आज कोलकाता हवाई अड्डे पर पूर्व सांसद व डोमा परिसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. उदित राज जी का कोलकाता एयरपोर्ट SC/ST एसोसिएशन और पश्चिम बंगाल डोमा परिसंघ राज्य पदाधिकारियों द्वारा भव्य स्वागत किया गया।
कोलकाता एयरपोर्ट में पश्चिम बंगाल डोमा परिसंघ के प्रदेश अध्यक्ष बासुदेब मंडल, राष्ट्रीय अध्यक्ष गीतांजलि बरूआ ,डोमा परिसंघ महिला विंग, राज्य महासचिव रुकैया बीबी समेत पश्चिम बंगाल राज्य डोमा परिसंघ टीम के अन्य सदस्यों ने राष्ट्रीय अध्यक्ष का गर्मजोशी से स्वागत किया।
डोमा परिसंघ की महारैली 30 नवंबर को होगी यहां से भारी संख्या में लोग रैली में एकजुट होंगे। समाज के विकास और एकता के लिए सभी ने अपने विचार साझा किए।
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DOMA PARISANGH National Convention
डॉ उदित राज (पूर्व सांसद) के नेतृत्व में आज दलित, ओबीसी, मॉइनॉरिटीज और आदिवासी परिसंघ (डोमा) के बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का राष्ट्रीय अधिवेशन एनडीएमसी ऑडिटोरियम, जंतर मंतर, नई दिल्ली में संपन्न हुआ। पूरे देश से लगभग 500 प्रतिनिधि शामिल हुए। सभी वर्ग के प्रमुख लोगों ने अपने-अपने विचार व्यक्त किए और निष्कर्ष पर पहुँचा गया कि 85% उल्लेखित समाज एक सूत्र में होकर साम्प्रदायिक, मनुवादी और फासीवादी ताकतों के ख़िलाफ़ संगठित हों। एक तरह से यह नई मुहिम है जिसका नेतृत्व दलित, मुस्लिम, पिछड़ा, आदिवासी और ईसाई का नागरिक समाज करेगा। नागरिक समाज पहले भी सामाजिक और सांस्कृतिक आंदोलन किए लेकिन उनका नेतृत्व हमेशा सवर्ण समाज के हाथ में रहा है । कारणों में बिना जाये यह कहा जा सकता है कि सवर्ण समाज बहुसंख्यक में सांप्रदायिक शक्तियों के साथ चला गया है। हम चाहकर भी उसका साथ नहीं ले सकते और यही कारण है कि दलित, अल्पसंख्यक, पिछड़े और आदिवासियों को एक सूत्र में बांधकर नफ़रत के ख़िलाफ़ संगठित होना ही होगा। देश के साधनों पर कुछ लोगों का ही आधिपत्य हो गया है और यह तेज़ी से होता जा रहा है। इनके साधन का दुरुपयोग सांप्रदायिक और तानाशाही ताकतें कर रही हैं। इस कारण से हमें नौकरी, व्यापार और शिक्षा से वंचित कर दिया जा रहा है। मीडिया भी इन्हीं के नियंत्रण में है। सरकारी संपत्ति, सार्वजनिक प्रतिष्ठानों और विभागों के निजीकरण के माध्यम से देश का धन कुछ चुनिंदा व्यावसायिक लोगों के हवाले तेजी से किया गया जिसे रोकना जरूरी है। विकसित देश भी ईवीएम का त्याग कर चुके हैं तो भारत में ऐसा क्यों नहीं?
दलित, ओबीसी, अल्पसंख्यक और आदिवासी समाज एक मंच पर इकट्ठा होकर ही इस चुनौती का मुक़ाबला कर सकते हैं । इनमें आपसी भाईचारा क़ायम करने के लिए हर माध्यम को अपनाया जाये जैसे सामूहिक भोज, व्यापारिक संबंध, सुख-दुख में शामिल होना आदि । हमारा उद्देश्य संविधान बचाना, हिस्सेदारी और लोक तंत्र की रक्षा करना है।
वक़्फ़ बचाने की लड़ाई सुप्रीम कोर्ट से लेकर सड़क तक डोमा परिसंघ लड़ रहा है और आगे भी जारी रहेगी।
बोध गया में महाबोधि मंदिर का प्रबंधन बौद्धों को सौंपने के लिए डोमा परिसंघ प्रत्येक स्तर पर लड़ाई लड़ेगा।
अंबेडकर के विचार को मानने वाले वकील और नागरिक ख़ुद चंदा कर ग्वालियर में डॉ अंबेडकर की मूर्ति लगवाने का इंज़माम किए और भोपाल हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस ने मूर्ति लगाने का आदेश भी दिया ।बीजेपी और आरएसएस के लोग मूर्ति को प्रांगण में ले जाने नहीं दिया और मूर्ति लगाने का आंदोलन जारी है । आज यह भी प्रस्ताव पास किया गया कि ग्वालियर कोर्ट परिसर में किसी भी दशा में डॉ. की प्रतिमा लगाने के लिए डोमा परिसंघ संघर्ष करेगा।
जब लोकतंत्र खतरे में हो तो ग़ैर राजनीतिक संगठन और लोगों को बचाने के लिए आगे आना चाहिए ।अगर ऐसा नहीं होता तो जिम्मेदारी से भागना ही माना जाएगा। जो तटस्थ रहेगें उनको इतिहास माफ नहीं करेगा।
सम्मेलन को डॉ उदित राज के अतिरिक्त सतीश कुमार सांसी को आर्डिनेटर, डोमा परिसंघ ,सी. पी. सिंह, राष्ट्रीय महासचिव, देवी सिंह राणा, महासचिव डोमा परिसंघ,कुणाल कुमार, राष्ट्रीय महासचिव, डोमा परिसंघ,चन्द्र भूषण, राष्ट्रीय सचिव डोमा परिसंघ,
प्रदीप अंभोरे, राष्ट्रीय सचिव,बासुदेब मंडल, प्रदेश अध्यक्ष, पश्चिम बंगाल,विजय बहादुर, उत्तरप्रदेश अध्यक्ष, विजय शंकर पासवान, बिहार प्रदेश अध्यक्ष,प्रीतम अठावले, महाराष्ट्र प्रदेश अध्यक्ष, आर. के कलसोत्रा, जम्मू प्रदेश अध्यक्ष, महेश्वर राज , तेलंगाना प्रदेशाध्यक्ष, ए आर सिंह , मध्य प्रदेश अध्यक्ष,ए पी खान, दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष, बाबू सिंह बौद्ध, साधू सिंह जी, मौलाना मुहिबुल्लाह नदवी, रामपुर सांसद, फैजू हासमी , रिटायर्ड आई. ए.एस, लक्ष्मण राबा , किरण जीत सिंह गेरी आदि कई पदाधिकारियों ने संबोधित किया।
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साथियो,
बहुत दिनों बाद अधिकार, हिस्सेदारी और सम्मान बचाने का आख़िरी मौक़ा आया है । शायद 2029 के बाद लड़ने का मतलब नहीं रह जाएगा। हमें दो स्तर पर लड़ना है। पहला, अपने जो सही रास्ता न दिखाकर ख़ुद के नेतृत्व, धन, आभा और शक्ति के लिए दुश्मन को दिखाते रहते हैं । इसे भावनात्मक शोषण कहते हैं। केवल विचार और ज्ञान बांटने से न पेट भरेगा और न पढ़-लिख सकते हैं और न ही जरूरी संसाधन उपलब्ध हो सकते हैं जिससे लड़ा
जा सके। इनका काम केवल सवर्णों को गाली देना, तीखी भाषा और असत्य बातों के माध्यम से समाज के लोगों को गुमराह करके इकट्ठा करना है। सत्ता प्राप्ति का सपना बेचते रहें और नौकरी, शिक्षा और जमीन आदि के सवाल को टालते रहें। निजीकरण, वजीफा, उत्पीड़न जैसे प्रश्न से भी ध्यान हटाते रहें। मान लेते हैं कि सारे 16% दलित एक साथ हो जायें तो भी क्या 84% जनता के मुक़ाबले सत्ता प्राप्त कर सकते हैं ? 16% दलित सैकड़ों जातियों में विभाजित हैं। आदिवासी समाज का एक हिस्सा ईसाईयत तक सीमित है। एक बड़ा हिस्सा जागरूक ही नहीं है और ऐसे में कितना समर्थन इस वर्ग से मिल सकता है, समझना मुश्किल नहीं है। पिछड़ा वर्ग अब जाग्रत हो रहा है लेकिन अभी भी एक बड़ा हिस्सा मनुवादियों के चंगुल में फंसा है। सामाजिक न्याय के प्रति एक छोटा हिस्सा ही तैयार है। इन परिस्थितियों में क्या कोई दलित या पिछड़ा आधारित नेता या पार्टी सत्ता पर कब्जा करके मनुवादियों को हटा सकता है? क्या 272 लोक सभा सीटें जीत सकते हैं या मुख्य विपक्षी दल हो सकते हैं। क्या कोई एक सांसद कुछ भी कर सकता।कितना भी चिल्ला लें सत्ताधारी दल के कान पर जूं तक नहीं रेंग रही है। मैं नहीं कह रहा हूँ कि सत्ता के लिए लड़ना नहीं चाहिए। सत्ता प्राप्ति का मार्ग संवैधानिक अधिकारों की लड़ाई से गुजरता है। मुद्दों की लड़ाई लड़ना होगा। मांगे रखनी होगी। हिस्सेदारी की लड़ाई लड़ते हुए आगे बढ़ना है।दलित, ओबीसी, माइनॉरिटीज और आदिवासी इन दोनों व्यर्थ, बातूनी और भावुक बातों से हटकर संविधान और आरक्षण बचाने के लिए कटिबद्ध हैं। सही जाति जनगणना हो। आरक्षण की सीमा 50% से हटाई जाए और ईवीएम हटाकर बैलट पेपर से चुनाव हों।
मुस्लिम समाज से कहना चाहूँगा कि बहुसंख्यकवाद के कारण राजनीतिक दलों के भरोसे न रहे ।सेक्युलर नेता और दल भी बहुसंख्यकवाद से डरे हैं कि यदि मुस्लिम और ईसाई के अधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता की बात करेंगे तो चुनाव हार जाएँगे। अगर विपक्ष पूरी ताक़त से लड़े भी तो भी सत्ताधारी दल को हटाना मुश्किल है। ऐसे में दलित, ओबीसी, माइनॉरिटीज और आदिवासी परिसंघ (डोमा परिसंघ) को सामाजिक स्तर एक होकर लड़ना होगा । मंडल कमीशन या जाति जनगणना का विरोध क्या कभी मुसलमानों ने किया? क्या दलितों के ऊपर उत्पीड़न या छुआछूत मुस्लिम करते हैं, नहीं। तब क्यों नहीं सब साथ होकर मनुवादियों को उखाड़ फेंकते? याद रखें अकेले-अकेले कोई नहीं लड़ सकता है। 15 जून 2025 (रविवार) को एनडीएमसी ऑडिटोरियम, जंतर मंतर के पास, नई दिल्ली में सुबह 10 बजे इन्ही सवालों पर देश के कोने-कोने से अंबेडकरवादी, बुद्धिजीवी और सामाजिक कार्यकर्ता एकत्रित होंगे। आप भी आएं और दूसरों को भी सूचित करें।
कितने साथियों के साथ भाग लेंगे नीचे दिए गए संपर्क नंबर पर पहले सूचित कर दें तो अच्छा रहेगा।
जय भीम !
जय संविधान !
डॉ उदित राज (पूर्व सांसद)
राष्ट्रीय चेयरमैन, दलित, ओबीसी, मॉइनॉरिटीज़ एवं आदिवासी (डोमा) परिसंघ
संपर्क :
मुकेश कुमार सैनी - 89298 41424, 94150 37180
हेमंत गोविल - 82871 98184
#राष्ट्रीय_चिंतन_बैठक
दिनांक: 15 जून 2025 (रविवार)
समय: सुबह 10 बजे
स्थान: ऑडोटोरियम, एन.डी.एम.सी. कन्वेंशन सेंटर, जंतर-मंतर के पास, नई दिल्ली
साथियों,
देश स्तर पर दो विचारधारा की लड़ाई पहली बार आमने-सामने राजनैतिक स्तर पर छिड़ गई है ।पहले भी ऐसे प्रयास होते रहे हैं लेकिन छोटे स्तर पर। सामाजिक न्याय की लड़ाई धर्मनिरपेक्षता, न्याय, आरक्षण, हिस्सेदारी,धार्मिक स्वतंत्रता, अल्पसंख्यकों की सुरक्षा, आम आदमी का अधिकार सभी को समाहित करता है। लड़ाई जब राजनीतिक स्तर पर लड़ी जा रही हो तो सामाजिक स्तर पर दलित, ओबीसी, माइनॉरिटीज और आदिवासी को और तेज कर देना चाहिए।अकेले राजनैतिक दल और नेता मनुवाद को नहीं रोक पायेंगे। हमसे ज़्यादा मनुवादी समझते हैं, आरएसएस एक सामाजिक संगठन है और उसी के कारण सत्ता पर मनुवादियों का कब्जा है। क्या हम ऐसा नहीं कर सकते ? हमारे लोग ही उनके विचार, कर्मकांड, पाखंड में फंसे हैं या निष्क्रिय होकर उन्हीं का साथ दे रहे हैं।
दलित,ओबीसी, माइनॉर्टीज़ और आदिवासी परिसंघ (डोमा) की राष्ट्रीय चिंतन बैठक 15 जून 2025 (रविवार) को ऑडोटोरियम, एन.डी.एम.सी. कन्वेंशन सेंटर, जंतर-मंतर के पास, नई दिल्ली में सुबह 10 बजे से निश्चित की गयी है । बाहर से संगठन नाम से बहुजन दिखे और अंदर से जातिवाद और धार्मिक संकीर्णता नहीं चलेगा। अतः चारों समुदायों की भागीदारी होना भी जरूरी है । जो साथी पुराने हैं, वे अन्य जाति और धर्म के लोगों के साथ शामिल होंगे तो चिंतन बैठक की सफलता होगी। एक विशेष समुदाय जैसे- ओबीसी बड़ी आबादी वाला होकर भी मनुवाद से अकेले नहीं लड़ सकता। बहुजन एकता ही इस महा आपत्ति का हल है ।
इस राष्ट्रीय चिंतन बैठक में आने वाले साथी अपना और जो साथ आयेंगे उनका भी नाम और नंबर कार्यालय सचिव मुकेश सैनी (+91 94150 37180 ) और गीतांजलि बरुवा (+91 70034 71457) को सूचित करगें तो अच्छा रहेगा । उसी के अनुसार सीटिंग और खाने की व्यवस्था करने में सुविधा होगी।
आपका,
(डॉ. उदित राज), पूर्व सांसद
राष्ट्रीय चेयरमैन, डोमा परिसंघ
पश्चिम बंगाल के कोलकाता में डोमा परिसंघ राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ उदित राज जी के नेतृत्व में डोमा परिसंघ का प्रदेश सम्मेलन सफलता पूर्वक सम्पन्न हुआ।
@Dr_Uditraj