मुझे एकांत पसन्द है। बगीचे, पहाड़ एवम नदियाँ मुझे रोमांचित करते हैं। यदि आज भी लोग जंगलों में तपस्या करने जाते तो मैं भी उनमें से एक होता। आज तररकी एवम धन का ज़माना है। एक बार खूब सारा धन कमाकर मैं घर त्याग देने का सपना देखता हूँ। मुझे सन्यास होना है। उम्मीद है मैं सफ़ल होऊँ.!!!
आजकल किसी से बात करने की इच्छा नहीं होती।जीवन के इस पड़ाव पर मैं अपने जीवन के सभी व्यक्तियों को समझ चुका हूँ।कौन मेरा है और कौन नहीं, इसका पूरा ज्ञान है।अब ऐसे लोगों से बातें करना बिल्कुल स्वयं के मस्तिष्क को परेशान करने जैसा है।हालाँकि,उनसे नफ़रत नहीं है परंतु अब प्रेम भी न रहा।
मानसिक संतुलन को जितना अकेले यूपीएससी ने डिगाया है, उतना तो प्रथम प्रेम के जाना ने भी नहीं दिया था। इस परीक्षा को उत्तीर्ण करने से कई गुना दुष्कर है, हर भोर जागना, सीधे किताबों के सम्मुख बैठ जाना। परिवार, समाज और स्वयं की महत्वाकांक्षाओं की अर्थी को कांधे पर लिए जीवन जीना...
कुछ पल अकेले पहाड़ों में बिताना चाहता हूँ।नदियों की कलकल ध्वनि और प्राकृतिक परिवेश मुझे आकर्षित करते हैं।जानता हूँ पहाड़ों में होना एक क्षणिक प्रवास है,परंतु वही क्षण जीवन की स्मृति का मील का पत्थर बन जाता है। चेहरे को छूती ठंडी हवाएँ जीवन की जद्दोजहद से सुकून का अहसास कराती है।
अब तुमसे वो जुड़ाव महसूस नहीं होती जो बरसों पहले थी। तुम कभी मुझे मुकम्मल तौर पर अपना न सकीं, अफ़सोस तो इस बात का है कि तुम मुझे खुद से जुदा भी न कर सकीं। किसी और बेहतर की जुस्तजू में तुमने मुझे महफ़ूज़ तो रखा, मगर महज़ एक मामूली विकल्प की तरह... जिसका कोई वजूद नहीं।
जवानी में पैसा ही पुरुष का संबल होता है; यदि यह आधार डगमगा जाए, तो जीवन बोझिल प्रतीत होने लगता है। पैसे के अभाव ने तन और मन, दोनों को दुर्बल कर दिया है। किंतु एक कठोर सत्य यह भी है कि बिना कर्म किए धन का आगमन संभव नहीं। जीवन में कोई चमत्कार नहीं होने वाला।
मै अपनी हार का सदैव दूसरों को दोष देता आया हूं, जबकि कमियां मुझमें ही हैं। भले वो कमियां प्राकृतिक है और इसमें मेरा कोई हाथ नहीं। अब दो ही विकल्प हैं, एक या तो इसे पकड़ के बैठे रहो और दूसरा इसे स्वीकार करो और इसपर काम करो, सुधार करो और इस पर विजय पाओ। मुश्किल है पर, हो जाएगा।
आजकल नदी के तट पर अक्सर बैठा जाता हूँ। ये गंगाजी का प्रतीत होता शांत जल से अपनी स्वयं के प्रति क्रोध को भी शांत करने की कोशिश करता हूँ। मुझे लगता है मृत्यु से अधिक पीड़ादायक है किसी से लगाव का हो जाना। मृत्यु को मैं महसूस करना चाहता हूं। आखिर अस्थियां इसी गंगा में प्रवाहित होगी.!
आख़िरकार अवसादग्रस्त व्यक्ति कर ही क्या सकता है। प्रेमिका का चोट खाया हुआ, परिवार का ताना खाया हुआ, दोस्त का गाली खाया हुआ और स्वयं का नकारात्मकता सहा हुआ ज़िन्दगी आखिर इसकी मुकाम क्या होगी? जीने के पहले मरने को सोचना। मृत्यु को अपना ईश्वर समझना। शवों से दोस्ती करना और खुश रहना.!
सुबह के तीन बजे बालकनी में खड़ा दूर स्ट्रीट लाइटों को देखते हुए...आँखों मे आंसुओं की एक लंबी धार है जो नीचे पैरों पर महसूस हो रहे है । इस दुनिया में ईश्वर कहे जाने वाले एक बात हो माननी पड़ेगी की तू है वरना एक ही जीवन मे दर्द का इतना बड़ा ढ़ेर तुम्हरे जैसा निर्दयी ही दे सकता है.!!
मैं एक वक्त के बाद सबको बुरा लगने लगे जाता हूँ। जितने उत्साह एवमं जल्दीबाजी में लोग मुझसे रिश्ते बनाते हैं उतने ही जल्दी मुझसे दूरियाँ बना लेते हैं। जिसमे शायद मेरी ही गलती होगी। मैं ही इस लायक नहीं होऊंगा की उनके मुताबिक़ चल सकूँ। मैं बहुत ढीठ हूँ अब अकेले ही जीना सीख गया।
सच बताऊँ तो अब मन के भावों को लिखने का मन नहीं करता । अब कितना भी दर्द में रहूँ या किसी भी व्यथा में रहूँ स्वयं ही झेल लेना चाहता हूँ। अब तो जीवन के इस चाल में मैं बहुत पीछे रह गया हूँ। कोशिश है कि पुनः पटरी पर लौटूँ परन्तु अतीत की भयावह मंज़र आज भी एक नासूर दर्द बना है..!!!!
यह नए वर्ष की शुरूआत ही जीवन के सबसे न्यूनतम बिंदु से हुई है...जहाँ मेरा आत्मसम्मान सम्पूर्ण रूप से कुचला जा चुका है। ज़िन्दगी ऐसी कश्मकश में फंसी है जहाँ से लोग वापस मुड़ जाना ही पसन्द करते हैं। मैं इस क्रोधित अग्नि में जूझ रहा हूँ। इसकी लपटे मुझे धीरे-धीरे राख बना रही है..!!!
सर्द रातों में किसी के गम का हिस्सा हो जाना और निद्रा से जंग लड़ना किसी बहादुरी का काम से कम नहीं है। मैं खुद को ढूंढते हुए बेहद किनारों पर पहुँच जाता हूँ...जहाँ केवल दफ़न की हुई यादें होती है। मैं तेज़ी से भागता हूँ अपने इसी कमरे में जहां मैं पुनः नींद से लड़ रहा हूँ...!!!!
किसी सदमें में खोए आँखो को बिना झपकाए देर रात तक नींद की आस में तड़प रहा हूँ। मैं परेशानियों को बिना झेले पहले ही नकारात्मक भाव मे डूब जाता हूँ। नींद नहीं आती तो बस नींद की गोली खाने की इच्छा तीव्र होती है। अब किसी को ढूढ़ता भी नहीं। मैं समझ चुका हूँ यहाँ मेरे सिवा कोई नहीं है.!!
इस वर्ष मैंने खुद से कोई भी वादे नहीं किये हैं। कोई भी तस्वीर सोशल मीडिया पर साझा नहीं किये। अब जीवन को बेहद निजी रखना चाहता हूँ। ऊब चुका हूँ इनसब चीजों से। इस पीढ़ी का होते हुए भी एक कश्मकश जीवन जीता हूँ। ऐसा लगता है सब कुछ मैंने ही बिगाड़ा है और सही मैं स्वयं ही करूँगा...!!