जीने नहीं देती
किसी को खामोशी से
ये प्रपंच करती स्त्रियां
थकती भी नहीं कभी
दूसरो के जीवन में
ज़हर
घोलते- घोलते।
मगर,
ये भूल जाती है
वो ज़हर घोलती स्त्रियां
यही
ज़हर
किसी दिन
उसके ही जीवन में
उतर आएगा
कभी,
तब सारे
प्रपंच
धरे रह जाएंगे!!
~सखी
वो प्रपंच करती स्त्रियां
कहती है
प्रपंच पसंद नही,
अपनी राजनीति से
दूसरो को घाव देती।
ओर कहती
कि
ढलना राजनीति में पसंद नही,
वो दिखलाती है
ख़ुद को कृत्यनिष्ठ
मगर
वो स्त्रियां भरी है
नफ़रत और ईर्ष्या से
दूसरों के जीवन में
बांटती है
ज़हर
खेलती है दांव
जैसे हो कोई शकुनी पुत्री।