बीजेपी सरकार #जंतर_मंतर को श्रीनगर का #लाल_चौक बनाना चाहती है, ये कैसे संभव है कि देश के लोग भारत मे तिरंगा नहीं फहरा सकते?
अगर तिरंगा फैराने पर जेल भेजा जायेगा तो, समझिये ये कौन से लोग है...
@INCIndia पार्टी ने देश कि आज़ादी लड़ाई हाथो मे तिरंगा लेकर लड़ी है...
#कांग्रेस_पार्टी अंग्रेज़ों से नहीं दरी तो इनसे क्या डरेगी...
क्या यह गोदी मीडिया और भाजपाइयों के लिए खबर भी है? नहीं। क्योंकि ये छोटे सरकार हैं।
कोई पिछड़ा, दलित या अल्पसंख्यक होता, तो वह अपराधी और गैंगस्टर कहलाता।
यह हत्यारा खुद कह रहा है कि उसने नीतीश कुमार के लिए 9 हत्याएँ करवाई हैं। पर क्या आप इसे जंगलराज कहेंगे? नहीं।
क्यों? क्योंकि ये छोटे सरकार हैं।
अभिजीत दीपके को किस जुल्म में हिरासत में लिया जा रहा है? तिरंगा झंडा फहराने के जुर्म में!
ऐसे ही 3 मराठी युवकों को जेल भेजा गया था जब उन्होंने ने 2001 में 52 साल तक तिरंगा नहीं फहराने वाले RSS के हेडक्वार्टर पर तिरंगा फहराने का जज्बा दिखाया था!
प्रेस क्लब में आज ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रेस कॉन्फ्रेंस के लिए नेहा बोरा, प्रशांत भूषण, प्रकाश राज, अभिजीत दीपके, अंजली भारद्वाज, निखिल डे समेत कई लोग जुटे थे .
जैसे ही कॉन्फ्रेंस शुरू हुई और नेहा बोरा ने बोलना शुरू किया, रिपब्लिक के रिपोर्टर ने किनारे से चिल्लाकर कुछ सवाल पूछना शुरू कर दिया . ऐसा लगा जैसे चैनल की तरफ से चार रिपोर्टर इस PC में इसी काम के लिए भेजे गए थे . उन्हें अर्नब गोस्वामी ने कुछ खास असाइनमेंट देकर भेजा होगा . नेहा और बाकी लोगों ने कहा भी कि आप प्रेस कॉन्फ्रेंस होने दीजिए , उसके बाद सवाल पूछिये . फिर कुछ शोर - शराबा हुआ तो रिपब्लिक से रिपोर्टर्स वहां से हट गए .
मैंने PC के बाद कई न्यूज चैनलों के रिपोर्टर से बात की . सबका मानना था कि रिपब्लिक के रिपोर्टर का ये तरीका सही नहीं था . उनका मकसद प्रेस कॉन्फ्रेंस को डिस्टर्ब करना था . अगर सवाल पूछना तो तो PC खत्म होने का इंतज़ार करते .
आप किसी की PC की शुरू होते ही हंगामा नहीं कर सकते .
काश! इतनी हिम्मत कभी सत्ताधारियों की प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिखाते. वहां तो फ्रेंडली मैच होता है और यहां बवाल करने आ गए. मोदी और शाह के सामने तो खुद अर्नब ही भींगी बिल्ली बन जाता है .
मैं हमेशा फील्ड रिपोर्टर के साथ किसी भी तरह की बदसलूकी के खिलाफ रहता हूं लेकिन किसी फील्ड रिपोर्टर का ये तरीका सही है ?
राष्ट्रपति महोदया,
19 साल की अंकिता भंडारी ने एक VIP के लिए अपनी गरिमा से समझौता करने से इनकार किया, जिसके कारण उसकी हत्या कर दी गई। चार साल बाद भी CBI की धीमी जांच के चलते यह सवाल बना हुआ है कि वो VIP कौन था।
अंकिता के परिवार समेत कई लोग मानते हैं कि दुष्यंत गौतम इस मामले से जुड़े हुए हैं। ऐसे में उनकी सिक्किम के राज्यपाल के पद पर नियुक्ति से मैं स्तब्ध हूं। राज्यपाल के पद पर रहते हुए उनके खिलाफ कोई आपराधिक कार्यवाही नहीं हो सकती।
दुष्यंत गौतम की नियुक्ति की सलाह देकर प्रधानमंत्री मोदी ने साबित किया है कि महिलाओं की सुरक्षा की उन्हें बिल्कुल परवाह ही नहीं है।
मैं आपसे अपील करता हूं कि सरकार को इस नियुक्ति पर पुनर्विचार करने और जांच पूरी होने तक दुष्यंत गौतम को पदभार न देने की सलाह दें।
अंकिता के माता-पिता की न्याय की उम्मीद मत टूटने दीजिए।
अंकिता भंडारी केस में बीजेपी लीडर विनोद आर्य के बेटे पुलकित आर्य को उम्र क़ैद की सजा हुई।
जांच के दौरान दो व्यक्तियों के फ़ोन कभी नहीं मिले।
1. पुलकित आर्य
2. अंकिता भंडारी
अंकिता भंडारी की डुप्लीकेट सिम बनवा कर पुलिस ने साल भर की कॉल डिटेल, वॉट्सएप मेसेज निकलवा लिए।
लेकिन पुलकित आर्य के मामले में ऐसा नहीं किया गया!
क्यों?
क्योंकि पुलकित आर्य की कॉल डिटेल्स और मेसेज से पता चल जाता कि कौन कौन VIP इसमें शामिल था।
ये भी पता चल जाता कि क्या मामला सिर्फ अंकिता के शोषण का था या और भी युवतियों को मजबूर किया जाता था।
इसीलिए उत्तराखंड में इस मामले में रोष है।
इसीलिए अंकिता के माता पिता आंदोलित हैं।
पुलिस ने तो VIP के नाम उजागर नहीं किए। लेकिन जब बीजेपी के अपने नेताओं ने पिछले साल दुष्यंत गौतम का नाम उजागर कर दिया, तो पूरे उत्तराखंड में जनता सड़कों पर उतर आई।
तब जनवरी 2026 में CBI जांच की घोषणा की गई।
लेकिन दस महीने हो गए, जांच आगे नहीं बढ़ी।
अंकिता के पिता को पहली बार CBI ने पिछले हफ़्ते 9 अक्टूबर को संपर्क किया!
और फिर 12 अक्टूबर को दुष्यंत गौतम को सिक्किम का राज्यपाल बना कर जाँच के दायरे से बाहर कर दिया। राज्यपाल को संवैधानिक immunity होती है। कोई CBI या SIT उनसे पूछताछ नहीं कर सकती है।
राज्यपाल बनाने के लिए गृह मंत्रालय और IB ने दुष्यंत गौतम को चुपचाप क्लीन चिट भी दे दी!
ऐसा क्यों किया, यही सवाल अंकिता के माता पिता राष्ट्रपति जी पूछना चाहते हैं।
सुबह के 4 बजे। जब दुनिया सो रही थी, तब अंकिता भंडारी के माता-पिता को हिरासत में ले लिया गया।
उनका गुनाह? वे इंडिया गेट पर चुपचाप बैठे थे - बोझिल कंधों के साथ, बिना किसी हंगामे के और सिर्फ़ इतना माँग रहे थे कि CBI जाँच पूरी होने तक दुष्यंत गौतम को सिक्किम का राज्यपाल न बनाया जाए।
कल मैं और प्रियंका इन माता-पिता से मिले थे।
जिस जाँच का नतीजा आया नहीं, उसके पहले ही नियुक्ति की जल्दी और सवाल पूछने वाले माँ-बाप को रात के अंधेरे में उठा लिया गया।
इस सरकार की पहचान यही है: पीड़ितों की आवाज़ दबा दो, सवाल करने वालों को हटा दो।
पर न्याय की लड़ाई न दबेगी, न रुकेगी।
कांग्रेस अंकिता भंडारी के परिवार के साथ खड़ी है, और खड़ी रहेगी - जब तक उन्हें न्याय नहीं मिलता।
#JusticeForAnkitaBhandari
इंडिया गेट पर अपनी बेटी अंकिता भंडारी के लिए न्याय माँग रहे माता-पिता को तड़के 4 बजे दिल्ली पुलिस इस तरह से हिरासत में ले रही है।
मोदी और शाह की यही जमापूंजी है!
ये हैं अंकिता भंडारी के माँ-बाप इनकी बेटी को भाजपाई दरिंदों ने मार डाला।
बेटी बचाओ का नारा देने वाले मोदी जी आज तक इनको न्याय तो नही दिला पाये लेकिन आरोपों में जिसका नाम आया उसको राज्यपाल बना दिया।
ये पीड़ित माँ बाप अपनी बेटी को न्याय दिलाने के लिए धरने पर बैठे थे मोदी की पुलिसिया फ़ौज ने सुबह 4 बजे इनको गिरफ्तार कर लिया।
अंकिता भंडारी के माता पिता इंडिया गेट के पास धरने पर बैठे हैं . कुछ पुलिस वाले उन्हें समझा बुझाकर हटाने की कोशिश कर रहे हैं .
उनकी नाराजगी दुष्यंत गौतम को सिक्किम के राज्यपाल बनाए जाने को लेकर है.
मोदी जी क्या आप अंग्रेज़ हैं?
क्या भारत में ब्रिटिश राज है?
मुझे मालूम है आप लोग तिरंगे से नफ़रत करते हैं आप लोगों ने “52 साल तक RSS के मुख्यालय पर तिरंगा नही फहराया”
आपने CJP के नेता @AshutoshRanka और @SauravDassss को तिरंगा फहराने और भारत माता की जय लगाने के कारण जेल भेज दिया।
युवाओं से पंगा मत लो मोदी जी ये आपकी तानाशाही का अंत जल्द करेंगे।
अब तो देश ही बता सकता है “दलाली करके कौन कहाँ पहुचा?”
पत्रकार से प्रवक्ता बनने का सफ़र कितनी दलाली के बाद मिलता है, इसका अनुभव तो भंडारी जी से ज़्यादा किसी को नहीं होगा!
विपक्ष के सांसद @SanjayAzadSln जी को किस बर्बरता से डिटेन किया जा रहा है! ये दिल्ली में हो रहा है, अमित शाह के इशारे पर!
इनका एक ही मकसद, हर उस आवाज को कुचलो जो निडर और बेखौफ है।
और ये ख़ुद ‘स्वाभिमान-शून्य’ हैं, नहीं तो :
- नाम की पट्टी हटाने पर कुछ तो प्रतिक्रिया देते;
- कुर्सी की जगह स्टूल पर बैठानेवालों के उप नहीं होते;
- जनता द्वारा चुनाव हराये जाने के बाद सरकार में नहीं रहते;
- किसी के द्वारा दिये गये ‘कृपाप्राप्त पद’ को स्वीकार नहीं करते;
- प्रमुख मंत्रालय छिन जाने पर चुप्पी न साध लेते;
- मुख्यमंत्री जी द्वारा सरेआम अपने हाथ से हाथ नीचे कर देने पर वहीं बैठे न रहते;
- वर्चस्ववादियों के दिये अपमान के घूंट नहीं पीते;
- ’पीडीए समाज’ से होते हुए भी पीडीए का दमन- उत्पीड़न करनेवाले प्रभुत्ववादियों के पिछलग्गू न होते!