अपनी पहचान हो वो शहर चाहिए।
उसमें बस एक नन्हा-सा घर चाहिए॥
बंद पिंजरों में रटते रहे, जो कहा
अब उड़ेंगे, हमें अपने पर चाहिए।
पीछे-पीछे किसी के नहीं जाएंगे
रास्ते अपने, अपना सफ़र चाहिए।
झुक के उठता नहीं, कोई सीधा नहीं
जो तने रह सकें, ऐसे सर चाहिए।
- विजय किशोर मानव✨