सुबह के छह बज चुके हैं। हेलमेट पहनकर, टूलकिट उठाकर मैं फिर तैयार हूँ। देश की जीवनरेखा को दुरुस्त रखने के लिए। मैं हूँ एक ट्रैकमेंटेनर, भारतीय रेल का एक अनदेखा लेकिन अहम हिस्सा।
जब ज़्यादातर लोग अभी नींद से उठे भी नहीं होते, मैं और मेरी टीम पहले से ट्रैक पर होते हैं। मेरी ड्यूटी सुबह 6:00 बजे शुरू होती है और 16:00 बजे तक चलती है। हालांकि 9:00 से 11:00 तक हमें लंच और थोड़ा आराम मिलता है, पर ज़मीन की तपिश हो या सर्द हवा, हमें हमेशा सतर्क रहना होता है।
मेरे काम में केवल पटरियों की मरम्मत नहीं, बल्कि करोड़ों यात्रियों की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी भी शामिल है। मुझे हर नट-बोल्ट, जॉइंट, स्लिपर और ट्रैक लाइन की बारीकी से जांच करनी होती है। कहीं कोई दरार तो नहीं, कोई ढीलापन तो नहीं हर छोटी बात बड़ी दुर्घटना में बदल सकती है।
ट्रैक की लाइनें केवल लोहे की नहीं हैं, यह भरोसे की रेखाएँ हैं। अगर मैं एक क्रैक को नज़रअंदाज़ कर दूँ, तो एक पूरी ट्रेन खतरे में पड़ सकती है। यही सोचकर हर सुबह, हर थकान के बावजूद, मैं मन से काम करता हूँ।
हर हफ्ते एक दिन रेस्ट मिलता है, मगर दिमाग तब भी रेल की धुन में ही रहता है। कई बार लोग हमें सिर्फ मज़दूर समझ लेते हैं, पर उन्हें क्या पता रेल की स्पीड और सेफ्टी के पीछे हमारी मेहनत छिपी है।
मैं गर्व से कहता हूँ- मैं ट्रैकमेंटेनर हूँ, मैं भारतीय रेल की नींव को मज़बूत बनाता हूँ। मेरी पसीने की बूँदें रेल की आवाज़ में बदलती हैं। जब कोई ट्रेन सीटी मारते हुए आगे बढ़ती है, तो मुझे लगता है मेरी ड्यूटी सफल रही।
🌿 गर्व का क्षण 🌿
जून 2025 तक भारत में 91 रामसर स्थल हो चुके हैं।
🇮🇳 इसमें हाल ही में शामिल हुए हैं:
1️⃣ खीचन, फलोदी, राजस्थान – जहाँ हर साल हजारों कुरजां पक्षी आते हैं।
2️⃣ मेनार, उदयपुर, राजस्थान – जिसे 'पक्षियों का गांव' कहा जाता है।
• राजस्थान अब सिर्फ रेगिस्तान नहीं, समृद्ध जैव विविधता का भी प्रतीक है।