महिला ने महाराजा को नहीं पहचाना। वह अपनी राह चली जा रही थी। पास आने पर जवाहरसिंह जी ने देखा, महिला गहनों से लदी है। उसके गले में कम से कम, आधा सेर सोने का एक बाड़ला चमक रहा था।
परगने पोकरण के महेशों की ढाणी तालाब की पाळ पर स्थित यह देवली जुंझार रूपसी भाटी धीर दास जी और सती सोढी जी की है। पास में ही एकां भाटियान गांव रूपसी भाटीयों का है संभवतः उन्ही के पूर्वज है उनसे आग्रह रहेगा कि देवली की उचित देखभाल करवाएं।