गाँधी का पता...
1869 से 1874 तक अगर आप मोहन को पत्र लिखते, तो एड्रेस होता-
दीवान हरजीवन रायदास की हवेली,
भाठिया बाजार पोरबंदर स्टेट,
काठियावाड़ ऐजेंसी
फिर पिता राजकोट शिफ्ट हो गए। मोहन ने यहां प्रारंभिक शिक्षा ग्रहण की। अब आपकी चिट्ठी का एड्रेस होता
काबा गांधी नो डेलो
राजकोट, सौराष्ट्र
फरवरी 1887 मे भावनगर के शामलदास कॉलेज मे दाखिला लिया, मगर पढ़े नही। 10 अगस्त 1888 को मुंबई के लिए निकले। इरादा बैरिस्टरी पढ़ने के लिए इंग्लैंड जाने का था।
19 सितंबर 1888 कोगांधी ने ब्रिटेन मे पहली रात बिताई।
पता था -विक्टोरिया होटल,
ट्राफल्गर स्क्वेयर लंदन (यूके)
•••
होटल मंहगा था। वे किराये पर कमरे लेकर रहने लगे। 3 एड्रेस की जानकारी स्पस्ट मिलती है।
60, टालबोट रोड,
बेजवाटर, लंदन W25LJ
स्टोर स्ट्रीट, लंदन
WC1E7PL
20 बैरॉन कोर्ट रोड
वेस्ट केन्सिंगटन W149DU
●●
भारत लौटे, मुम्बई में वकालत की प्रैक्टिस शुरू की। जिरह में कमजोरी का अहसास हुआ। बार की प्रैक्टिस नही की। तो वे लीगल ड्राफ्टिंग, कॉन्ट्रेक्ट, नेगोशिएशन वगैरह की तरफ मुड़ गए।
याने राम जेठमलानी टाइप आपराधिक मुकदमो की नही, बल्कि किसी इनकमटैक्स के वकील वाली प्रेक्टिस थी। और इसी क्रम में एक व्यापारी ने अफ्रीका भेजा।
वहां वकालत भी सफल हुई, नेतागिरी भी।
●●
20 साल अफ्रीका पर प्रवास में बैरिस्टर गांधी के कई अड्रेस हुए। मगर बैरिस्टर गांधी, वर्ष 1900 के बाद खत्म होता गया। उसके एड्रेस थे...
53 ए, जो स्लोवो स्ट्रीट
डरबन, दक्षिण अफ्रीका
15, पाइन एन्ड गार्डन रोड
जोहान्सबर्ग, 2192, साउथ अफ्रीका।
दूसरा एड्रेस अब सत्याग्रह हाउस कहलाता है। यहां म्यूजियम भी है, और गेस्ट हाउस भी।
●●
नेता गांधी की धमक सन 1900 के बाद सुनाई देने लगती है। उसने पहले फीनिक्स आश्रम बनाया।
वकालत अभी भी कुछ करते ही थे। मगर अब सामाजिक काम बढा था, सामाजिक दायरा भी।लोग जुड़े। यह कम्युनिटी ही फीनिक्स फार्म कहलाती। इसका अड्रेस था
फीनिक्स फार्म
लेनेसिया, प्रोविंस- गौटेंग
साउथ अफ्रीका
जेल यात्रायें बढ़ गयी थी। 1909 में जेल से वापसी पर उन्होंने एक फॉर्म पर रहना शुरू किया। मिनिम्लिस्ट जीवन, और सत्याग्रह के फलसफे उनके साथ थे। अड्रेस था
मोहनदास करमचंद गांधी।
फीनिक्स फार्म, डरबन
क्वाजुलु नेटाल, दक्षिण अफ्रीका
अक्टूबर 1912 में यहीं गोखले, गांधी से मिलने आते हैं। स्वदेस लौटने औऱ कांग्रेस की बागडोर सम्हालने का आमंत्रण देते हैं।
गांधी स्वीकार करते हैं।
●●
जनवरी 1915 में भारत लौटते हैं। पर अब राजकोट या पोरबन्दर के घर मे रहना उनकी शैली नही रह गयी। अहमदाबाद में वे एक आश्रम बनाते हैं। जगह शहर से दूर थी।
साबरमती के किनारे, कुछ मिट्टी के घर, गांधी का आवास बने। एड्रेस फिर बदला। अबकी बार -
मोहनदास करमचंद गांधी।
साबरमती आश्रम, अहमदाबाद
बम्बई प्रान्त, भारत।
●●
12 मार्च 1930 को गांधी साबरमती आश्रम से निकले। दांडी यात्रा के लिए.. और फिर कभी नही लौटे।
उनका प्रण था कि जब तक देश आजाद न हो, साबरमती न लौटेंगे।
पर कहीं तो रहना होगा- गांधी जेल में रहे।
फिर 45 दिन SS राजपूताना में रहकर इंग्लैंड पहुचे। राजा का बुलावा था। बकिंघम पैलेस में चाय पी। और राजा को ठेंगा दिखा दिया।
महल की चाय पीने के चार माह के भीतर ही ..
यरवदा जेल की चाय पी रहे थे।
तीन साल बाद मुक्त हुए। यहां वहां घूमते भटकते रहे। अब तक मोहनदास, महात्मा गांधी बन चुके थे। चिट्ठियों पर लिखा होता
महात्मा गांधी -
""जहां हों, वहाँ"
●●
जिंदगी के एक निवास अभी बाकी था।
आखरी निवास!!
पर उसके पहले गांधी के बदलते पतों पर जो छूट गया है, नोट करें - जॉहन्सबर्ग जेल , ट्रांसवाल जेल , प्रिटोरिया जेल , नेटाल जेल..
साबरमती जेल, चम्पारण जेल, यरवदा जेल, आगा खां पैलेस,
और कोचरब आश्रम। जो अहमदाबाद के बाहर, कोचरब गांव में एक मित्र का होलीडे होम था। अफ्रीका से लौटने के बाद, गांधी कुछ वक़्त कोचरब में रहे। तब साल भर बाद, साबरमती में आश्रम बनाया।
●●
1930 मे साल्ट मार्च के लिए निकले, तो साबरमती आश्रम कभी न लौटे। अगले 5 साल- या तो जेल में गुजरे, अथवा अछूतोद्धार यात्राओ में यायावर जीवन जिया।
तभी जमनालाल बजाज ने उन्हें पत्र लिखा, वर्धा आकर रहने की इसरार की। नागपुर से 80 किमी दूर ये जगह गांधी को जँची। वे शहर में नही रहना चाहते थे, तो किसी ने पास मे शेगाँव का सुझाव दिया।
ये गाँव, दलित बहुल था।
वन थे, शांत था।
गांधी की सहमति मिली, तो जमनालाल फटाफट निर्माण कराने को उद्यत हुए। पर गांधी ने कहा- स्थानीय माल, स्थानीय कारीगर, केवल 100 रुपये का बजट
इतने बजट मे कोई माटी की कुटिया ही बन सकती थी
वही बनी। बापू 1936 में यहां रहने आए।
●●
बच्चन की एक पंक्ति है-
मैं अब जमकर बैठ गया हूँ,
घूम रही है मधुशाला
गांधी जहान से दूर, इस वन में जमकर बैठ गए। दुनिया भर की शख्सियतें, जिनसे मिलने को आपको एपोइंटमेंट लेनी पड़े, वे यहां कतार लगाकर गांधी से मिलने की प्रतीक्षा करते।
एक कुटी बापू का ऑफिस थी। अमृत कौर, महादेव भाई और हरिभाई वहां टाइपराइटर खटखटाते। आश्रम का हिसाब रखते, चिट्ठियां टाइप करते।
चिट्ठियां किसी दूसरे शेगाँव पहुँच जाती। असल मे महाराष्ट्र मे शेगाँव नाम का दूसरा गांव है, जहाँ साईंबाबा की श्राइन है। तो बापू के सुझाव पर इस गाँव का नाम, सेवाग्राम रख दिया गया।
आज भी वह इसी नाम से जाना जाता है।
●●
यह दौर लार्ड लिनलिथगो का था। 1939-40 जब युद्ध शुरू होने वाला था। गांधी क्लियर थे। पहले आजादी दो, भारत छोड़ दो, फिर आपके सहयोग की सोचेंगे।
लिनलिथगो के पसीने फूट रहे थे। सम्पर्क के लिए नागपुर से फोन लाइन खींची। एक टेलीफोन बॉक्स लगाकर हॉटलाइन सम्पर्क स्थापित किया।
रेल खींची। एक रेलवे स्टेशन बनाया।
जहां स्पेशल ट्रेन भेजते।
कोई आपके लिए दिल्ली से 10 सीटर चार्टर प्लेन भेजे। और आप मुफ्त अहसान न लेना चाहें, तो क्या करेंगे।
अजी- 4 हजार प्रति सीट, नार्मल किराये के आधार पर, 10 सीट का 40 हजार मुंह पे मार देंगे। वैसे ही, गांधी तीसरे दर्जे के एक डिब्बे ( स्पेशल ट्रेन में एक इंजन, और 40 सीटर एक डिब्बा होता) की सारी सीटों का किराया, 132 रुपये जमा कर आये।
हर माह टेलीफोन बिल भी पटा देते ।
●●
एक कुटीऱ जमनालाल बजाज ने अपने लिए बनवाया था ।और वे रहते कम थे, सो बन्द रहती। 1942 के के आंदोलन योजना की पहली बैठक, सेवाग्राम मे वहीं हुई।
फिर बा-बापू, आंदोलन के लिए बम्बई गए। गिरफ्तार हुए। आगा खां पैलेस में नजरबंद रहे।
बा की मृत्यु वहीं हुई।
अब जेल से छूटे गांधी के साथ, जीवन साथी न थी। स्वास्थ्य नाजुक रहता, उम्र 75 पार, खांसी का दौरा उठता। वे जमनालाल बजाज की कुटी उपयोग करते।उपचार लेते, धूप में बैठते।
इसी कुटी में थे, जब दंगों की खबर सुनी।
●●
यहां से नोआखाली गये। मुम्बई गए।
दिल्ली गए। बिरला हाउस मे रुके।
औऱ वही एक नफरती की तीन गोलियों ने उनका पता आख़री बार बदल दिया। अब वह नया पता क्या है - मैं नहीं जानता।
क्या वे स्वर्ग के किसी कोने मे हैं। अवश्य वहाँ भी उन्होंने कोई मिट्टी की कोठरी ही चुनी होगी।
या वे हिंदुस्तान के हर नागरिक के दिल के किसी कोने मे हैं?
शायद आप बेहतर बता पाएंगे।
●●
लेकिन आज जब इस नफ़रत की आंधी भरे दौर मे, लोगो की उदास आंखे देखता हूँ। अपने वतन मे उन्हें गद्दार, नक्सल, नीच जात, ख़ालिस्तानी, चिंकी कहे जाते देखता हूँ..
स्वराज की सुराज से दूरी देखता हूँ। अपने पसीने की गाढ़ी कमाई, इन काले अंग्रेजो की अय्याशियों पर धू धू कर उड़ते देखता हूँ..
तो उसकी आँखों मे एक अदद गाँधी की तलाश नजर आती है।
वे सब के सब, गाँधी का पता ढूंढ़ रही हैं।
सो लिख दिया..
●●
हैप्पी बड्डे, गाँधी ब्रो।
❤️
गाँधी का पता...
1869 से 1874 तक अगर आप मोहन को पत्र लिखते, तो एड्रेस होता-
दीवान हरजीवन रायदास की हवेली,
भाठिया बाजार पोरबंदर स्टेट,
काठियावाड़ ऐजेंसी
फिर पिता राजकोट शिफ्ट हो गए। मोहन ने यहां प्रारंभिक शिक्षा ग्रहण की। अब आपकी चिट्ठी का एड्रेस होता
काबा गांधी नो डेलो
राजकोट, सौराष्ट्र
फरवरी 1887 मे भावनगर के शामलदास कॉलेज मे दाखिला लिया, मगर पढ़े नही। 10 अगस्त 1888 को मुंबई के लिए निकले। इरादा बैरिस्टरी पढ़ने के लिए इंग्लैंड जाने का था।
19 सितंबर 1888 कोगांधी ने ब्रिटेन मे पहली रात बिताई।
पता था -विक्टोरिया होटल,
ट्राफल्गर स्क्वेयर लंदन (यूके)
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होटल मंहगा था। वे किराये पर कमरे लेकर रहने लगे। 3 एड्रेस की जानकारी स्पस्ट मिलती है।
60, टालबोट रोड,
बेजवाटर, लंदन W25LJ
स्टोर स्ट्रीट, लंदन
WC1E7PL
20 बैरॉन कोर्ट रोड
वेस्ट केन्सिंगटन W149DU
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भारत लौटे, मुम्बई में वकालत की प्रैक्टिस शुरू की। जिरह में कमजोरी का अहसास हुआ। बार की प्रैक्टिस नही की। तो वे लीगल ड्राफ्टिंग, कॉन्ट्रेक्ट, नेगोशिएशन वगैरह की तरफ मुड़ गए।
याने राम जेठमलानी टाइप आपराधिक मुकदमो की नही, बल्कि किसी इनकमटैक्स के वकील वाली प्रेक्टिस थी। और इसी क्रम में एक व्यापारी ने अफ्रीका भेजा।
वहां वकालत भी सफल हुई, नेतागिरी भी।
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20 साल अफ्रीका पर प्रवास में बैरिस्टर गांधी के कई अड्रेस हुए। मगर बैरिस्टर गांधी, वर्ष 1900 के बाद खत्म होता गया। उसके एड्रेस थे...
53 ए, जो स्लोवो स्ट्रीट
डरबन, दक्षिण अफ्रीका
15, पाइन एन्ड गार्डन रोड
जोहान्सबर्ग, 2192, साउथ अफ्रीका।
दूसरा एड्रेस अब सत्याग्रह हाउस कहलाता है। यहां म्यूजियम भी है, और गेस्ट हाउस भी।
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नेता गांधी की धमक सन 1900 के बाद सुनाई देने लगती है। उसने पहले फीनिक्स आश्रम बनाया।
वकालत अभी भी कुछ करते ही थे। मगर अब सामाजिक काम बढा था, सामाजिक दायरा भी।लोग जुड़े। यह कम्युनिटी ही फीनिक्स फार्म कहलाती। इसका अड्रेस था
फीनिक्स फार्म
लेनेसिया, प्रोविंस- गौटेंग
साउथ अफ्रीका
जेल यात्रायें बढ़ गयी थी। 1909 में जेल से वापसी पर उन्होंने एक फॉर्म पर रहना शुरू किया। मिनिम्लिस्ट जीवन, और सत्याग्रह के फलसफे उनके साथ थे। अड्रेस था
मोहनदास करमचंद गांधी।
फीनिक्स फार्म, डरबन
क्वाजुलु नेटाल, दक्षिण अफ्रीका
अक्टूबर 1912 में यहीं गोखले, गांधी से मिलने आते हैं। स्वदेस लौटने औऱ कांग्रेस की बागडोर सम्हालने का आमंत्रण देते हैं।
गांधी स्वीकार करते हैं।
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जनवरी 1915 में भारत लौटते हैं। पर अब राजकोट या पोरबन्दर के घर मे रहना उनकी शैली नही रह गयी। अहमदाबाद में वे एक आश्रम बनाते हैं। जगह शहर से दूर थी।
साबरमती के किनारे, कुछ मिट्टी के घर, गांधी का आवास बने। एड्रेस फिर बदला। अबकी बार -
मोहनदास करमचंद गांधी।
साबरमती आश्रम, अहमदाबाद
बम्बई प्रान्त, भारत।
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12 मार्च 1930 को गांधी साबरमती आश्रम से निकले। दांडी यात्रा के लिए.. और फिर कभी नही लौटे।
उनका प्रण था कि जब तक देश आजाद न हो, साबरमती न लौटेंगे।
पर कहीं तो रहना होगा- गांधी जेल में रहे।
फिर 45 दिन SS राजपूताना में रहकर इंग्लैंड पहुचे। राजा का बुलावा था। बकिंघम पैलेस में चाय पी। और राजा को ठेंगा दिखा दिया।
महल की चाय पीने के चार माह के भीतर ही ..
यरवदा जेल की चाय पी रहे थे।
तीन साल बाद मुक्त हुए। यहां वहां घूमते भटकते रहे। अब तक मोहनदास, महात्मा गांधी बन चुके थे। चिट्ठियों पर लिखा होता
महात्मा गांधी -
""जहां हों, वहाँ"
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जिंदगी के एक निवास अभी बाकी था।
आखरी निवास!!
पर उसके पहले गांधी के बदलते पतों पर जो छूट गया है, नोट करें - जॉहन्सबर्ग जेल , ट्रांसवाल जेल , प्रिटोरिया जेल , नेटाल जेल..
साबरमती जेल, चम्पारण जेल, यरवदा जेल, आगा खां पैलेस,
और कोचरब आश्रम। जो अहमदाबाद के बाहर, कोचरब गांव में एक मित्र का होलीडे होम था। अफ्रीका से लौटने के बाद, गांधी कुछ वक़्त कोचरब में रहे। तब साल भर बाद, साबरमती में आश्रम बनाया।
●●
1930 मे साल्ट मार्च के लिए निकले, तो साबरमती आश्रम कभी न लौटे। अगले 5 साल- या तो जेल में गुजरे, अथवा अछूतोद्धार यात्राओ में यायावर जीवन जिया।
तभी जमनालाल बजाज ने उन्हें पत्र लिखा, वर्धा आकर रहने की इसरार की। नागपुर से 80 किमी दूर ये जगह गांधी को जँची। वे शहर में नही रहना चाहते थे, तो किसी ने पास मे शेगाँव का सुझाव दिया।
ये गाँव, दलित बहुल था।
वन थे, शांत था।
गांधी की सहमति मिली, तो जमनालाल फटाफट निर्माण कराने को उद्यत हुए। पर गांधी ने कहा- स्थानीय माल, स्थानीय कारीगर, केवल 100 रुपये का बजट
इतने बजट मे कोई माटी की कुटिया ही बन सकती थी
वही बनी। बापू 1936 में यहां रहने आए।
●●
बच्चन की एक पंक्ति है-
मैं अब जमकर बैठ गया हूँ,
घूम रही है मधुशाला
गांधी जहान से दूर, इस वन में जमकर बैठ गए। दुनिया भर की शख्सियतें, जिनसे मिलने को आपको एपोइंटमेंट लेनी पड़े, वे यहां कतार लगाकर गांधी से मिलने की प्रतीक्षा करते।
एक कुटी बापू का ऑफिस थी। अमृत कौर, महादेव भाई और हरिभाई वहां टाइपराइटर खटखटाते। आश्रम का हिसाब रखते, चिट्ठियां टाइप करते।
चिट्ठियां किसी दूसरे शेगाँव पहुँच जाती। असल मे महाराष्ट्र मे शेगाँव नाम का दूसरा गांव है, जहाँ साईंबाबा की श्राइन है। तो बापू के सुझाव पर इस गाँव का नाम, सेवाग्राम रख दिया गया।
आज भी वह इसी नाम से जाना जाता है।
●●
यह दौर लार्ड लिनलिथगो का था। 1939-40 जब युद्ध शुरू होने वाला था। गांधी क्लियर थे। पहले आजादी दो, भारत छोड़ दो, फिर आपके सहयोग की सोचेंगे।
लिनलिथगो के पसीने फूट रहे थे। सम्पर्क के लिए नागपुर से फोन लाइन खींची। एक टेलीफोन बॉक्स लगाकर हॉटलाइन सम्पर्क स्थापित किया।
रेल खींची। एक रेलवे स्टेशन बनाया।
जहां स्पेशल ट्रेन भेजते।
कोई आपके लिए दिल्ली से 10 सीटर चार्टर प्लेन भेजे। और आप मुफ्त अहसान न लेना चाहें, तो क्या करेंगे।
अजी- 4 हजार प्रति सीट, नार्मल किराये के आधार पर, 10 सीट का 40 हजार मुंह पे मार देंगे। वैसे ही, गांधी तीसरे दर्जे के एक डिब्बे ( स्पेशल ट्रेन में एक इंजन, और 40 सीटर एक डिब्बा होता) की सारी सीटों का किराया, 132 रुपये जमा कर आये।
हर माह टेलीफोन बिल भी पटा देते ।
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एक कुटीऱ जमनालाल बजाज ने अपने लिए बनवाया था ।और वे रहते कम थे, सो बन्द रहती। 1942 के के आंदोलन योजना की पहली बैठक, सेवाग्राम मे वहीं हुई।
फिर बा-बापू, आंदोलन के लिए बम्बई गए। गिरफ्तार हुए। आगा खां पैलेस में नजरबंद रहे।
बा की मृत्यु वहीं हुई।
अब जेल से छूटे गांधी के साथ, जीवन साथी न थी। स्वास्थ्य नाजुक रहता, उम्र 75 पार, खांसी का दौरा उठता। वे जमनालाल बजाज की कुटी उपयोग करते।उपचार लेते, धूप में बैठते।
इसी कुटी में थे, जब दंगों की खबर सुनी।
●●
यहां से नोआखाली गये। मुम्बई गए।
दिल्ली गए। बिरला हाउस मे रुके।
औऱ वही एक नफरती की तीन गोलियों ने उनका पता आख़री बार बदल दिया। अब वह नया पता क्या है - मैं नहीं जानता।
क्या वे स्वर्ग के किसी कोने मे हैं। अवश्य वहाँ भी उन्होंने कोई मिट्टी की कोठरी ही चुनी होगी।
या वे हिंदुस्तान के हर नागरिक के दिल के किसी कोने मे हैं?
शायद आप बेहतर बता पाएंगे।
●●
लेकिन आज जब इस नफ़रत की आंधी भरे दौर मे, लोगो की उदास आंखे देखता हूँ। अपने वतन मे उन्हें गद्दार, नक्सल, नीच जात, ख़ालिस्तानी, चिंकी कहे जाते देखता हूँ..
स्वराज की सुराज से दूरी देखता हूँ। अपने पसीने की गाढ़ी कमाई, इन काले अंग्रेजो की अय्याशियों पर धू धू कर उड़ते देखता हूँ..
तो उसकी आँखों मे एक अदद गाँधी की तलाश नजर आती है।
वे सब के सब, गाँधी का पता ढूंढ़ रही हैं।
सो लिख दिया..
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हैप्पी बड्डे, गाँधी ब्रो।
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कनक साहू ने गणतंत्र दिवस पर छत्तीसगढ़ में सीएम के सामने राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम् की प्रस्तुति दी। क्या गजब गाया।
अब ये वीडियो तगड़ा वायरल है। कनक के ही इंस्टा अकाउंट पर करीब 3 करोड़ लोगों ने देखा। लता जी की आवाज से तुलना कर रहे। ✨
लोकतन्त्र के इस मंदिर का सिस्टम तैयार करने वाले निर्माताओं की मंशा राज्यसभा, के गठन से समझ मे आती है, जो व्यवस्था बनाने वाले चाहते थे कि सूक्ष्म सी आवाज देश की नीति निर्धारक बॉडी में पहुचें।
सुना जाना, प्रश्न,विमर्श,करेक्शन, सहमति-संसद का एसेंस है। क्योकि उसी का फैसला सुप्रीम है
लोकसभा सीधे जनता के वोट से बनती है। सभी दल अपने कैंडिडेट देते है। लोग निर्दलीय भी लड़ सकते हैं। नियम है- फर्स्ट पास्ट द पोस्ट। जिसके दल के कम सांसद हों, वह विपक्ष में बैठता है। अमूमन इससे सब वाकिफ है।
राज्यसभा, राज्यो की सभा है। इसके द्वारा हर राज्य को अतिरिक्त सांसद दिये जातेहै
व्हाट इट मीन्स टू बी LOP... नेता विपक्ष?
सदन में खड़ा वह नेता, जिसे बहुमत नही मिला? इतना ही?
कॉन्स्टिट्यूशन क्या कहता है?
कहता है- संसद सुप्रीम है।
देश को सरकार नही चलाती। राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री नही चलाता। संसद चलाती है। संसद का मतलब- लोकसभा+ राज्यसभा+ राष्ट्रपति
@CuteAaruhi3 मेरे जानकारी में आजतक कभी 80% वोटिंग नहीं हुई तो तुम्हारा सर्वे कैसे हो सकता है, पहले पता करो भारत के कितने % लोग X पर है, फिर प्रोपगंडा फैलाना।
@askrajeshsahu आप की पत्रकारिता पर फक्र है।
महाकुंभ से लेकर, आज तक आप की पत्रकारिता एक अलग पहचान स्थापित कर लिया है।
अपना फोन नंबर दीजिएगा,
मुझे उम्मीद है आप की पत्रकारिता
.... मीडिया में कभी नही गिनी जाएगी।