BJP चाहती तो दिन-रात दलितों के खिलाफ हिंसक माहौल बनाने वाले और मां-बहन की गालियां देने वाले उन्मादियों को NSA के तहत जेल भेजकर मामला शांत कर सकती थी।
लेकिन BJP इन लोगों को संरक्षण देती रही। ऐसे में दलितों ने तय किया है कि वे जातिवादियों पर कार्रवाई कराएंगे।
मनुवादियों का धन्यवाद, जिन्होंने सोए हुए बहुजन समाज को जगा दिया।
अब बहुजन समाज सिर्फ आरक्षण बचाने की नहीं, बल्कि निजी क्षेत्र में आरक्षण बढ़ाने और कॉलेजियम सिस्टम को खत्म कर न्यायपालिका में पारदर्शी प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने की मांग को लेकर सड़कों पर उतर चुका है।
आईआईटी मंडी में 4 सितंबर को आयोजित एक धार्मिक कार्यक्रम में प्रदर्शित पोस्टर उस जातिवादी मानसिकता का प्रमाण है, जिसे देश के प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों में भी जगह मिल रही है। शूद्रों (SC, ST और OBC) को “उच्च वर्गों की सेवा करने” वाला बताने वाला यह पोस्टर न केवल आपत्तिजनक, बल्कि बेहद गंभीर और चिंताजनक है।
यह भाषा सामाजिक बराबरी और संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ है। किसी भी धर्मग्रंथ की व्याख्या के नाम पर जन्म के आधार पर किसी समुदाय को ऊंचा या नीचा बताना स्वीकार नहीं किया जा सकता।
वर्ष 2014 से 2021 के बीच उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत भेदभाव के कारण 72 छात्रों की मृत्यु हुई, लेकिन इसी अवधि में जातिगत भेदभाव के कथित “फर्जी आरोप” से किसी छात्र का भविष्य बर्बाद होने का कोई प्रमाणित मामला सामने नहीं आया।
माननीय उच्चतम न्यायालय से हमारा निवेदन है कि UGC (उच्च शिक्षा संस्थानों में समता के संवर्द्धन हेतु) विनियम, 2026 पर लगी रोक को शीघ्र हटाया जाए और इसे प्रभावी रूप से लागू करने का मार्ग प्रशस्त किया जाए। साथ ही, @mygovindia इसे कानून का रूप देकर प्रभावी एवं बाध्यकारी बनाए, ताकि उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत भेदभाव पर ठोस रोक लग सके और छात्रों को सुरक्षित, सम्मानजनक एवं भेदभाव-मुक्त शैक्षणिक वातावरण सुनिश्चित किया जा सके।
परम पूज्य बाबा साहेब के बराबरी के भारत में जन्म के आधार पर कोई “उच्च” या “सेवा करने वाला” नहीं हो सकता।
शिक्षा के मंदिरों में जाति की दीवारें नहीं, बराबरी के दरवाजे खुलने चाहिए।
#SupremeCourtOfIndia
#SupremeCourt
#CJISuryaKant
#ASP_K_Support_UGC_Act
#ASP_K_Support_UGC_Act
सुल्तानपुर में श्री कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर कुछ वर्चस्वादियों ने जिस तरह जन्माष्टमी के आयोजन में बाधा-अड़चन डालकर पूजा-अर्चना का खंडन किया है वो सिर्फ़ किसी समुदाय की आस्था पर प्रहार ही नहीं पाप भी है और अपराध भी।
इस मामले की उच्च स्तरीय जाँच हो और दोषी प्रभुत्ववादियों को ऐसी सज़ा मिले कि फिर कभी किसी का घमंड सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने का दुस्साहस न कर सके।
इन जैसी घटनाओं के पीछे उच्चता की दुर्भावना काम करती हैं और ऐसा करने के पीछे ‘सत्ता सजातीय होने का अहंकार’ मूल कारण होता है।
सब जानते हैं कि धर्म-कर्म में बाधा उत्पन्न करनेवालों को क्या कहते हैं।
घोर निंदनीय!
निशु, घबराने की ज़रूरत नहीं है। मैं तुम्हारे साथ हूँ।
साफ है कि तुम्हें इसलिए निशाना बनाया गया क्योंकि तुम अपने समुदाय और छात्रों के हक़ की आवाज़ उठाती हो।
अमित शाह की दिल्ली पुलिस एक तरफ़ छात्रों के साथ अमानवीय बर्बरता करती है। दूसरी तरफ़ एक दलित लड़की के पिता का सिर फोड़ने वाला अपराधी खुलेआम घूम रहा है।
@narendramodi जी, @AmitShah जी - ऐसे अपराधी को आपका और आपकी पार्टी के लोगों का संरक्षण क्यों है? अब भी कार्रवाई होगी या किसी को बचाते रहेंगे?
निशु, तुम्हारी लड़ाई अकेली नहीं है। हम तब तक नहीं रुकेंगे जब तक न्याय नहीं मिल जाता।
जय भीम। जय संविधान।
सरकारी पैसों की बर्बादी देखिए..
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के पैतृक घर में पिछले 20 साल से कोई नहीं रहता है लेकिन उस घर की सुरक्षा के लिए पिछले 20 साल से PAC का पूरा कैंप ड्यूटी देता है जिसमें 15 जवान चौबीसों घंटे तैनात रहते हैं!
टैक्स पेयर के पैसों की ऐसी बर्बादी इतिहास में आपने आज तक नहीं सुनी होगी.!
राजीव रंजन की पत्रकारिता को भी भी सलाम करता हूँ जिन्होंने ये सच दुनियां को दिखाया!
“च***र हमारे यहाँ कुर्सियों पर नहीं बैठ सकते, यह हमारे गाँव की मर्यादा है।”
2026 के भारत में भी किसी दलित का कुर्सी पर बैठना जातिवादी वर्चस्व को चुनौती लगता है। कैसी “मर्यादा”, जो किसी इंसान के अपमान और जातीय श्रेष्ठता पर टिकी हो?
संविधान ने बराबरी का अधिकार दे दिया, लेकिन वर्चस्ववादियों के दिमाग़ से ऊँच-नीच नहीं निकली। लड़ाई सिर्फ़ एक कुर्सी की नहीं है - सम्मान, सत्ता, संसाधन और बराबर की हिस्सेदारी की है।
When this attack happened, I personally went to the DCP and asked him to arrest these goons. The DCP replied, “We can’t arrest people randomly.”
I told him, “The attack happened right in front of the police. How can you say you can’t arrest them?”
To which the DCP replied, “You are free to go to the courts”
Such is the attitude of Delhi Police.
Mr PM @narendramodi, this man is saying he has the गूदा to break open Nishu’s father’s head and admit it on camera.
Will the PM order Delhi Police to arrest this man for the crimes he’s admitting? Or should Indians accept a lawless system?
Cockroaches have the गूदा to ensure justice for Nishu’s father.
पिछले साल पहलगाम में आतंकवादियों ने धर्म पूछकर लोगों को मारा था और पूरे देश ने उस नफ़रत की निंदा की थी। अब दिल्ली में 4PM की पत्रकार शाहीन खान और नफीसा खान का आरोप है कि पुलिस ने उनके साथ मारपीट की और मुस्लिम होने तथा ‘खान’ सरनेम का पता चलते ही हिंसा और बढ़ गई।
आतंकवादी धर्म पूछकर मारें तो आतंक है, लेकिन सुरक्षा देने वाली पुलिस पर धर्म देखकर पीटने का आरोप लगे तो इसे क्या कहेंगे?
भाजपा बताए - क्या सांप्रदायिक नफ़रत का ज़हर अब वर्दी और व्यवस्था तक पहुँच चुका है?
“बना लो, वायरल कर देना… अखिलेश यादव को दे देना!”
मैनपुरी के CO City अशोक सिंह का यह अंदाज़ देखिए। वर्दी का रौब, सत्ता की अकड़ और ऊपर से मूंछों पर ताव!
योगी राज में यूपी पुलिस पर “ठाकुरवाद” और सत्ता-संरक्षित जातीय वर्चस्व के आरोप यूँ ही नहीं लगते। जब वर्दी में बैठा अफ़सर जनता से कानून की भाषा में बात करने के बजाय विपक्ष के नेता का नाम लेकर चुनौती देने लगे, तो सवाल सिर्फ़ एक पुलिसवाले के व्यवहार का नहीं रह जाता - सवाल उस सत्ता-संस्कृति का होता है, जिसने ऐसी अकड़ को बेख़ौफ़ बनाया है।
क्या यूपी पुलिस संविधान से चलेगी या सत्ता की जातीय हनक से?
भीमटे, चोर-चम*र, नीले कबूतर, भंगी, जूते पोलिश करने वाले - ये कुछ गालियाँ हैं जो जातिवादी लोग सार्वजनिक रूप से और ऑनलाइन दलितों को दे रहे हैं।
अगर ब्राह्मणवादियों और मनुवादियों को लगता है कि ये जातिवादी गालियां देके तुम हमें चुप करा लोगे तो मेरी बात ज़रा अच्छे से, ध्यान से सुन लो!
जब भी तुम ज़हर उगलते और, तो हमें कमज़ोर नहीं कर रहे बल्कि खुद की जातिवादी मानसिकता को बेनकाब कर रहे हो।
तुम्हारे गालियों से तुम्हारी ब्राह्मणवादी और मनुवादी की सड़ी हुई सोच साफ़ झलकती है। और हर बार जब तुम बाबासाहेब, आरक्षण को और हमें गलियाँ देते हो, तुम हमें ये याद दिलाते हो कि फुले-शाहू-अंबेडकर का आंदोलन कितना ज़रूरी हैं!
साफ़ है कि संविधान और आरक्षण के ज़रिए समानता और एससी, एसटी और ओबीसी की तरक्की को ब्राह्मणवादी और मनुवादी पचा नहीं पा रहे हैं।
जब-जब ब्राह्मणवादी और मनुवादी हमें गालियाँ दोगे तब-तब हम जय भीम बोलेंगे, जय संविधान बोलेंगे!
जब-जब ब्राह्मणवादी और मनुवादी हमें नीचा दिखाने की कोशिश करोगे तब-तब हम और शिक्षित होंगे, संगठित होंगे, और आंदोलन करेंगे, जैसे बाबासाहेब ने हमें सिखाया है।
तुम्हारी घृणा और गंदी गालियां दुनिया को याद दिलाती हैं कि आज भी एससी, एसटी और ओबीसी के ख़िलाफ़ जातिगत भेदभाव कितना गहरा है, सामाजिक न्याय कितना जरूरी है, और एससी, एसटी और ओबीसी का आरक्षण कितना जरूरी है।
जय भीम 💙
जय संविधान. जय भारत 💪🏻
This is no joke!
Instead of fixing the education system, the government finds detaining 6-year-olds a convenient fix to the problem.
Where are we even headed?
“आंबेडकर ने आरक्षण सिर्फ़ 10 साल के लिए दिया था” - यह झूठ इतने आत्मविश्वास से बोला जाता है, जैसे संविधान की मूल प्रति इन्हीं के घर की अलमारी में रखी हो!
संविधान खोलने की जहमत उठा लीजिए। 10 साल की समय-सीमा नौकरी और शिक्षा के आरक्षण के लिए थी ही नहीं। यह लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में SC-ST की आरक्षित सीटों यानी राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जुड़ी थी। मूल अनुच्छेद 334 में इसकी शुरुआती अवधि 10 वर्ष थी। सरकारी नौकरियों में पिछड़े वर्गों के आरक्षण का आधार अनुच्छेद 16(4) है - उसमें 10 साल की कोई समय-सीमा नहीं।
अब दूसरा ज्ञान दिया जाता है - “तो 10 साल बाद राजनीतिक आरक्षण भी खत्म क्यों नहीं हुआ?”
क्योंकि संविधान कोई मोबाइल रिचार्ज नहीं था कि दस साल की वैधता खत्म हुई और सेवा बंद! दस साल पूरे होने से पहले संसद ने माना कि SC-ST के राजनीतिक प्रतिनिधित्व की विशेष व्यवस्था की जरूरत समाप्त नहीं हुई थी। इसलिए 8वें संविधान संशोधन, 1959 से इसे अगले दस वर्षों के लिए बढ़ाया गया। बाद में संसद ने संवैधानिक संशोधनों के जरिए इसे आगे बढ़ाया।
इसलिए अगली बार कोई बाबा साहब के नाम पर यह ज्ञान परोसे कि “आरक्षण तो सिर्फ़ 10 साल के लिए था”, तो उससे बस दो सवाल पूछिए -
कौन-सा आरक्षण? और संविधान के किस अनुच्छेद में लिखा है कि नौकरी और शिक्षा का आरक्षण 10 साल बाद खत्म हो जाएगा?
‘गाँव’ गोद लेने की बात करनेवालों के बुरे दिन आ गये हैं, वो अब अपने ही ख़िलाफ़ हो रहे प्रोटेस्ट के ‘आंदोलनकारियों’ को गोद लेने पर मजबूर हैं।
मुख्यमंत्री जी के सूचनार्थ-ज्ञानार्थ : P से Protest भी होता है।