#HappyLiving:
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275
जीवन की भूल-भुलैया में
जब सबकुछ अनजाना होता
इक किरण कहीं से आती है
चमका जाती पूरा रस्ता
बिगड़ी पल में बन जाती है
राहें मंजिल ले जाती हैं
आलोकं शरणं गच्छामि
गोविंदं शरणं गच्छामि
274
है यहीं युद्ध का नियम अटल
बलशाली हो सत्पथ पर हो
रहबर हो कोई कृष्ण जैसा
शौरज, धीरज रणकौशल हो
इसलिए सदा तैयार रहो
रण आए तो स्वीकार करो
स्वीकारं शरणं गच्छामि
गोविंदं शरणं गच्छामि
273
हैं कई युद्ध में फिर से रत
है इक नूतन छिड़ा महाभारत
जीतेगा सत्य सुनिश्चित है
रे मन भज हरि ओम् तत्सत्
रब जो चाहेगा वह होगा
जो भी होगा मंगल होगा
अथ मंगल शरणं गच्छामि
गोविंदं शरणं गच्छामि
272
है विकट समय प्रलयकारी
हर तरफ युद्ध का शोर मचा
जो मध्य पूर्व से धुआं उठा
यह कितना कहर मचाएगा
जर्रा-जर्रा हाजिर हुजूर
जाने उसको है क्या मंजूर
स्वीकारं शरणं गच्छामि
गोविंदं शरणं गच्छामि
271
जीवन में रहती है उमंग
कुछ नूतन सदा किए जाओ
बगिया कितनी भी सुंदर हो
कुछ नूतन बीज बोए जाओ
मौसम का रंग बदलता है
कुछ नूतन होता रहता है
अथ नूतन शरणं गच्छामि
गोविंदं शरणं गच्छामि
270
माना हर युद्ध भयंकर है
लगता होगा भीषण विनाश
लेकिन यह भी आवश्यक है
मंगलमय है मत हो उदास
है युद्ध और शांति ऐसे
जग में है दिवस रात्रि जैसे
अथ शंातिं शरणं गच्छामि
गोविंदं शरणं गच्छामि
269
चाहे जितना भी संकट हो
इक दिन अवश्य टल जाता है
कुछ मनन करो पुरुषार्थ करो
कुछ समाधान मिल जाता है
कुछ शौर्य करो कुछ कर्म करो
सद्गुरु से मिल सत्धर्म करो
पुरुषार्थं शरणं गच्छामि
गोविंदं शरणं गच्छामि
268
धीरज से मेघ बरसता है
धीरज से धूप निकलती है
धीरज का फल मीठा होता
धीरज से व्याधि मिटती है
धीरज से रण जीता जाता
धीरज से प्रभु पाया जाता
अथ धैर्यं शरणं गच्छामि
गोविंदं शरणं गच्छामि
267
दोनों साँसों को समस्वर कर
बिन्दु पर ऊर्जा ले जाओ
कुंडलिनी खुद जग जाएगी
मंगल के गीत सदा गाओ
संसारी रहता बस्ती में
साधू रहता है मस्ती में
आनंद शरणं गच्छामि
गोविंदं शरणं गच्छामि
266
हैं साधु वेश में धूर्त बहुत
लोगांे का शोषण करते हैं
आत्मा का कोई ज्ञान नहीं
बातों की रोटी खाते हैं
संगत इनकी है खतरनाक
हरकत इनकी है शर्मनाक
सत्संगति शरणं गच्छामि
गोविंदं शरणं गच्छामि
264
है जीत हार की होड़ मची
हर ओर युद्ध की लगी आग
अपनी-अपनी डफली सबकी
अपना अपना है छिड़ा राग
अब महफिल सजती कहीं नहीं
गीतों में है सुर ताल नहीं
अथ उत्सव शरणं गच्छामि
गोविंदं शरणं गच्छामि
263
घट में आनंद सूर्य जैसा
फिर भी दुख का अंधियारा क्यों
है शांति आदमी की तलाश
फिर धर्मयुद्ध का नारा क्यों
है अहंकार हाबी सब पर
किंचित न भरोसा है रब पर
आनंदं शरणं गच्छामि
गोविंदं शरणं गच्छामि
262
कोई निर्गुण की बात करे
कोई शिव से साक्षात् करे
मैं दोनों से ही राजी हूँ
बाजीगर की मैं बाजी हूँ
दोनों से है पहचान मुझे
दोनों के प्रति सम्मान मुझे
अद्वैतं शरणं गच्छामि
गोविंदं शरणं गच्छामि