#संतरामपालजी_Vs_महर्षिदयानंद
दयानंद सरस्वती माता पिता की सेवा करने के भी पक्ष में नहीं थे।
संत रामपाल जी महाराज जी ने अपने शिष्यों को ये सिखाया है कि माता पिता की सेवा परम् कर्तव्य है।
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1. कबीर साहेब को पवित्र वेदों से सिद्ध किया।
2. बताया कि कबीर साहेब ही पूर्ण परमात्मा हैं।
3. काशी वाले कबीर साहेब ही सारी सुष्टि के रचनहार हैं।
4. शास्त्र अनुसार भक्ति का सही मार्ग बताया।
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जबकि संत रामपाल जी महाराज द्वारा लिखित पवित्र पुस्तक जीने की राह में परस्त्री या पर-पुरुष को उम्र के हिसाब से बहन, बेटी, माता, भाई, पिता, पुत्र आदि के नजरिए से देखने का ज्ञान दिया गया है।
#सत_भक्ति_संदेश
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संत रामपाल जी महाराज स्वयं कोई व्यसन नहीं करते और उनके करोड़ों शिष्य भी नशे को हाथ तक नहीं लगाते। उन्होंने अपनी पवित्र पुस्तक ज्ञान गंगा में इससे होने वाली हानि भी बताई हैं:
गरीब, मदिरा पीवै कड़वा पानी, सत्तर जन्म स्वान के जानी।
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दयानन्द की सत्यार्थ प्रकाश के समुल्लास 4 में 11 पुरुषों से समाज नाशक नियोग (दुष्कर्म) करने को कहा गया है।
संत रामपाल जी महाराज द्वारा लिखित जीने की राह में परस्त्री या पर-पुरुष को उम्र के हिसाब से बहन, बेटी, माता, भाई, पिता, पुत्र आदि
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संत रामपाल जी महाराज कबीर साहेब, गुरु नानक देव सहित महान संतों की महिमा बताते हैं और निंदा से बचने की शिक्षा देते हैं। दूसरी ओर, सत्यार्थ प्रकाश में विभिन्न संतों तथा उनकी शिक्षाओं पर की गई आलोचनाओं को लेकर मतभेद दिखाई देते हैं।
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दयानंद सरस्वती माता पिता की सेवा करने के भी पक्ष में नहीं थे।
संत रामपाल जी महाराज जी ने अपने शिष्यों को ये सिखाया है कि माता पिता की सेवा परम् कर्तव्य है।
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परमात्मा के स्वरूप और
भक्ति से जुड़े विषयों पर विभिन्न धार्मिक विचार मिलते हैं। संत रामपाल जी महाराज वेदों के प्रमाणों के आधार पर अपने विचार प्रस्तुत करते हैं।
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सत्यार्थ प्रकाश, समुल्लास 11, पृष्ठ 292-293 पर दयानंद सरस्वती ने वैष्णवों को 'धूड़'
अर्थात तुच्छ कहा और भगवान नारायण (विष्णु) सहित वैष्णवों को 'चोरमंडली की संज्ञा दे दी!
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सत्यार्थ प्रकाश और जीने की राह में समाज एवं चरित्र निर्माण को लेकर अलग-अलग विचार हैं। सत्यानाश प्रकाश में नियोग संबंधी कथन की आलोचना की गई है, जबकि जीने की राह में स्त्री-पुरुष को सम्मानजनक पारिवारिक दृष्टि से देखने की शिक्षा दी गई है।
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सत्यार्थ प्रकाश' को लेकर उठे गंभीर सवाल
सत्यार्थ प्रकाश पुस्तक जलाने योग्य है ये पुस्तक समाज का उत्थान नहीं बल्कि समाज का नाश करने वाली पुस्तक हैं।
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दयानंद सरस्वती अपनी पुस्तक सत्यार्थ प्रकाश में लिखते हैं कि परमात्मा निराकार है। कहीं लिखते है कि स्तुति से परमात्मा का साक्षात्कार होता है। इससे पता चलता है यह अज्ञानी व्यक्ति थे।
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♦️ आत्मकथा अनुसार दयानंद भांग व हुक्के का सेवन करते थे, जबकि संत रामपाल जी महाराज और उनके करोड़ों शिष्य हर प्रकार के नशे से दूर रहकर एक स्वस्थ व स्वच्छ समाज बनाते हैं।
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💫✨महर्षि दयानंद ने कबीर परमेश्वर और कबीर पंथियों की निंदा की है सत्यार्थ प्रकाश ।
🙇🙏 जबकि संत रामपाल जी महाराज जी ने कबीर साहेब को पवित्र वेदों से सिद्ध किया है
कि काशी वाले कबीर साहेब ही पूर्ण परमात्मा हैं
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दयानंद सरस्वती ने संतों का किया अपमान
कबीर साहेब, गुरुनानक देव आदि जिन संतों को पूरी दुनिया पूजती है। दयानंद सरस्वती ने अपनी पुस्तक सत्यार्थ प्रकाश में उन्हीं महान संतों पर अपमान जनक टिप्पणियाँ कर उनका अपमान किया।
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दयानंद सरस्वती माता पिता की सेवा करने के भी पक्ष में नहीं थे।
संत रामपाल जी महाराज जी ने अपने शिष्यों को ये सिखाया है कि माता पिता की सेवा परम् कर्तव्य है।
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सत्यार्थ प्रकाश समुल्लास 4 पृष्ठ 95 से 101, दयानंद जी द्वारा बताई गई नियोग व्यवस्था अर्थात दूसरे पुरुष के साथ दुष्कर्म करना
लिखा है कि एक स्त्री आवश्यकता पड़ने पर ॥ पुरुषों से और पुरुष ॥ स्त्रियों से नियोग (दुष्कर्म) कर सकता है।
संत रामपाल जी महाराज जी अपने शिष्यों को प्रथम मंत्र में पंच प्रधान (ब्रह्मा, विष्णु, शिव, दुर्गा व गणेश) की हिन्दू भक्ति साधना देते हैं-😇😇🌹🌹
कबीर, राम कृष्ण से कौन बड़ा, तिन्हूँ भी गुरु कीन्ह।
तीन लोक के वे धनी, गुरु आगै आधीन।
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