चेतन बोध वह दृष्टि है, जो वस्तुओं को वैसा ही देखती है जैसी वे वास्तव में होती हैं, न कि वैसी, जैसी हमारी इच्छाएँ, भय अथवा धारणाएँ उन्हें प्रदर्शित करती हैं।
कौन-सा तंत्र साधूँ कि मेरे अंतर्मन की पीड़ा आपकी आँखों तक पहुँच सके। प्रेम की गलियाँ आज सूनी और शुष्क पड़ी हैं। आओ! अपने स्नेह की वर्षा से उन्हें पुनः सरस और सजीव कर दें!
दूरी ने प्रेम को कभी कम नहीं किया, हमने आपको भूलने का ख्याल नहीं किया। भले ही मुलाकातें अब न होती हो आपसे, पर आपकी यादें कोई मुलाकात से कम नहीं............