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दलित बच्चे पर आतंकी हमला। 😡💔
राजस्थान के करौली में अभिषेक गुर्जर और उसके गुंडों ने 15 साल के एक दलित लड़के का किडनैप करके उसे जंगल ले गए और वहां उसे बर्बरतापूर्वक लाठियों से पीटा।
अभिषेक गुर्जर सहित सभी सामंती हैवानों पर NSA के तहत कार्रवाई होनी चाहिए। पीड़ित लड़का एक मिठाई की दुकान पर काम करता है। अभिषेक गुर्जर और उसके भीखमंगे साथियों ने पीड़ित लड़के से दुकान से पैसे लाने के लिए कहा। बच्चे ने जब मना किया, तो उन्होंने उसे जबरन कार में बैठा लिया और जंगल में ले गए।
इन कायरों ने उस मासूम बच्चे को जातिसूचक गालियां देते हुए जमीन पर पटककर पीटा, लाठी-डंडों से पीटा और उल्टा लटकाकर भी मारा। मारपीट में घायल बच्चे के हाथ, कमर और शरीर के अन्य हिस्सों में गंभीर चोटें आई हैं। उसकी हालत गंभीर है और जिला अस्पताल में उसका इलाज चल रहा है।
BJP सरकार में अभिषेक गुर्जर जैसे जातिवादी आतंकियों को कानून का कोई डर नहीं है। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा हों या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, दलितों पर बढ़ते अत्याचारों पर सबके सब चुप्पी साधे बैठे रहते हैं। इन जातिवादी आतंकियों के हौसले इतने बुलंद हैं कि ये पहले एक बच्चे को निर्ममता से मारते हैं, फिर उसका वीडियो बनाते हैं और फिर उसे वायरल भी करते हैं।
यह बहुत शर्मनाक है। प्रशासन और सरकार इसका तुरंत संज्ञान ले और अभिषेक गुर्जर तथा उसके साथी आतंकियों पर हत्या के प्रयास, SC-ST Act और NSA के तहत कड़ी से कड़ी सज़ा दिलाए। दलितों का दमन बंद होना चाहिए।
जयपुर में अपनी जायज़ मांगों को लेकर शांतिपूर्ण ढंग से महापड़ाव कर रहे घुमंतु एवं अर्ध-घुमंतु (डीएनटी) समुदाय के लोगों पर पुलिस द्वारा बल प्रयोग किए जाने की घटना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है।
किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में शांतिपूर्वक अपनी बात रखना प्रत्येक नागरिक का संवैधानिक अधिकार है। ऐसे में अपनी समस्याओं के समाधान की अपेक्षा लेकर बैठे समाज के वंचित एवं उपेक्षित वर्ग के लोगों पर लाठीचार्ज, आंसू गैस और बलपूर्वक कार्रवाई चिंताजनक है।
जब जनता अपनी पीड़ा और मांगों को लेकर सड़क पर बैठने के लिए विवश हो जाए, तब सरकार का प्रथम दायित्व संवाद स्थापित कर उनकी समस्याओं का समाधान तलाशना होना चाहिए, न कि बल प्रयोग का सहारा लेना। लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति संवाद, संवेदनशीलता और जनविश्वास में निहित होती है।
राजस्थान सरकार को इस घटना की नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करते हुए डीएनटी समुदाय के प्रतिनिधियों से तत्काल वार्ता करनी चाहिए, घटना में जिम्मेदार अधिकारियों की निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करनी चाहिए तथा समुदाय की लंबित एवं जायज़ मांगों पर सकारात्मक और शीघ्र निर्णय लेना चाहिए।
लोकतंत्र में आवाज़ों को दबाने से समस्याओं का समाधान नहीं होता; उनका स्थायी समाधान संवाद, न्यायपूर्ण दृष्टिकोण और संवेदनशील शासन से ही संभव है।
@BhajanlalBjp@RajCMO
What a brilliant and intellectually daring piece. In The Naked Declivity: Reading “Non-Being” in the philosophies of Ambedkar, Frantz Fanon and Ali Shariati, Aniket Gautam accomplishes something rare.
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भीम आर्मी के चंद्रशेखर आजाद तमाम संघर्षों के बाद फाइनली केतन लाल की माँ से मिले। बारहवीं में पढ़ने वाले दलित लड़के केतन की अपर कास्ट लड़की से संबंध रखने के कारण हत्या कर दी गई थी। जगह- टिहरी गढ़वाल, उत्तराखंड
घुमंतू, अर्धघुमंतू जातियों के डीएनटी समाज की मांगों पर सरकार को सहानुभूतिपूर्वक विचार करना चाहिए। हर बार लाठी-आँसू गैस के गोले इन्हें मिलते हैं ये अच्छी बात नहीं है।
@RajGovOfficial@RajCMO@PoojaKumar98010@DCDMTonk
सरकारी आदेशों के अनुसार राजस्थान में SC के किसी भी व्यक्ति नाम में हरिजन शब्द लिखना गैर कानूनी माना गया है।
पर सरकारी कार्यक्रमों में आदेशों की पालना नहीं होना, सोचनीय है।
आदेश कॉपी SJE डिपार्टमेंट के वेबसाइट पर उपलब्ध है।
लेकिन इस पूरे आंदोलन के बीच एक अत्यंत जरूरी बात दोनों पक्षों को याद रखनी चाहिए—अहिंसा। किसी भी बड़े प्रदर्शन से पहले लंबे समय तक नॉन-वायलेंस का अभ्यास होना चाहिए। आंदोलनकारी समूहों को स्वयंसेवी अनुशासन-दल, आचार-संहिता, उकसावे से बचने का प्रशिक्षण और संवाद-प्रतिनिधि तय करने चाहिए। क्योंकि जैसे ही पत्थर, धक्का-मुक्की या उग्रता आती है, सबसे पहले आंदोलन का नैतिक बल कमजोर होता है। भोले-भाले लोग बहक जाते हैं और फिर असली सवाल पीछे छूट जाता है।
उधर पुलिस को भी याद रखना चाहिए कि सामने कोई दुश्मन सेना नहीं, अपने ही समाज के वंचित नागरिक खड़े होते हैं। पुलिस में भर्ती जवान भी आम राजस्थानियों के बेटे-बेटियां हैं। इसलिए यह रिश्ता हमेशा दोनों तरफ के लोग याद रखें—एक तरफ अधिकार मांगने वाले नागरिक, दूसरी तरफ व्यवस्था संभालने वाले नागरिक। टकराव नहीं, संवाद इस रिश्ते का आधार होना चाहिए।
DNT समाज की यह लड़ाई भारतीय लोकतंत्र से एक मूल प्रश्न पूछती है: क्या विकास का अर्थ केवल स्थायी, दस्तावेजधारी, संगठित समाजों का विकास है? या उन लोगों का भी, जो सदियों से चलते रहे, पर राज्य की नीतियों में रुके रह गए? अब जवाब नारे से नहीं, नीति से देना होगा।
DNT घुमंतू समाज की 11 मांगें और वर्तमान समय का प्रश्न: अब न्याय को टाला नहीं जा सकता
राजस्थान नाथ समाज एवं डीएनटी संघर्ष समिति ने यह साफ कर दिया है कि यह आंदोलन अब केवल एक सामान्य ज्ञापन या प्रतीकात्मक धरने का मामला नहीं रह गया है। “विधानसभा घेराव” से आगे बढ़कर अब “जेल भरो महा आंदोलन” की घोषणा इस बात का संकेत है कि घुमंतू, अर्ध-घुमंतू और विमुक्त (DNT) समाज अपने सवालों को राज्य की राजनीति के केंद्र में लाना चाहते हैं। 1 जुलाई 2026 को जयपुर में प्रस्तावित यह आंदोलन केवल भीड़ जुटाने का आह्वान नहीं, दशकों की उपेक्षा, असमानता और प्रशासनिक अदृश्यता के विरुद्ध संगठित प्रतिवाद है।
यह आंदोलन किसी एक लाभ या एक पद के लिए नहीं, जीवन के पूरे ढांचे—पहचान, शिक्षा, आवास, रोजगार, प्रतिनिधित्व और सम्मान—को लेकर है। सबसे पहली मांग जातिगत विसंगतियों को दूर करने की है। सरकारी रिकॉर्ड में सूचीबद्ध 32 जातियों के नामों, उपनामों और स्थानीय पहचानों में जो गड़बड़ियां हैं, वे इन समुदायों को प्रमाणपत्र, योजनाओं और आरक्षण से वंचित कर देती हैं। यह मांग अत्यंत तार्किक है। जब राज्य की सूची ही अस्पष्ट होगी, तब नागरिक अपने अधिकार तक कैसे पहुंचेगा?
दूसरी और सबसे प्रमुख मांग 10 प्रतिशत आरक्षण की है। इसे केवल भावनात्मक मांग मानना गलत होगा। घुमंतू और विमुक्त समाजों को लेकर बनी विभिन्न राष्ट्रीय आयोगों ने यह रेखांकित किया है कि ये समुदाय बहुस्तरीय वंचना के शिकार हैं। वे कई श्रेणियों में बंटे जरूर हैं, परंतु वास्तविक लाभ तक उनकी पहुंच बहुत कम है। इसलिए अलग पहचान और उपयुक्त आरक्षण व्यवस्था की मांग सामाजिक न्याय की बुनियादी मांग है। यदि राजस्थान में इनकी आबादी महत्वपूर्ण है, तो उनकी हिस्सेदारी भी ठोस रूप में दिखनी चाहिए।
तीसरी मांग राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जुड़ी है। पंचायतों और शहरी निकायों में 10 प्रतिशत सीट आरक्षित करने की बात इसलिए उठी है क्योंकि घुमंतू समाज बिखरा हुआ है, एक जगह सघन नहीं है। इस कारण लोकतांत्रिक संख्या होने पर भी उसका प्रतिनिधित्व नहीं बन पाता। लोकतंत्र में जो दिखाई नहीं देता, वह बजट, नीतियों और योजनाओं में भी पीछे छूट जाता है। इस मांग को राज्य को गंभीरता से सुनना चाहिए।
चौथी और पांचवीं मांग आवास, पट्टों और जमीन से जुड़ी है। जहां ये समुदाय बरसों से बसे हैं, वहां उन्हें वैध पट्टे दिए जाएं; शहरों में 100 वर्ग गज, गांवों में 300 वर्ग गज आवासीय भूमि और पशुओं के बाड़े के लिए अलग जगह मिले। यह कोई असंगत मांग नहीं है। घुमंतू समाज का जीवन सिर्फ मकान से नहीं, पशुधन, श्रम और जीविका से भी जुड़ा होता है। जिस समाज के पास स्थायी पता नहीं, उसकी नागरिकता भी अधूरी रह जाती है। राशन कार्ड, स्कूल प्रवेश, वोटर सूची, बैंकिंग सब कुछ ठहर जाता है।
शिक्षा को लेकर उनकी मांगें अत्यंत आधुनिक और दूरदर्शी हैं। शिक्षा बजट का 10 प्रतिशत हिस्सा अलग से, आवासीय विद्यालय, छात्रावास, कौशल कॉलेज, आंगनबाड़ी, कला महाविद्यालय और “anywhere education” जैसी व्यवस्था यह दिखाती है कि वे अपने जीवन की वास्तविकता के अनुरूप शिक्षा चाहते हैं। जो परिवार गतिशील है, उसके बच्चे के लिए स्थिर विद्यालय-ढांचा पर्याप्त नहीं होता। इसीलिए मोबाइल शिक्षा, आवासीय स्कूल और निजी स्कूलों में शिक्षा-अधिकार के तहत प्राथमिकता जैसी मांगें समयोचित हैं।
महिलाओं और युवाओं के लिए इलेक्ट्रॉनिक्स, कंप्यूटर, मैन्युफैक्चरिंग और अन्य आधुनिक क्षेत्रों में प्रशिक्षण की मांग विशेष महत्व रखती है। यह पोस्टर स्पष्ट रूप से बताता है कि समाज केवल परंपरागत पेशों में कैद नहीं रहना चाहता; वह नई अर्थव्यवस्था में सम्मानजनक भागीदारी चाहता है। प्रति वर्ष 1000 विद्यार्थियों को विदेश में शिक्षा के लिए भेजने की मांग भले महत्वाकांक्षी लगे, पर इसके पीछे संदेश स्पष्ट है—यह समाज अवसरों की समान दुनिया चाहता है, दया की छांव नहीं। जब सरकार आईएएस आईपीएस के बच्चों को विदेश शिक्षा के लिए भेज रही है तो इनकी माँग ग़लत कैसे है?
अलग मंत्रालय, वित्त निगम और ऋण-सुविधा की मांग भी पूरी तरह तार्किक है। जब तक संस्थागत ढांचा नहीं बनेगा, तब तक ये मांगें घोषणाओं में घूमती रहेंगी। साथ ही अंतिम मांग—जैसे जोगी और कालबेलिया जैसे समुदायों के लिए दफन या श्मशान भूमि की व्यवस्था यह याद दिलाती है कि यह संघर्ष जीवन ही नहीं, मृत्यु में भी गरिमा का संघर्ष है।
राजस्थान के करौली जिले में एक दलित युवक के साथ हुई बर्बरतापूर्ण मारपीट की घटना शर्मनाक और निंदनीय है।
दिनभर मेहनत-मजदूरी कर अपने परिवार का पेट पालने वाला एक गरीब युवक जब घर लौट रहा था, तब उसके साथ की गई बर्बरता ने इंसानियत को शर्मसार कर दिया। आखिर गरीब, दलित और कमजोर व्यक्ति कब तक इस तरह की हिंसा और अत्याचार का शिकार होते रहेंगे?
जहां जहां भाजपा की सरकारें हैं, वहां वहां दलितों और आदिवासियों पर आए दिन ऐसे अत्याचारों की विडियोज़ सामने आती रहती हैं। प्रशासन या तो अपराधियों को पकड़ने की जगह पीड़ित को ही परेशान करने में लग जाता है या फिर चुप्पी साध लेता है।
ये बहुत शर्मनाक है, प्रशासन और सरकार इसका तुरंत संज्ञान ले और अपराधियों को कड़ी से कड़ी सज़ा दिलाए।
सरकार अब तक कोरोना से मरने वालों का आँकड़ा नहीं दे पाई। नोटबंदी का फ़ायदा नहीं बता पाई। राममंदिर में जनता का पैसा चंपत करने वालों पर FIR नहीं कर पाई ।
एक साल में एथेनॉल का असर बता देगी ?
पश्चिम बंगाल की भाजपा सरकार ने अपने 'प्रिय ओबीसी मतदाताओं' को जबर्दस्त गिफ्ट दी है! बंगाल में अबतक ओबीसी को 27% नहीं सिर्फ 17% आरक्षण मिल रहा था. इसे 27% होना चाहिए था. पर BJP सरकार ने 07% कर दिया! सूबे में 50% से ज्यादा ओबीसी हैं, इनको EWS को मिलने वाले 10% से भी कम 7%आरक्षण!
जीएन देवी की चेतावनी और विपक्ष की चुप्पी: लोकतंत्र की हत्या अब लाठी से नहीं, सूची से होगी
जीएन देवी भारत के प्रतिष्ठित सांस्कृतिक कार्यकर्ता, भाषाविद्, साहित्य-आलोचक और सार्वजनिक बुद्धिजीवी हैं। वे विलुप्तप्राय और उपेक्षित भाषाओं के दस्तावेज़ीकरण तथा संरक्षण के अपने असाधारण काम के लिए विशेष रूप से जाने जाते हैं। People’s Linguistic Survey of India के नेतृत्वकर्ता के रूप में उन्होंने भारत के आदिवासी, घुमंतू, सीमांत और हाशिए के समुदायों की भाषाई-सांस्कृतिक अस्मिता को राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में लाने का ऐतिहासिक कार्य किया है। अभी मैंने "महाभारत : काव्य और राष्ट्र" शीर्षक वाली विद्वत्तापूर्ण पुस्तक पूरी की ही थी कि उनके जयपुर आगमन की ख़बर मिली तो मैं अपने आपको उनके व्याख्यान में जाने से रोक नहीं पाया।
जयपुर में जीएन देवी का व्याख्यान किसी साहित्यिक विद्वान का सामान्य भाषण नहीं था। वह लोकतंत्र के शव-परीक्षण से पहले की अंतिम चेतावनी जैसा था। एक खचाखच भरे विशालकाय सभागार में करीने से धीर-गंभीर बैठे लोगों को उन्होंने नागरिकता, जनगणना, SIR, परिसीमन और जनसांख्यिकी के नाम पर बन रही उस नई राजनीति को समझाया, जिसमें नागरिक को पहले आंकड़ा बनाया जाता है, फिर संदेहास्पद बनाया जाता है, फिर सूची से हटाया जाता है और अंत में राष्ट्र से बाहर धकेल दिया जाता है। यह सब बंदूक से नहीं होता। यह फॉर्म से होता है। यह हिरासत-शिविर से पहले प्रमाणपत्र मांगता है। यह संविधान पर हमला करने से पहले मतदाता-सूची पर हमला करता है।
हैरानी यह नहीं कि हॉल भरा हुआ था। हैरानी यह है कि वहाँ मीडिया नहीं था। राजनीतिक दल नहीं थे। विपक्ष नहीं था। कांग्रेस नहीं थी। वे लोग नहीं थे जिनका पहला काम नागरिकता, मतदान-अधिकार, संविधान और प्रतिनिधित्व की रक्षा करना है। यह वही कांग्रेस है जो चुनाव के समय बूथ मैनेजमेंट पर लाखों वॉट्सऐप संदेश भेजती है, लेकिन जब नागरिकता और जनगणना के जरिए पूरे लोकतंत्र का भूगोल बदलने की बहस उठती है तो उसकी वैचारिक रीढ़ जैसे गायब हो जाती है। प्रतिपक्ष में होकर भी अगर किसी दल को Census, SIR, Demography, Delimitation और Citizenship जैसे शब्दों से बेचैनी नहीं होती तो समझना चाहिए कि वह सत्ता से नहीं, इतिहास से पराजित है। इस तरह के कार्यक्रमों से कांग्रेस की दूरी बताती है कि वह विधानसभा चुनाव में पक्का मार खाएगी और फिर शोर मचाएगी कि बीजेपी ने वोट चुरा लिये। उनकी उदासीनता संकेत दे रही है कि राजस्थान में बंगाल रिपीट होगा।
जीएन देवी ने जिस संकट की ओर इशारा किया, वह बेहद गंभीर है। भारत में लोकतंत्र केवल मतदान का नाम नहीं है। लोकतंत्र इस बात का नाम है कि कौन नागरिक माना जाएगा, कौन मतदाता रहेगा, किसकी गिनती होगी, किस राज्य को कितनी राजनीतिक शक्ति मिलेगी, किस भाषा को कितनी जगह मिलेगी, किस समुदाय को संदेह की नजर से देखा जाएगा और किसे राष्ट्र की मुख्यधारा से बाहर कर दिया जाएगा। यह सब मिलकर लोकतंत्र का वास्तविक ढांचा बनाते हैं। अगर नागरिकता की परिभाषा संदिग्ध कर दी जाए, जनगणना के आंकड़ों पर भरोसा कम कर दिया जाए, SIR के नाम पर बड़ी संख्या में मतदाताओं को कठघरे में खड़ा कर दिया जाए और परिसीमन के जरिए राजनीतिक प्रतिनिधित्व का पूरा नक्शा बदल दिया जाए तो चुनाव भले होते रहें, लोकतंत्र भीतर से खोखला हो जाएगा।
देवी ने एक डच फिल्म A Question of Silence का जिक्र करते हुए अपना व्याख्यान शुरू किया। इसमें तीन स्त्रियां एक हिंसक और पितृसत्तात्मक व्यवस्था के सामने चुप्पी को प्रतिरोध में बदल देती हैं। अदालत उन्हें पागल साबित करना चाहती है, पर सवाल उलटा हो जाता है—पागल वे हैं या वह व्यवस्था है जो उनके जीवन को रोज़ चुपचाप कुचलती रही? आज भारत में भी यही प्रश्न खड़ा है। अगर कोई नागरिक अपने दस्तावेज़ों में एक अक्षर की त्रुटि के कारण संदिग्ध हो जाता है, अगर कोई घुमंतू पशुपालक, कोई मजदूर, कोई आदिवासी, कोई नदी किनारे का विस्थापित, कोई बिना स्थायी पते का मनुष्य राज्य की नजर में “अपूर्ण नागरिक” हो जाता है तो पागल नागरिक नहीं है; पागल व्यवस्था है।
सबसे बड़ा ख़तरा यह है कि जनगणना अब केवल जनगणना नहीं रह गई है। वह कल्याणकारी योजनाओं, खाद्य सुरक्षा, भाषा, रोजगार, संसाधन-वितरण, निर्वाचन-क्षेत्र, आरक्षण और राजनीतिक शक्ति का मूल आधार है। Planning Commission या बाद की नीति-प्रक्रियाओं में खाद्य सुरक्षा जैसे दस्तावेज़ों की रीढ़ डेटा रहा है। अगर डेटा सही है तो नीति गरीब तक पहुँच सकती है। अगर डेटा देर से आता है, अधूरा आता है या अविश्वसनीय आता है तो शासन अनुमान, प्रचार और पूर्वग्रह पर चलने लगता है। यही वह जगह है जहाँ लोकतंत्र मरना शुरू करता है—जब गरीब का पेट आंकड़े में गायब हो जाए और विस्थापित का नाम सूची में न मिले।
भारत की जनगणना की परंपरा 1871 में औपनिवेशिक शासन के दौर से व्यवस्थित रूप में शुरू हुई। औपनिवेशिक सत्ता ने गिनती को नियंत्रण का उपकरण बनाया था। स्वतंत्र भारत ने उसी गिनती को लोकतांत्रिक योजना और सामाजिक न्याय का आधार बनाया। फर्क यही था—वहाँ census सत्ता की आंख था, यहाँ census नागरिक अधिकार का आधार होना चाहिए था। लेकिन अब भय यह है कि हम फिर उसी औपनिवेशिक प्रवृत्ति की ओर लौट रहे हैं, जहाँ राज्य नागरिक को समझने के लिए नहीं, उसे वर्गीकृत और नियंत्रित करने के लिए गिनता है।
इसीलिए “Demography Commission” या “Demographic Mission” जैसी अवधारणाएँ अत्यंत सावधानी से देखी जानी चाहिए। जनसांख्यिकी अपने आप में विज्ञान है। लेकिन जब उसी विज्ञान को “घुसपैठ”, “अस्वाभाविक परिवर्तन” और “आंतरिक खतरा” जैसी राजनीतिक भाषा में बांध दिया जाए तो वह विज्ञान नहीं रहता, वह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का डंडा बन जाता है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद हमेशा संस्कृति की बात करता है, लेकिन उसका असली लक्ष्य नागरिकता की छंटनी होता है। वह कहता है कि वह राष्ट्र बचा रहा है; वस्तुतः वह राष्ट्र को नागरिकों से खाली कर रहा होता है।
जीएन देवी ने व्याख्यान में पुनर्जागरण आंदोलन की याद दिलाई। राजा राममोहन राय ने उन्नीसवीं सदी के आरंभ में एकेश्वरवाद, विवेक और धार्मिक समानता की दिशा में प्रश्न उठाए। ब्रह्म समाज ने धर्म को तार्किकता और नैतिकता की कसौटी पर रखने की कोशिश की। उन्नीसवीं सदी में आर्य समाज ने वेदों की ओर लौटने का आह्वान किया। फिर धीरे-धीरे सुधारवाद की धार से एक दूसरी धारा निकली—हिन्दू समाज की राजनीतिक संगठनशीलता, हिंदू महासभा, सावरकर की 1923 की हिंदुत्व-पुस्तिका, मूंजे-हेडगेवार की संगठन-दृष्टि और 1925 का आरएसएस। यह इतिहास इसलिए महत्वपूर्ण है कि इससे पता चलता है—एक देश में धार्मिक सुधार, सांस्कृतिक पुनरुद्धार और राजनीतिक राष्ट्रवाद के बीच फर्क मिटता है तो अंततः नागरिकता की जगह सांस्कृतिक शुद्धता बैठ जाती है।
हालांकि मैं देवी की पुनर्जागरण आंदोलन संबंधी कुछ अवधारणाओं से सहमत नहीं हूँ। लेकिन उन्होंने आज की चिंताओं को बहुत प्रखरता से रखा। उनका कहना था कि आज ज़रूरत संविधान समाज की है—ऐसे समाज की जो कहे कि नागरिकता जन्म, जाति, धर्म, भाषा, खान-पान, वेशभूषा या काग़ज़ी संदेह की बंधक नहीं हो सकती। संविधान समाज का अर्थ है—हर नागरिक की गरिमा, हर मतदाता का अधिकार, हर भाषा का सम्मान, हर क्षेत्र का न्यायपूर्ण प्रतिनिधित्व।
कांग्रेस और विपक्ष का मौन इसलिए अपराध है। वे समझ ही नहीं रहे कि लड़ाई केवल महंगाई, टिकट, गठबंधन या मुख्यमंत्री पद की नहीं है। लड़ाई इस बात की है कि 2027 के बाद भारत का राजनीतिक भूगोल कैसा होगा। परिसीमन केवल सीटों का बंटवारा नहीं होता; वह सत्ता की नसों का पुनर्संयोजन होता है। किस प्रदेश की आवाज़ घटेगी, किसकी बढ़ेगी, कौन-सा इलाका निर्णायक होगा, कौन-सा समुदाय स्थायी रूप से हाशिए पर चला जाएगा—यह सब इसी से तय होगा। अगर विपक्ष इस प्रश्न पर चुप है तो वह अपने भविष्य की कब्र खुद खोद रहा है।
और मीडिया? मीडिया तो लोकतंत्र की शुरुआती चेतावनी-व्यवस्था था। लेकिन अगर जीएन देवी जैसे चिंतक जयपुर में आकर नागरिकता और लोकतंत्र पर सबसे गंभीर चेतावनी दें और मीडिया अनुपस्थित रहे तो यह अनुपस्थिति खबर से बड़ी खबर है। यह बताती है कि मीडिया की प्राथमिकता नागरिक नहीं, इवेंट है; संविधान नहीं, तमाशा है; लोकतंत्र नहीं, सत्ता की दैनिक ध्वनि है।
देवी चेताते भर नहीं, समझाते हैं जैसे कोई पिता या गुरु बच्चे को समझाता है। उनका कहना था अब सवाल यह नहीं है कि क्या बिगड़ेगा। सवाल यह है कि हम कितना बचा पाएंगे। हर जिले में नागरिक समितियां बननी चाहिए। नागरिकता, जनगणना, मतदाता-सूची, परिसीमन और जनसांख्यिकी पर सार्वजनिक अध्ययन-मंडल बनने चाहिए। People’s Demographic Survey जैसे नागरिक प्रयास शुरू होने चाहिए। घुमंतू समुदायों, पशुपालकों, प्रवासी मजदूरों, आदिवासियों, शहरी गरीबों और दस्तावेज़हीन नागरिकों की डायरी लिखी जानी चाहिए। कौन कहाँ रहता है, किसके पास कौन-सा कागज है, किसका नाम वोटर लिस्ट में है, कौन बाहर हो सकता है—यह सब लोकतंत्र की नई जनगाथा है।
जीएन देवी ने जो कहा, वह डराने के लिए नहीं था; जगाने के लिए था। अगर हमारी निष्क्रियता से किसी एक आदमी की नागरिकता भी छिनती है तो यह केवल उस आदमी की त्रासदी नहीं होगी। वह पूरे गणराज्य के माथे पर एक काला धब्बा होगा। लोकतंत्र की हत्या अब संसद के दरवाज़े तोड़कर नहीं होगी। वह जनगणना-फॉर्म, मतदाता-सूची, नागरिकता-प्रमाणपत्र और परिसीमन-मानचित्र के बीच चुपचाप होगी। और इतिहास की सबसे भयावह हत्याएं अक्सर शोर से नहीं, चुप्पी से होती हैं। मुझे सुखद हैरानी है कि हमारे यहाँ वास्तविक राजनीतिक समझ वालों में कविता श्रीवास्तव शीर्ष पर हैं और उन्होंने यह आयोजन किया।
कई बार तो मुझे यही लगता है कि इस प्रदेश में वास्तविक राजनीति तो कविता श्रीवास्तव, अरुणा रॉय, निखिल डे, भंवर मेघवंशी जैसे लोग ही कर रहे हैं और कांग्रेस के कथित बड़े नाम और सत्ता के शीर्ष पर रहे लोग तो इस जम्हूरियत के हिसाब से अप्रासंगिक ही हैं। उन्हें अगर इतने बेचैन करने वाले प्रश्नों पर बेचैनी नहीं है और वे सिर्फ़ बयानबाज़ियां करके ही राजनीति करना चाहते हैं तो ख़तरा बड़ा है। इस कार्यक्रम में प्रोफेसर अपूर्वानंद भी मौजूद थे। उन्होंने भी भारतीय लोकतंत्र के सामने मंडरा रहे ख़तरों को सांगोपांग रेखांकित किया।
The incident of brutal assault and third-degree torture inflicted on 16-year-old Dalit minor Lokesh Kumar, a resident of Jhirana in the Bhiwadi area of Khairthal-Tijara district of Rajasthan, while in illegal police custody at the UIT police station, is extremely heartbreaking, reprehensible, and shameful.
According to family members, on April 21, 2026, the child was forcibly taken from his home and beaten so mercilessly that his condition turned critical, requiring him to be placed on a ventilator. He is fighting between life and death. This incident not only raises serious questions about law and order but also highlights that the Dalit community remains unsafe even today.
The most worrying aspect is that despite the family's complaint, no FIR has even been registered against the guilty police personnel.
Chief Minister @BhajanlalBjp ji, is this the government's sensitivity toward atrocities against Dalits?
We pray to nature for our brother Lokesh's swift recovery.
Our demands from @RajGovOfficial: An FIR must be registered immediately. Strict sections under the SC/ST (Prevention of Atrocities) Act must be applied. The guilty police personnel must be suspended and arrested. The victim must be provided better treatment, compensation, and security. A fair investigation of the case must be conducted, and the guilty must be given severe punishment.
Stop the oppression of Bahujans – Deliver justice!
@RajCMO
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ये है बीकानेर के श्रीडूंगरगढ़ इलाके में तोलियासर गांव का सरकारी स्कूल गर्मी की छुट्टियों के बाद स्कूल खुला तो कमरे की पट्टियां टूटी हुई थी, शिक्षा मंत्री जी सोचो अगर यहाँ स्कूल में बच्चे पढ़ रहे होते तो क्या होता ?
हनोई की गलियों से हलांग बे की गुफाओं तक
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किताब : तुम्हारा नाम क्या है वियतनाम?
(लेखक भंवर मेघवंशी)
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