस अनुच्छेद 370, और राम मंदिर के मुद्दों पर टिका रहा। इसी नरेटिव को मजबूत करते हुए, 2024 इलेक्शन की पूर्व संध्या में अयोध्या का मंदिर बना।
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लेकिन मुद्दा चला नही।
मुश्किल से लंगड़ी सरकार बनी। हालात सुधारने के लिए फिर एक बार पाकिस्तान पर स्ट्राइक का खेल हुआ। लेकिन काठ की हांडी बार बार नही चढ़ती।
पाकिस्तान इस बार तैयार था। बाजी उलट गयी। ऑपरेशन सिंदूर, उसी तरह चटपट समेट लिया गया, जैसे ईरान पर अभी ट्रम्प ने युद्ध समेट लिया।
2029 के लिए न तो मन्दिर का दांव बचा है, न 370। अब पाकिस्तान को धमकाने का विकल्प भी नही है। हां, हिन्दू मुस्लिम अपने दायरे अवश्य चल रहा है, लेकिन उसकी सीमाएं फैल नही रही। नए वोटर नही जुड़ रहे।
अब क्या?
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मैनिपुलेशन- फील्ड मैंनेजमेंट
शत्रु के वोट घटाना, और पिच अपने हिसाब से सजाना।
तो SIR, परिसीमन वही है, जो बालाकोट था, राम मंदिर था, 370 था। वन टाइम ब्रह्मास्त्र।
आप शत्रु के करोड़ों वोटर काट सकते हैं। उसके इलाके तोड़फोड़कर ऐसे क्षेत्र बना सकते है, जिसमे अपने मजबूत बूथ 60-70% हों। और सब मिलाकर देश भर में 60% अपनी परंपरागत मजबूती के चुनाव क्षेत्र हों।
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पर यह भी काठ की हांडी है।
जनमत स्थिर चीज नही। वोटर आपका बंधुआ नही। अपने पसन्द के क्षेत्र बनाकर भी आप बुरी तरह हार सकते है, यह बात विक्टर ओर्बदान को अभी अभी हंगरी में पता चली है।
SIR से आप, लोगो को कुछ समय तक बाहर कर सकते हैं। पर 90% ड्यू प्रोसेस करवाकर फिर से लौट आएंगे। अब आजीवन आपके खिलाफ वोट करेंगे।
हां, मौजूदा चुनाव में वे नही होंगे। पर उनके उनके नजदीकी लोग होंगे। उनके मित्र, परिवार- आपके समर्थन में वोट नही करने वाले। तो अभी भी, एक मतदाता काटकर आप 2-3 को होस्टाइल कर रहे हैं।
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हर चुनाव के पहले, हैट से एक नया खरगोश निकालने की जादूगरी कमाल की है। लेकिन हर बार खरगोश का आकार छोटा होता जाता है।
यह ज्यादा से ज्यादा ऑब्वियस दिखने लगता है। लोग मूर्ख बनने से ऊबने लगते हैं। लेकिन दिक्कत यह कि आप जो कुछ करके सफल हुए होते है, अपनी असफलता के दौर में जोर जोर से, ज्यादा ताकत से करते हैं।
जबकि उस दवा की एक्सपायरी निकल चुकी है।
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तो आर्थिक, वैदेशिक, सामाजिक मोर्चे पर बुरी तरह असफल सरकार- मैनिपुलेशन, नरेटिव, शोर और विपक्ष पर वार का वही पैंतरा अपना रही है।
लेकिन काठ की हंडिया बार बार नही चढ़ेंगी।
औऱ तय है कि जिस दिन यह सरकार हटी (जो एक दिन हटेगी) वह दिन, पॉइंट ऑफ नो रिटर्न होगा। तब यह दल, इसके लोग, इसकी आइडियोलॉजी- 100 साल के लिए फिर बियाबान में धकेल दी जाएगी।
मौजूदा सत्ता, एक चेतावनी के रूप में इतिहास में लिखी जायेगी। याद रहे, यह काठ ऐसी हांडी है, जो दोबारा फिर कभी नही चढ़ेगी।
बुद्धिमत्ता मिलकर एक जाल बुनते हैं — और उसी जाल में जीत-हार तय होती है।
तो फिर आगे क्या होने वाला है,
ड्रोन ने युद्ध को एक हद तक "लोकतांत्रिक" बना दिया है। जो देश पहले बड़ी ताकतों के सामने बेबस थे, आज वे भी आसमान में दस्तक दे सकते हैं।
लेकिन इतिहास यह भी बताता है — हर नई तकनीक के
वक्त के साथ युद्ध भी बदलता है, युद्ध के हथियार भी.
इतिहास गवाह है — जो हथियार बीते कल को भविष्य था, वह आने वाले कल में संग्रहालय की शोभा बन जाता है। तलवार की जगह बंदूक ने ली, घुड़सवार सेना की जगह टैंकों ने, और आसमान पर राज करने वाले लड़ाकू विमानों की जगह अब एक छोटी-सी मशीन
बुद्धिमत्ता मिलकर एक जाल बुनते हैं — और उसी जाल में जीत-हार तय होती है।
तो फिर आगे क्या होने वाला है,
ड्रोन ने युद्ध को एक हद तक "लोकतांत्रिक" बना दिया है। जो देश पहले बड़ी ताकतों के सामने बेबस थे, आज वे भी आसमान में दस्तक दे सकते हैं।
लेकिन इतिहास यह भी बताता है — हर नई तकनीक के
सोलर एनर्जी की भारी बर्बादी?
सूरज की रोशनी है, पैनल तैयार हैं, बिजली बन रही है... लेकिन ग्रिड कह रहा है "नहीं चाहिए!" भारत में 2.3 TWh सोलर पावर की बर्बादी की इनसाइड स्टोरी। क्या कोयले की मोहलत क्लीन एनर्जी पर भारी पड़ रही है? https://t.co/hQsC9T5H6a
एक कहावत है, चौबे जी चले थे छब्बे जी बनने, दुबे जी बनकर रह गए। आज के परिप्रेक्ष्य में अगर कोई इस कहावत को लिखता तो शायद वो ऐसी होती, गुरुघंटाल चले थे विश्वगुरू बनने, परमिशन गुरु बनकर रह गए।
कभी-कभी खबरें इतनी व्यंग्यात्मक होती हैं कि उन पर अलग से व्यंग्य लिखने की जरूरत ही नहीं
मारेंगे", छप्पन इंच का सीना है, ब्लाह ब्लाह......#@. उसी देश को ट्रंप द्वारा यह बताना पड़ रहा है कि “भैया, 30 दिन तक तेल खरीदने की परमिशन दे रहे हैं, जाओ खरीद सकते हो।”
और इस पूरे घटनाक्रम के बीच मुस्कुराते हुए खड़े हैं मिस्टर 56 इंची उर्फ विश्वगुरू उर्फ नरेन्द्र मोदी जी,