Have you ever wondered why people follow Jyotish/Astrology? Is jyotish a truth, or is it some kind of belief system?
I have explored the topic. Please read.
From Calculation to Consolation: The Logic Behind Phalit Jyotish and How We Turn Math Into Meaning
1. When Logic Feels Like Magic:
Mathematics is often perceived as the epitome of rationality and precision, yet to many, it carries an almost mystical allure. No matter where you are in the world, 2 + 2 always equals 4. Its rules are unwavering and dependable.
In a world rife with uncertainty and emotional turmoil, this consistency acts like an anchor, providing a sense of stability. For centuries, humans have turned to mathematics and patterns to find meaning. From astrology to numerology, we have extended the realm of logic into the domain of symbolism—using numbers and planetary positions not merely for calculations but for weaving narratives.
In moments of emotional need, we project our inner experiences onto the structured framework of mathematics, deriving personal meaning from its order. This essay delves into this psychological process, with a focus on Phalit Jyotish (predictive astrology), exploring how we transform precise calculations into comforting stories that address our deepest human needs.
सोनू, गोलू एंड विन्नी गोइज़ टू इसकूल इन रैनी छीजन। मम्मी ने बोले हैं नाक के सीधे चलने हैं, किसी से नो गपशप, ओनली कूल गोइंग।
नीट जो निकालने हैं.
रेन कोम्स, रेन गोज,
बट बरसाती प्रोटैक्ट्स अस हर रोज़.
@NatkhatO@prabhat_t99@Vini_colours
आप देखेंगे कि बीजेपी सरकार के दौरान होने वाले लगभग हर विरोध प्रदर्शन में कुछ बातें मानो अनिवार्य रूप से दिखाई देती हैं.
पहली, वहाँ कोई न कोई अब्दुल अपनी बिरयानी लेकर जरूर पहुँच जाएगा.
दूसरी, किसी न किसी रूप में हिंदू प्रतीकों, हिंदू सभ्यता और हिंदू संस्कृति के प्रति अपमानजनक टिप्पणियाँ या गाली-गलौज भी देखने को मिलेगी.
किसी भी समाज या व्यवस्था का निर्माण एक दीर्घकालिक और जटिल प्रक्रिया है। मजबूत संस्थाओं का निर्माण, साझा मूल्य-व्यवस्था का विकास, न्यायपूर्ण नियमों की स्थापना और नागरिक संस्कृति का परिपक्व होना समय मांगता है। इसके विपरीत, क्रांति प्रायः सामूहिक उद्वेग और भावनात्मक उन्माद से जन्म लेती है। जो लोग क्रांति का नेतृत्व करते हैं, वे अक्सर इसी कला में दक्ष होते हैं कि जनभावनाओं को तीव्र बनाकर राजनीतिक लामबंदी कैसे की जाए और विद्यमान व्यवस्था को कैसे ध्वस्त किया जाए।
यहीं सबसे बड़ी समस्या उत्पन्न होती है। कोई भी व्यवस्था पूर्णतः अच्छी या पूर्णतः बुरी नहीं होती। उसमें कमियां भी होती हैं और अनेक ऐसी उपलब्धियां भी, जिन्हें लोग स्वाभाविक मानकर भूल जाते हैं। जब किसी व्यवस्था को पूरी तरह तोड़ा जाता है, तो उसके दोषों के साथ-साथ उसके गुण भी नष्ट हो जाते हैं। चूंकि व्यवस्था के सकारात्मक पक्ष अक्सर सामान्य जीवन का हिस्सा बन चुके होते हैं, इसलिए उनके महत्व का एहसास तभी होता है जब वे समाप्त हो जाते हैं।
नई व्यवस्था बनाना केवल पुरानी व्यवस्था को नष्ट कर देने से संभव नहीं होता। इसके लिए समाज, सत्ता, अर्थव्यवस्था और संस्थाओं की गहरी समझ आवश्यक है। यह समझ होनी चाहिए कि शक्ति कैसे उत्पन्न होती है और उसका संतुलन कैसे बनाए रखा जाता है; मानवाधिकारों की वास्तविक अवधारणा क्या है; स्वतंत्र और उत्तरदायी संस्थाएं कैसे विकसित होती हैं; संपत्ति और समृद्धि कैसे उत्पन्न होती है; न्यायपूर्ण अधिकार-वितरण कैसे सुनिश्चित किया जाता है; न्यायपालिका और अन्य संवैधानिक संस्थाएं किस प्रकार कार्य करती हैं। इन्हीं आधारों पर टिके संस्थागत ढांचे किसी समाज को दीर्घकालिक स्थिरता और समृद्धि प्रदान करते हैं।
इसी कारण क्रांति के प्रति वामपंथी और तथाकथित लिबरल वर्ग का लगभग रोमानी आकर्षण गंभीर आलोचना का विषय होना चाहिए। आधुनिक लोकतांत्रिक समाज में परिवर्तन का आधार संस्थागत सुधार, संवैधानिक प्रक्रिया और सार्वजनिक विमर्श होना चाहिए, न कि भावनात्मक उन्माद और भीड़ की राजनीति।
बड़े समूहों को भावनात्मक उन्माद में धकेलकर, जीवन और संपत्ति का विनाश करते हुए राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति करना अल्पकालिक रणनीति तो हो सकती है, परंतु यह किसी समाज को दीर्घकालिक स्थिरता, स्वतंत्रता और समृद्धि की ओर नहीं ले जाती। इतिहास बार-बार यही संकेत देता है कि टिकाऊ परिवर्तन क्रांति से कम और मजबूत संस्थाओं, विवेकपूर्ण सुधारों तथा सामाजिक परिपक्वता से अधिक आते हैं।
अक्सर देखा जाता है कि वामपंथी विचारधारा से जुड़े एजेंडाबाज, सत्तालोलुप activists हिंसक क्रांति को मानो हर सामाजिक और राजनीतिक समस्या का अंतिम समाधान प्रस्तुत करते हैं। यह सोच काफी हद तक कार्ल मार्क्स की उस वैचारिक विरासत से प्रभावित है, जिसने पीढ़ियों तक यह विश्वास बनाए रखा कि व्यवस्था को जड़ से उखाड़ फेंकना ही परिवर्तन का सबसे प्रभावी मार्ग है।
यह कहना गलत होगा कि क्रांति अपने आप में हमेशा बुरी होती है। इतिहास में ऐसे अवसर भी आए हैं जब क्रांतियों ने आवश्यक परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त किया है। समस्या क्रांति से नहीं, बल्कि उसके वैचारिक और राजनीतिक दुरुपयोग से है। विशेष रूप से वामपंथी राजनीति में क्रांति का जिस प्रकार बार-बार उपयोग एक राजनीतिक उपकरण के रूप में किया जाता है, वह गंभीर समीक्षा का विषय है।
आज हमारे पास लगभग डेढ़-दो सौ वर्षों का ऐतिहासिक अनुभव उपलब्ध है। यदि विभिन्न क्रांतियों के बाद स्थापित व्यवस्थाओं का अध्ययन किया जाए, तो एक चिंताजनक प्रवृत्ति दिखाई देती है। अनेक मामलों में नई व्यवस्थाएं पहले की तुलना में अधिक केंद्रीकृत, अधिक दमनकारी और व्यक्तिगत अधिकारों के प्रति अधिक असहिष्णु सिद्ध हुई हैं। यह कोई संयोग नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरे कारण हैं।
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रील्स और इंटरनेट के दौर में अपनी राय सार्वजनिक रूप से व्यक्त करना पहले की तुलना में बहुत आसान हो गया है. समस्या यह है कि अक्सर लोग, विशेषकर कम उम्र में, बिना पर्याप्त समझ या अनुभव के अपने कच्चे और अपरिपक्व विचार सार्वजनिक रूप से व्यक्त कर देते हैं. उस समय उन्हें यह एहसास भी नहीं होता कि समाज, सत्ता, सामाजिक शक्तियाँ, सार्वजनिक विमर्श और जनमत की संरचना कितनी जटिल और बहुस्तरीय होती है. अपनी बात कहना केवल अभिव्यक्ति का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह भी समझना पड़ता है कि उसे किस संदर्भ, किस भाषा और किस जिम्मेदारी के साथ रखा जाए.
इसी कारण कई बार देखा जाता है कि किसी विवादित टिप्पणी के बाद कुछ समय पश्चात वही व्यक्ति सार्वजनिक रूप से माफ़ी माँगता हुआ दिखाई देता है. मेरे विचार से ऐसी परिस्थितियों में क्षमा का स्थान अवश्य होना चाहिए. मनुष्य से भूल होती है और समाज को सुधार की संभावना खुली रखनी चाहिए.
लेकिन केवल मौखिक माफ़ी पर्याप्त नहीं लगती. यदि गलती सार्वजनिक थी, तो उसके प्रायश्चित का स्वरूप भी कुछ ऐसा होना चाहिए जो व्यक्ति के भीतर वास्तविक परिवर्तन उत्पन्न करे. प्रायश्चित का उद्देश्य केवल दंड नहीं, बल्कि आत्मपरिष्कार होना चाहिए.
ऐसे में सार्वजनिक सेवा (public service) एक बेहतर विकल्प हो सकती है. उदाहरण के लिए, झुग्गी-बस्तियों में बच्चों को पढ़ाना, किसी सामुदायिक विद्यालय में स्वयंसेवा करना, सार्वजनिक स्थानों की स्वच्छता अभियान में भाग लेना, या समाजोपयोगी कार्यों में समय देना. ऐसे अनुभव व्यक्ति को समाज की वास्तविकताओं के अधिक निकट ले जाते हैं और उसके भीतर विनम्रता, संवेदनशीलता तथा उत्तरदायित्व की भावना विकसित करते हैं.
आख़िरकार, सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन बाहरी नहीं, बल्कि मन का परिष्कार है. जब व्यक्ति समाज के विविध वर्गों के साथ प्रत्यक्ष रूप से जुड़ता है, तब उसे अपनी सीमाओं और अपनी अपरिपक्वताओं का भी बोध होता है. वही अनुभव उसे एक अधिक परिपक्व, जिम्मेदार और बेहतर मनुष्य बनने की दिशा में आगे बढ़ाता है.
इस दृष्टि से केवल कैमरे के सामने बैठाकर किसी से माफ़ी मँगवा लेना अपेक्षाकृत सतही उपाय प्रतीत होता है. यदि उसके स्थान पर समाजोपयोगी सेवा को प्रायश्चित का माध्यम बनाया जाए, तो उससे न केवल संबंधित व्यक्ति का आत्मविकास होगा, बल्कि समाज को भी प्रत्यक्ष लाभ पहुँचेगा. ऐसी व्यवस्था दंड से अधिक सुधार और उत्तरदायित्व की संस्कृति को प्रोत्साहित करेगी.
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अगर हम थोड़ा इतिहास में पीछे जाकर देखें, तो पाएँगे कि आज तक किसी भी अपर क्लास या जनरल कैटेगरी से आने वाले प्रधानमंत्री ने विशेष रूप से "जनरल कैटेगरी के हितों" के लिए काम नहीं किया. इसकी वजह यह है कि "जनरल कैटेगरी के हित" अपने आप में कोई स्पष्ट और व्यवहारिक राजनीतिक अवधारणा नहीं है. इसे किसी एक संगठित हित-समूह की तरह परिभाषित करना संभव नहीं है.
हाँ, एक व्यावहारिक लक्ष्य अवश्य हो सकता है कि यह सुनिश्चित किया जाए कि जनरल कैटेगरी के साथ किसी प्रकार का भेदभाव न हो. लेकिन व्यवहारिक राजनीति की अपनी सीमाएँ और प्रोत्साहन (incentives) होते हैं.
लोकतांत्रिक राजनीति सामान्यतः उन समूहों को अधिक महत्व देती है जो अपेक्षाकृत एकजुट होकर, लगभग मोनोलिथिक तरीके से मतदान करते हैं. लेकिन किसी भी समूह के भीतर ऐसी राजनीतिक एकजुटता तभी बनती है, जब उसके सदस्यों में एक साझा पीड़ित-बोध (shared sense of victimhood) विकसित हो. इसलिए राजनीति समय-समय पर विभिन्न सामाजिक समूहों के भीतर इस पीड़ित-बोध को मजबूत करती रहती है, क्योंकि इससे उन्हें एक संगठित वोट बैंक के रूप में लामबंद करना अपेक्षाकृत आसान हो जाता है.
जनरल कैटेगरी के संदर्भ में चुनौती यह है कि उसके भीतर इस प्रकार का साझा पीड़ित-बोध स्वाभाविक रूप से निर्मित नहीं किया जा सकता. परिणामस्वरूप, जब राजनीतिक विमर्श किसी "शोषित" और किसी "विशेषाधिकार प्राप्त" वर्ग के द्वैत पर आधारित होता है, तो जनरल कैटेगरी को अक्सर स्वतः ही विशेषाधिकार प्राप्त पक्ष के रूप में प्रस्तुत कर दिया जाता है. चूँकि वह किसी अन्य आरक्षित श्रेणी का हिस्सा नहीं है, इसलिए राजनीतिक आख्यान में वह डिफ़ॉल्ट रूप से उसी स्थान पर खड़ी दिखाई देती है.
एक अर्थ में यह व्यवहारिक राजनीति की अंतर्निहित दुविधा है. चुनावी राजनीति प्रायः उन समूहों की ओर अधिक आकर्षित होती है जिन्हें एक साझा पहचान और साझा शिकायत के आधार पर संगठित किया जा सके. इसलिए यह समस्या किसी एक दल या सरकार तक सीमित नहीं है, बल्कि लोकतांत्रिक राजनीति की कार्यप्रणाली से भी जुड़ी हुई है.
फिर प्रश्न उठता है कि इसका समाधान क्या हो सकता है? इसका उत्तर मुख्यतः संवैधानिक और संस्थागत स्तर पर खोजा जाना चाहिए. ऐसी संवैधानिक व्यवस्था और संस्थाएँ, जो समानता, निष्पक्षता और विधि के शासन (rule of law) के सिद्धांतों की प्रभावी रक्षा करें, इस समस्या को सीमित कर सकती हैं. इसके साथ-साथ एक परिपक्व सार्वजनिक विमर्श और सक्रिय नागरिक समाज (civil society) भी आवश्यक है, जो सरकारों और राजनीतिक दलों को किसी भी वर्ग के साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार से रोके तथा नीति-निर्माण को न्याय, समान अवसर और संवैधानिक मूल्यों के आधार पर परखे.
हालाँकि वर्तमान भारतीय व्यवस्था में इन संस्थागत और सामाजिक तंत्रों की प्रभावशीलता अभी भी कई स्तरों पर सीमित दिखाई देती है. भविष्य में इनका विकास किस दिशा में होगा, यह भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता और समाज की नागरिक चेतना पर निर्भर करेगा.
मुझे लगता है कि भारत में शिक्षा का स्तर बढ़ने के बजाय कई मायनों में घटा है. इसके पीछे कुछ प्रमुख कारण हैं.
पहला कारण यह है कि शिक्षा की गुणवत्ता पर ध्यान देने के बजाय हमारा ज़ोर लगातार शिक्षा के विस्तार (inclusion) और अधिक से अधिक लोगों को औपचारिक शिक्षा प्रणाली में शामिल करने पर रहा है. इसके साथ ही शिक्षा का मूल उद्देश्य, अर्थात ज्ञान अर्जित करना और बौद्धिक विकास करना, धीरे-धीरे पीछे छूट गया है. उसकी जगह प्रमाणपत्र (certification) प्राप्त करना ही शिक्षा का प्रमुख लक्ष्य बनता गया है. परिणामस्वरूप, डिग्रियों और अंकों का महत्व वास्तविक ज्ञान से अधिक हो गया है.
इसी प्रवृत्ति का एक उदाहरण CBSE की मूल्यांकन प्रणाली में भी दिखाई देता है. वर्षों से बोर्ड का रुझान इस दिशा में रहा है कि अधिक से अधिक विद्यार्थियों को 90-95 प्रतिशत या उससे अधिक अंक प्राप्त हों. उत्तरपुस्तिकाओं के मूल्यांकन को अपेक्षाकृत उदार बनाया गया, क्योंकि 90 प्रतिशत एक आकर्षक और प्रतिष्ठित आंकड़ा बन चुका है, जिसे विद्यार्थी, अभिभावक और विद्यालय सभी प्राप्त करना चाहते हैं. इससे अंकों का महत्व बढ़ा, लेकिन उनकी विश्वसनीयता और वास्तविक शैक्षणिक गुणवत्ता पर प्रश्न भी खड़े हुए.
दूसरा महत्वपूर्ण कारण यह है कि सरकारों ने शिक्षा को एक दीर्घकालिक बौद्धिक निवेश के बजाय कई बार राजनीतिक साधन (political tool) के रूप में अधिक उपयोग किया है. शिक्षा नीति और उसके निर्णय अनेक अवसरों पर शैक्षणिक आवश्यकताओं की अपेक्षा राजनीतिक प्राथमिकताओं से अधिक प्रभावित दिखाई देते हैं.
एक अन्य कारण सरकारी शिक्षा व्यवस्था का लगातार कमजोर होना है. इसके परिणामस्वरूप शिक्षा का बड़ा हिस्सा निजी क्षेत्र के हाथों में चला गया. निजी संस्थानों ने कुछ क्षेत्रों में अवश्य बेहतर सुविधाएँ और प्रबंधन उपलब्ध कराया है, लेकिन उनका संचालन स्वाभाविक रूप से व्यावसायिक हितों से भी प्रभावित होता है. इसलिए जहाँ कुछ स्तर पर सुधार दिखाई देता है, वहीं समग्र रूप से देखें तो शिक्षा की गुणवत्ता में जितनी वृद्धि अपेक्षित थी, उतनी नहीं हुई. इसके विपरीत, शिक्षा के अवमूल्यन (devaluation) की प्रवृत्ति अधिक स्पष्ट दिखाई देती है.
इसलिए मेरा मानना है कि भारत की शिक्षा व्यवस्था में सबसे बड़ी चुनौती केवल अधिक लोगों को शिक्षित करना नहीं, बल्कि शिक्षा की गुणवत्ता, ज्ञान की प्रतिष्ठा और शैक्षणिक मानकों को पुनः केंद्र में लाना है.
पत्रकार देव कोटक के साथ जो हुआ, बिल्कुल ग़लत है. चैनल का गुस्सा इन पर निकालना बिल्कुल ठीक नहीं.
जो भी लोग मारपीट और हिंसा का रास्ता अपना रहे. वो बिल्कुल ठीक नहीं कर रहे. समझें इसे 🙏🏼
Mesopotamia was never the cradle of civilisation. India was.
I spent forty years in international shipping, not academia. When I began researching the history of maritime trade, I had no orthodoxy to defend. I followed the evidence, and it kept arriving in the same place: the Indian subcontinent.
Nineteenth century archaeologists dug in Mesopotamia because the climate preserved artefacts, the biblical sources pointed them there, and the Ottomans allowed the excavations. That is the entire basis for the myth of Mesopotamia as "the cradle of civilisation."
Nobody applied the same rigour to India. Mohenjo-daro was not discovered until 1922. By then the narrative had already hardened.
What was actually there was the largest civilisation of the ancient world. Three hundred cities. Fifty thousand people in each, by 2600 BC. Two thirds of them stood on the banks of the Sarasvati, the central and greatest of the seven rivers described in the Rig Veda, flowing down from the Himalayas before the river vanished entirely by 1900 BC. The Vedic kings claimed territory stretching "sea to sea," from Afghanistan to Maharashtra, some 1.5 million square miles, against Egypt's 13,000. A dock at Lothal built to handle thirty ships of sixty tons, unmatched in Europe for four thousand years. When it was first excavated, it was recorded as a bathing pool.
When the scale became impossible to dismiss, the theory was not corrected. It was replaced with a story of pale-skinned nomads from the steppe who supposedly arrived around 1500 BC and brought civilisation with them. There is no evidence. The chronology doesn't work. The Vedas describe no invasion.
In 2019 a Harvard-led genetic study revived the claim, and the press reported it as confirmation. It was not. The same study found the builders of these cities were indigenous. The Sarasvati river that the Rig Veda described had already dried up before these newcomers arrived. What the study also found is that a small group of men, arriving after the Sarasvati had already dried up, interbred with the existing population and left a genetic signature. That is all.
So, where they chose to dig was mostly an accident of climate and access. The Aryan invasion theory was constructed because an Indian civilisation that owed nothing to Caucasians was a fact the late nineteenth century could not accommodate.
Link to full Substack essay with sources in the comments below.
पहले हमको भी लगता था हटाओ यार प्रधान जी को।
फिर ये लोग विरोध करने आ गए। एकमात्र नियम है कि वामपंथी, कांग्रेस और आपिए जिस का विरोध करें, वो हमेशा सही होता है। और जिस हिसाब से ये लोग लगे हुए हैं, प्रधान जी कहीं नहीं जाने चाहिए।
सत्ता सिर्फ कुर्सी का नाम नहीं है. राजनीति में सत्ता का प्रोजेक्शन, संभावित सत्ता और शक्ति का आभास भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है. जो नेता अपने को सर्वशक्तिमान दिखाता है, उसके लिए हर चुनौती सिर्फ एक प्रशासनिक समस्या नहीं होती, बल्कि उसकी राजनीतिक हैसियत का सवाल भी बन जाती है. लेकिन राजनीति को ऑन-ऑफ स्विच की तरह भी नहीं समझना चाहिए. कोई एक घटना सीधे चुनावी नतीजों में नहीं बदलती. कई छोटे-बड़े कारक मिलकर अंततः राजनीतिक परिणाम पैदा करते हैं.
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि ऐसे लंबे टकरावों की कीमत आखिरकार देश ही चुकाता है. शाहीन बाग के आंदोलन की परिणति दिल्ली दंगों जैसी हिंसा में हुई, जिसकी सबसे बड़ी कीमत आम लोगों ने चुकाई, जिनमें बड़ी संख्या बीजेपी के समर्थकों और हिंदू समाज की भी थी. इसी तरह किसानों का आंदोलन जितने लंबे समय तक चला, उसकी आर्थिक लागत का अनुमान कई लाख करोड़ रुपये तक लगाया गया. आखिर यह बोझ कौन उठाता है? कोई नेता अपनी जेब से नहीं भरता. इसकी कीमत पूरा देश चुकाता है, और उसमें सरकार के अपने समर्थक भी बराबर के हिस्सेदार होते हैं.
मुझे लगता है कि बीजेपी की सबसे बड़ी कमजोरियों में से एक उसका कम्युनिकेशन और राजनीतिक संकटों को संभालने का तरीका है. कई मामलों में ऐसा लगता है कि पार्टी के पास न तो पर्याप्त राजनीतिक कल्पनाशक्ति दिखाई देती है और न ही दूरगामी रणनीतिक सोच.
उदाहरण के लिए UGC से जुड़े विवाद को ही देखें. सरकार चाहती तो इस पूरे मुद्दे पर कहीं अधिक प्रभावी ढंग से संवाद कर सकती थी. लेकिन बार-बार यही पैटर्न दिखाई देता है कि जब सबसे अधिक कम्युनिकेशन की जरूरत होती है, तब सरकार की ओर से स्पष्ट और समय पर संवाद लगभग गायब रहता है.
इसमें नरेंद्र मोदी की व्यक्तिगत कार्यशैली भी एक भूमिका निभाती हुई दिखाई देती है. ऐसा लगता है कि वे सार्वजनिक रूप से तभी बोलना पसंद करते हैं जब उन्हें स्वयं उचित लगे. शायद उनके मन में यह भाव रहता हो कि प्रधानमंत्री के रूप में वे किसी के दबाव या अपेक्षा के अनुसार प्रतिक्रिया क्यों दें. यह उनकी नेतृत्व शैली का हिस्सा हो सकता है, लेकिन इस शैली की एक राजनीतिक कीमत भी चुकानी पड़ती है.
यदि पिछले कुछ बड़े आंदोलनों को देखें, जैसे सिंधु बॉर्डर पर किसानों का आंदोलन, शाहीन बाग का विरोध प्रदर्शन, या दिल्ली दंगों के दौरान की परिस्थितियाँ, तो अक्सर यही रणनीति दिखाई देती है कि सरकार शुरुआत में बहुत कम हस्तक्षेप करती है और मानकर चलती है कि समय के साथ मामला अपने आप शांत हो जाएगा. लेकिन किसी संकट के अपने आप समाप्त हो जाने की उम्मीद करना अपने आप में कोई ठोस रणनीति नहीं है. कई बार यह इस बात का संकेत भी होता है कि सरकार के पास तत्काल कोई स्पष्ट योजना नहीं है.
परिणाम यह होता है कि जब स्थिति हाथ से निकलने लगती है, तब प्रतिक्रियाएँ अक्सर पैनिक या इमरजेंसी मोड में आती हैं. ऐसी परिस्थितियों में लिए गए फैसले स्वाभाविक रूप से उतने प्रभावी नहीं होते जितने पहले से सोची-समझी रणनीति के तहत लिए गए निर्णय होते.
NEET पेपर लीक का मामला इसका अच्छा उदाहरण है. इस घटना से करोड़ों छात्र, अभिभावक और परिवार प्रभावित हुए. ऐसी स्थिति में एक प्रभावी राजनीतिक प्रतिक्रिया यह हो सकती थी कि प्रधानमंत्री स्वयं सामने आते, पूरे मुद्दे को गंभीरता से संबोधित करते, प्रभावित छात्रों और उनके परिवारों के प्रतिनिधियों से मुलाकात करते और यह संदेश देते कि सरकार उनकी चिंता समझती है तथा समाधान के लिए प्रतिबद्ध है. इससे लोगों के भीतर यह भरोसा पैदा हो सकता था कि सरकार संवेदनशील और उत्तरदायी है. मेरी दृष्टि में इस मामले में मोदी व्यापक स्तर पर प्रभावी नेतृत्व दिखाने में असफल रहे.
मुझे यह भी लगता है कि मोदी की कार्यशैली में कुछ व्यक्तिगत आग्रह और विश्वास इतने मजबूत हैं कि वे कई बार व्यावहारिक राजनीतिक विकल्पों पर भारी पड़ जाते हैं. उनके आसपास मौजूद अनेक समर्थक और नेता भी इन निर्णयों का आलोचनात्मक मूल्यांकन करने के बजाय उन्हें सही साबित करने में अपनी पूरी बौद्धिक और भाषाई ऊर्जा लगा देते हैं.
इसका नुकसान केवल बीजेपी को ही नहीं उठाना पड़ता. इसका असर उन मतदाताओं पर भी पड़ता है जिन्होंने पार्टी पर भरोसा किया है, और अंततः पूरे समाज को भी उसकी कीमत चुकानी पड़ती है, क्योंकि लंबे समय तक चलने वाला सामाजिक असंतोष सभी को प्रभावित करता है.
व्यावहारिक राजनीति में किसी भी विरोध या असंतोष को शांत करने, उसका दबाव कम करने और उसे संस्थागत संवाद के माध्यम से नियंत्रित करने के अनेक तरीके होते हैं. लेकिन मोदी की राजनीति की अपनी एक अलग यात्रा, सोच और कार्यशैली है. उसी के अनुरूप फैसले लिए जाते हैं. परिणामस्वरूप कई बार निर्णय इस आधार पर नहीं लिए जाते कि किसी स्थिति को सबसे प्रभावी ढंग से कैसे संभाला जाए, बल्कि इस आधार पर लिए जाते हैं कि वे उनकी स्थापित राजनीतिक शैली और व्यक्तिगत दृष्टिकोण के अनुरूप हैं.
मोदी सिर्फ़ राजनीतिक दबाव ही समझते हैं. नैतिक अपील, नीतिगत बहस या सोशल मीडिया का शोर उन्हें तब तक नहीं हिलाते, जब तक उनकी राजनीतिक कीमत न बनने लगे. किसान आंदोलन इसका अच्छा उदाहरण है. सरकार तब पीछे हटी, जब मामला राजनीतिक रूप से महंगा पड़ने लगा. जबकि देश को उसका बहुत नुक़सान हुआ.
मोदी की राजनीति में एक अलग ही फितूर दिखता है. जैसे मन में यह भाव हो कि "मैं सम्राट हूँ. कोई मुझे क्यों बताए कि कब बोलना है, कब झुकना है या क्या करना है? मैं तय करूँगा कि दूसरों को क्या करना है." यही शाही मानसिकता उन्हें ज़रूरत पड़ने पर भी समय रहते रुख बदलने से रोकती है. राजनीति में इसकी कीमत अक्सर बाद में चुकानी पड़ती है.
Dev Kotak, Times Now reporter.
A leaderless protest, will always lead to anarchy. Now different political parties are trying to be the head of this protest. The ones who started this are hiding.