@pradeepcozi@Vaibhavsingh008 बेसिक शिक्षा(1-12)वैचारिक नींव के लिए है,चम्मच से कौशल
पिलाने के लिए नहीं,दशकों तक सत्ता भोगने वाले तुम्हारे ही आकाओं ने सरकारी स्कूलों को भ्रष्टाचार,जातिवाद का अड्डा बना बर्बाद किया,पीढ़ियों को अनपढ़ रख अपना वोटबैंक बनाया,उनका आज सिस्टम सुधारने का दावा महज छलावा है।
@pradeepcozi@Vaibhavsingh008 शिक्षा व्यवस्था का RRअब सिर्फ अकर्मण्यता का बहाना है,जिस डेटा से तुम दिनभर 10%की साजिशों का विलाप करते हो,उससे दुनिया भर के कौशल मुफ्त सीखे जा सकते हैं,digitalयुग में ज्ञान व्यवस्था का मोहताज नहीं,अपनी नाकामी को सिस्टम के पीछे छिपाना बंद करो,अवसर खैरात में न मिलते,बनाने पड़ते हैं
@pradeepcozi@Vaibhavsingh008 बिना वेल्थ क्रिएशन किए अगर सिर्फ बांटने पर ज़ोर देगा,तो अंत में 100% लोगों के हिस्से में सिर्फ कंगाली और कटोरा ही आएगा, वेनेजुएला याद है,छोड़ तुझे क्या पता होगी तू PDA वाली दरी बिछा,वितरण की रट लगाने से पहले,निर्माण की अक्ल होना ज़रूरी है।वो तो तेरे पास है नहीं।जा 70,90,10 यही कर
@pradeepcozi@Vaibhavsingh008 संसाधनों के समान वितरण का यह वामपंथी Utopia सुनने में बड़ा सुरीला है,लेकिन इतिहास गवाह है,जिसने भी जबरन वितरण का प्रयोग किया,उसने केवल समान गरीबी ही बांटी,संसाधन कोई पहले से रखा केक नहीं है जिसे बस काटना है,इन्हें उद्यम, मेहनत,तकनीक से पैदा किया जाता है,जिसे tu फर्जी ज्ञान कह रहा
@pradeepcozi@Vaibhavsingh008 तो बंद कर दे ये शगूफा देना की PDA तुम्हारी क्रांति ला देगी,और 10%,70% का ज्ञान भी बंद कर दे,नहीं पता रहे कुछ ना बुढ़वे तो पहले कुछ पढ़ले, जान ले फिर कुछ बोल।यहां रटा हुआ व्हाट्सएप ज्ञान नहीं चलेगा।
@pradeepcozi@Vaibhavsingh008 संसाधनों का उचित वितरण एक विफल वामपंथी थ्योरी है,जिसने दुनिया भर में सिर्फ गरीबी बांटी है।अर्थव्यवस्था कोई रोटी नहीं जिसे तोड़कर बांट दिया जाए,90% की बदहाली का कारण 10% की प्रगति नहीं,बल्कि समानता का झूठा सपना दिखाकर जनता को दशकों तक सिर्फ वोट बैंक बनाने वाली भ्रष्ट राजनीति है।
लखनऊ: चिनहट स्थित कोल्ड स्टोरेज में लगी आग,दमकल की 6 गाड़ियां आग बुझाने में जुटीं,हिमालयन कोल्ड स्टोरेज में लगी भीषण आग,चिनहट पुलिस के साथ फायर ब्रिगेड मौके पर,चिनहट थाना क्षेत्र में है हिमालयन कोल्ड स्टोरेज।
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@pradeepcozi@Vaibhavsingh008 10% के दर्शन को कोसना महज राजनीतिक पाखंड है,दशकों तक सत्ता भोगने वाले PDA के स्वघोषित मसीहाओं ने 90% का हक लूटकर सिर्फ अपने परिवारों की तिजोरियां भरी हैं,नाच देखा है सैफई में.जनता को संसाधन का झुनझुना थमाकर केवल अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकना ही इनका असली खेल है।ज्ञान न हो तो, लो।
@pradeepcozi@Vaibhavsingh008 PDAसामाजिक न्याय का नहीं,बल्कि जातिवाद,तुष्टिकरण का नया चोला है,अगर लड़ाई90% के संसाधनों की है,तो बहुसंख्यकसमाज की सांस्कृतिक,धार्मिक आस्थाओं से इतनी चिढ़ क्यों?खोखले सेक्युलरिज्म की आड़ में सिर्फ एक विशेषवर्ग की चाटुकारिता करके कोई भी दल90% का सच्चा प्रतिनिधित्व कभी नहीं कर सकता
एक सत्य ये भी है कि उत्तर प्रदेश में राम मंदिर चंदा चोरी का मुद्दा हो या फिर बिहार में भरत तिवारी की पुलिसिया हत्या, या फिर देशव्यापी NEET पेपर-लीक की घटना - भाजपा के वोटों पर इनका कोई असर नहीं पड़ने वाला है।
ये नब्बे के दशक नहीं है। जनवरी 2024 में ही राम मंदिर में प्राण-प्रतिष्ठा हुई और उसी साल हुए लोकसभा चुनावों में भाजपा की सीटें गिर गईं। इसका अर्थ है कि अब जनता वोट देते वक़्त राम मंदिर मुद्दे पर विचार नहीं करती। चोरी करने वाले भाजपाई नहीं हैं, नेता नहीं हैं - इसीलिए भाजपा या केंद्र-राज्य सरकार को लेकर आक्रोश नहीं है। कहीं है भी तो ये मतदान में नहीं रहेगा।
बिहार में भरत तिवारी का मुद्दा भले ही घर-घर में चल रहा हो, लेकिन पिछड़ों की राजनीति के इस दौर में किसी ब्राह्मण को मार दिया जाना आक्रोश पैदा नहीं करता। सामान्य वर्ग के उत्पीड़न का सामान्यीकरण हो चुका है। ऊपर से सामान्य वर्ग की जातियों में भी एकता नहीं है। बिहार में भाजपा को कोइरी समाज को केंद्र में रखकर राजनीति खेलनी है। ब्राह्मण कहीं नहीं जा सकते, दूसरी तरफ़ घोर जातिवादी पार्टियाँ हैं। कांग्रेस का ध्यान केवल मुसलमानों पर है। चुनाव में भरत तिवारी मुद्दा नहीं रहेगा।
रही बात नीट की तो इन तीनों मुद्दों में से एक यही मुद्दा है जिसे कांग्रेस सही से उठाने की कोशिश कर रही है, लेकिन जबतक राहुल गाँधी का चेहरा आगे है तबतक किसी भी अभियान में गंभीरता का लेशमात्र नहीं रहता। अधिकतर नीट परीक्षार्थी मतदाता-सूची में ही नहीं हैं फ़िलहाल। कल को वो किसी कॉलेज में होंगे तो केवल वोट देने घर जाएँगे, ये भी नहीं होता। भारत का Gen Z इंस्टाग्राम पर व्यस्त है, यहाँ क्रांति संभव नहीं। अभिभावक इस आधार पर वोटों का निर्णय नहीं लेंगे।
अंतिम तथ्य, 2029 के लोकसभा चुनाव में अभी 3 वर्ष हैं। कॉकरोच जैसे आन्दोलनों ने जायज माँगों की गंभीरता भी ख़त्म कर दी है। 3 साल में जनता सबकुछ भूल जाती है, इतिहास यही कहता है। अगर सत्ता-परिवर्तन होना भी होगा तो अंतिम 2 वर्षों के मुद्दों के आधार पर होगा, लेकिन BJP की मशीनरी भलीभाँति जानती है छिटपुट मुद्दों से कैसे निपटना है।
@pradeepcozi@Vaibhavsingh008 20% बंधुआ वोटों का यही खौफ हमेशा विपक्ष में रखेगा,जो नेता मात्र मंदिर भर के लिए आवाज उठाने से अपना वोटबैंक खिसकने के डर से कांपता हो,वह बहुसंख्यक समाज का भरोसा कभी नहीं जीत सकता,तुष्टिकरण की इस मानसिक गुलामी से सिर्फ हार मिलती है,सत्ता नहीं।