इंदिरा गांधी जैसी नेता आज होतीं तो RP एक्ट के तहत बीजेपी पर प्रतिबंध लगा देतीं, इस विषय पर मेरे स्पष्ट विचार:
"देखिए, विपक्ष के जितने भी लोग मेरे बयान पर आज बोल रहे हैं, वे खुद नहीं बोल रहे, बल्कि उनसे ऊपर से बुलवाया जा रहा है। आरएसएस वाले कहें या उनके बड़े नेता, वे बकायदा ��य करते हैं कि आपको आज यह बयान देना है और आपको वह। कई बार तो जो लिखित बयान मीडिया में छपता है, उसकी भाषा और शब्दावली उन नेताओं की होती ही नहीं है। मैं उनमें से कई अच्छे लोगों को व्यक्तिगत रूप से जानता हूँ और उनकी वास्तविक भाषा से वाकिफ हूँ। जब उनकी बदली हुई भाषा सामने आती है, तो साफ समझ आ जाता है कि यह ऊपर से लिखकर आया है और वे केवल उसे दोहरा रहे हैं। यह तो हुई पहली बात।
दूसरी बात, मैंने जो कानूनी पह��ू उठाया है, उस पर आज पूरे देश में चर्चा हो रही है और यह अच्छी बात है। लोकतंत्र (डेमोक्रेसी) में चर्चा होते रहनी चाहिए, क्योंकि उसी से एक 'नेशनल डिबेट' (राष्ट्रीय बहस) बनती है और मंथन से ही सही बातें निकलकर सामने आती हैं। मैं तो केवल यह ��ूछ रहा हूँ कि हमारा कानून और संविधान इस बारे में क्या कहता है? एक तरफ आप भी संविधान की दुहाई देते हैं, वहीं दूसरी तरफ जब राहुल गांधी जी कहते हैं कि संविधान की रक्षा करो, तो आप उसी संविधान की धज्जियाँ उड़ा रहे हैं! आप खुद देख लीजिए। खैर, आप मीडिया वाले भी गजब हैं; एक बार दिल्ली में आपने कार में मेरी फोटो लेकर रील बना दी थी। आपकी दुनिया ही अलग है। लेकिन आप ही मुझे बताइए कि हमारा कानून वास्तव में क्या कहता है?
आइए, मैं आपको जनप्रतिनिधित्व अधिनियम (RPA), 1951 की धाराएं समझाता हूँ:
धारा 123 (3), RPA 1951: इसके तहत किसी भी उम्मीदवार या उसके एजेंट द्वारा धर्म, जाति, समुदाय या धार्मिक प्रतीकों के आधार पर वोट माँगना पूरी तरह प्रतिबंधित है। कानून बिल्कुल साफ है, ऐसा करने पर चुनाव शून्य (Void) घोषित हो जाता है और दोषी पर 6 वर्ष तक चुनाव लड़ने की रोक लग सकती है। यह पहला नियम है।
धारा 123 (3A), RPA 1951: चुनाव के दौरान विभिन्न समुदायों के बीच धर्म या जाति के आधार पर नफरत, वैमनस्य या शत्रुता बढ़ाना 'भ्रष्ट आचरण' (Corrupt Practice) माना जाता है, जो किसी भी जीते हुए चुनाव को रद्द करने का सबसे ठोस कानूनी आधार है।
धारा 29A (5), RPA 1951: इसके अनुसार, किसी भी राजनीतिक दल के पंजीकरण (Registration) के समय दल द्वारा देश के संविधान और धर्मनि���पेक्षता (Secularism) की शपथ लेना अनिवार्य है। इसके बिना कोई भी नई पार्टी पंजीकृत नहीं हो सकती।
यह बात अलग है कि भारत निर्वाचन आयोग (ECI) का यह दिशा-निर्देश वर्ष 2005 में आया था, इसलिए इसके पहले से अस्तित्व में आ चुकी पार्टियों को इसमें नहीं छुआ गया, जिसमें अकाली दल, एआईए��आईएम (AIMIM) और एआईएमएल (AIML) जैसी पार्टियाँ शामिल हैं, जो पहले धर्म या समुदाय के नाम पर बनी थीं। लेकिन आज के कानून के मुताबिक कोई नई पार्टी इस तरह नहीं बन सकती।
जब कानून यह कहता है, तो मैंने केवल उसी कानून की बात की है। आप देश की अदालतों के ऐतिहासिक फैसले उठाकर देख लीजिए:
वर्ष 1995 (शिवसेना मामला): चुनाव के दौरान एक उम्मीदवार के पक्ष में कथित तौर पर कट्टर धार्मिक भाषण देने के कारण सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहा���िक सजा सुनाई थी। अदालत ने उस जीते हुए चुनाव को रद्द कर दिया था और संबंधित व्यक्ति पर 6 साल के लिए चुनाव लड़ने का प्रतिबंध लगा दिया था।
वर्ष 1995 (डॉ. दासराव देशमुख मामला, नांदेड़): लोकसभा चुनाव के दौरान उम्मीदवार की सहमति से रैलियों और वाहनों पर धार्मिक नारे व सांप्रदायिक पोस्टर लगाने को बॉम्बे हाईकोर्ट ने 'भ्रष्ट आचरण' माना और जीता हुआ पार्लियामेंट का चुनाव रद्द कर दिया था। आप सोचिए, देश की अदालत ने संसद का चुनाव रद्द किया था!
वर्ष 1995 (मनोहर जोशी मामला): इस मामले में भी क���र्ट ने उनका जीता हुआ चुनाव रद्द कर दिया था, हालांकि बाद में सुप्रीम कोर्ट से उन्हें किसी तकनीकी बिंदु (Technical Point) पर राहत मिल गई थी, वह एक अलग कानूनी विषय है।
भैरों सिंह शेखावत जी का मामला (1995-96): जिसका जिक्र मैंने कल भी किया था। चुनाव रैलियों में राम मंदिर और लक्ष्मी जी के प्रतीकों का इस्तेमाल करने के आरोपों को लेकर उनके खिलाफ केस चला था। हालांकि, बाद में सुप्रीम कोर्ट ने उस याचिका को खारिज कर दिया था। लेकिन चूंकि वे 1993 का चुनाव जीतकर मुख्यमंत्री बन चुके थे, इसलिए हाईकोर्ट के स्तर पर वे इस मामले में काफी गंभीर रूप से घिर गए थे। हम सब जानते हैं कि जब कोई मुख्यमंत्री पद पर बैठा हो, तो साक्ष्यों (Evidence) का मिलना कितना कठिन हो जाता है। अंततः साक्ष्यों के अभाव के कारण वे बच गए, अन्यथा वे भी इसमें कानूनी रूप से फंस चुके थे।
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अशोक गहलोत जी राजस्थान के वो नेता है, जिन्होने गांव के अंतिम छोर पर बैठे व��यक्ति के घर तक अपनी योजनाओं को पहुंचाने का काम किया है।
इसलिए राजस्थान की जनता आज भी अशोक गहलोत जी को जननायक कहते हुए याद करती हैं।
@ashokgehlot51
पिछले दो सालों में महिलाओं ���े खिलाफ अपराध के 76,309 मामले दर्ज हुए—शायद राजस्थान सरकार इसे अपनी “उपलब्धियों की सूची” में जोड़ ले, क्योंकि कानून-व्यवस्था तो मानो छुट्टी पर ��ली गई है।
#2साल_राजस्थान_बेहाल
अशोक गहलोत जी राजस्थान के वो नेता है, जिन्होने गांव के अंतिम छोर पर बैठे व्यक्ति के घर तक अपनी योजनाओं को पहुंचाने का काम किया है।
इसलिए राजस्थान की जनता आज भी अशोक गहलोत जी को जननायक कहते हुए याद करती हैं।
@ashokgehlot51
भारतीय राजनीति में त्याग और समर्पण की प्रतिमूर्ति, देश में अधिकार आधारित युग की सूत्रधार एवं कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी जी को जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं।
#SoniaGandhiji
जयपुर में हाईकोर्ट के आसपास वर्षों से चली आ रही पार्किंग की समस्या का निदान करने के लिए कांग्रेस सरकार के समय वर्ष 2022-23 के बजट में 50 करोड़ रुपये लागत से 500 वाहनों की अंडरग्राउंड पार्किंग बनाने की घोषणा कर काम शुरू किया था।
यह प्रसन्नता का विषय है कि अब यह काम लगभग पूरा हो गया है और ��शा है कि जल्द ही आमजन के उपयोग के लिए शुरू हो जाएगा।
अशोक गहलोत जी राजस्थान के वो नेता है, जिन्होने गांव के अंतिम छोर पर बैठे व्यक्ति के घर तक अपनी योजनाओं को पहुंचाने का काम किया है।
इसलिए राजस्थान की जनता आज भी अशोक गहलोत जी को जननायक कहते हुए याद करती हैं।
@ashokgehlot51