हूबनाथ पांडेय की कविता- “गिरो” - राजेंद्र गुप्ता जी की ज़ुबानी
गिरो
गिरो कि अभी और गिरने की संभावनाएं भरपूर हैं
इतना गिरो कि गुरुत्वाकर्षण बल भी शर्म के मारे गिर पड़े
अभी तो गिरने की शुरुआत है
गिरने के अपने सामर्थ्य पर भरोसा गिरने मत दो
सारा विश्व तुम्हारा गिरना देख रहा है
और ख़ुद न गिर पाने पर अफ़सोस कर रहा है
गिरो !
पर अकेले मत गिरो
रुपए के साथ गिरो
चरित्र के साथ गिरो
गर्व के साथ गिरो
कि एक तुम्हीं हो
जिसमें गिरने का इतना साहस है
उस साहस के साथ गिरो
बेशर्मी के साथ गिरो
बेदर्दी के साथ गिरो
कि दुनिया तुमसे गिरना सीख रही है
किसी एक ही मामले में सही तुम्हें विश्वगुरु होने से कोई रोक नहीं सकता
आनेवाली पीढ़ियां तुम्हारे गिरने में
अपने गिरने की संभावनाएं तलाशेंगी
वे तुमसे भी ज़्यादा गिरने का पराक्रम करेंगी
उनके पराक्रम पर यकीन करते हुए
ज़रा और ज़ोर से गिरो
थोड़े शोर से गिरो
चारों ओर से गिरो
निपट भोर से गिरो
और गिरते रहो, गिरते रहो
यह सच है
कि इससे पहले
तुम्हारी तरह कोई नहीं गिरा
इसका कोई नहीं गिला
बल्कि तुम्हें तो ख़ुश होना चाहिए
कि सदियों से खड़े समाज को
तुम गिरना सिखा रहे हो
एक ही जगह खड़े खड़े
लोग जड़ हो गए थे
उन्हें जड़ से तुम्हीं हटा रहे हो
यह कोई आसान काम नहीं
जो तुम ज़माने को बता रहे हो
कि जो गिरने में असमर्थ हैं
वे तुम्हारी आलोचना करेंगे
तुम्हारी निंदा करेंगे
इन सबसे घबराना नहीं
गिरने से डगमगाना नहीं
आज तक जो कुछ न गिरने के लिए प्रतिबद्ध था
वह सब लेकर गिरो
धर्म लेकर गिरो
कर्म लेकर गिरो
देश लेकर गिरो
भेस लेकर गिरो
पेड़ लेकर गिरो
रेंड़ लेकर गिरो
पानी लेकर गिरो
पहाड़ लेकर गिरो
सावन लेकर गिरो
अषाढ़ लेकर गिरो
प्रकृति लेकर गिरो
संस्कृति लेकर गिरो
विकृति लेकर गिरो
ओ वर्तमान सदी के महानतम महापुरुष
पूरी कायनात को दिखा दो कि तुम और कितना गिर सकते हो
कल हो सकता है
कि तुम्हारा गिरना देखकर ही
लोगों में उठने की कामना जाग उठे
आनेवाली पीढ़ियों को उठने का अर्थ बताने
के लिए
कम और ज़्यादा गिरने का फ़र्क बताने के लिए गिरो!
बिना किसी की फ़िक्र
सिर्फ़
और सिर्फ़
गिरो!
गिरते रहो!
जब तक
गिरने की प्रक्रिया
निष्क्रिय न हो जाय !!!
गिरो! गिरो! गिरो!
ऐसा लगता है कि इस डबल इंजन सरकार के दोनों इंजन फ़ेल हो गए हैं क्योंकि एनबीसीसी अब सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला भी नहीं मान रहा है और सरकार अरोड़ा के सामने घुटने टेक चुकी है ।
There are only 6000 who are registered citizens of India in India, rest are all fake even Pradhan sevak.
According to data provided by the Ministry of Home Affairs (MHA) in official parliamentary responses, approximately 5,000 to 6,000 foreign nationals have been granted Indian citizenship since 2014.
मोहन यादव का भाई-भतीजावाद उर्फ़ परिवारवाद :
जब मोहन यादव शिक्षा मंत्री थे, तब भी उन पर सरकारी शिक्षा संस्थानों में नियमों को शिथिल करके अपने रिश्तेदारों को पद और नौकरियां दिलाने के आरोप लगे. इतना ही नहीं, अपने करीबी रिश्तेदारों के ट्रांसफर भी उज्जैन और आसपास के इलाकों में करवाए गए.
मुद्दा सिर्फ इतना नहीं है कि मोहन यादव का परिवार रियल एस्टेट कारोबार में था. असली सवाल यह है कि जिन इलाकों में बड़े प्रोजेक्ट्स आने वाले थे, उनके ही आसपास की ज़मीनें पहले से क्यों खरीदी गईं? क्या इसलिए कि सत्ता के भीतर बैठे लोगों को मास्टर प्लान और आने वाले प्रोजेक्ट्स की एडवांस जानकारी पहले से उपलब्ध थी? और फिर जैसे-जैसे वे इलाके मास्टर प्लान में शामिल होते गए, ज़मीनों के दाम आसमान छूते गए.
यही इस पूरे खेल का सबसे गंभीर और संदिग्ध पहलू है. सत्ता, सूचना और संपत्ति का गठजोड़.
लेकिन बीजेपी में जवाबदेही नाम की चीज़ बची ही कहाँ है? न कोई जांच, न कोई जवाबदेही, न कोई इस्तीफा. इसलिए पूरी आशंका है कि यह घोटाला भी बाकी मामलों की तरह दबा दिया जाएगा और सब कुछ चुपचाप हश-हश कर दिया जाएगा.
अक्षम्य अपराध
पहले पूजनीय शंकराचार्य @jyotirmathah पर माघ मेला में हमला और फिर POCSO एक्ट के तहत झूठा केस!
अब तो आरोपी आशुतोष ने स्वयं कबूला कि UP सरकार ने उस पर दबाव डलवा कर झूठा मुकदमा दर्ज करवाया!
इस महापाप की सज़ा देश की भ्रष्ट अदालतें तो देने से रही!
कर्म फल तो अवश्य मिलेगा
एक निडर और सच्चे पत्रकार की पीड़ा
“जिन्होंने नेहरू की किसी किताब के 10 पेज नहीं पढ़े वो उनके बारे में न जाने क्या-क्या बक रहे हैं
जिन्होनें महात्मा गांधी की किसी किताब के 20 पेज नहीं पढ़े वो बापू को गाली देते हैं
प्रधानमंत्री के खिलाफ़ कुछ बोलो तो कहते हैं राष्ट्र के खिलाफ़ हो गया
सरकार के खिलाफ़ बोलो तो कहते हैं देश के खिलाफ़ हो गया”
चीन ने 2 दिनों में 1.3 करोड़ छात्राओं की परीक्षा आयोजित की, वीडियो दिखाया
◆ भारत में चीनी दूतावास की प्रवक्ता ने बताया, "चीन की गाओकाओ, दुनिया की सबसे बड़ी परीक्षा, जो भारत के JEE और NEET का संयुक्त रूप है"
◆ प्रवक्ता ने आगे कहा, "परीक्षा मात्र 2 दिनों में 1.3 करोड़ छात्रों के लिए सुचारू रूप से आयोजित किया गया, कारखानों ने काम रोका, सड़कें सुन्न रहीं, पूरा देश अपने छात्रों के लिए एकजुट हो गया"
#China | China | @ChinaSpox_India
सोचिये....आप सुबह सो कर उठते हैं, दरवाज़े पर दस्तक होती है , इससे पहले की आप कुछ समझ पाते आपके परिवार के सामने NIA आपको टेरर फंडिंग के आरोप में गिरफ्तार कर ले जाती है।
मोहल्ला तमाशा देखता है और फिर अगले दिन आप नेशनल हैडलाइन बन जाते हैं
कश्मीर के ह्यूमन राईट एक्टिविस्ट खुर्रम परवेज़ को नवंबर 2021 में NIA टेरर फंडिंग के आरोप में गिरफ्तार कर ले जाती है।
और फिर 3 साल 1 महीने के बाद जब कोई कॉल रिकॉर्ड या डिजिटल सबूत नहीं मिला तो खुर्रम को बाइज्जत बरी कर दिया गया
2016 में मोदी सरकार ने एक बड़ा सपना दिखाया था—भारत में 20 “विश्वस्तरीय विश्वविद्यालय” बनाने का। कहा गया कि चुने गए संस्थानों को विशेष स्वायत्तता, संसाधन और सरकारी समर्थन मिलेगा ताकि वे दुनिया की शीर्ष रैंकिंग में जगह बना सकें। 2017 में “Institutions of Eminence (IoE)” योजना शुरू हुई और इसे भारत की उच्च शिक्षा में क्रांतिकारी बदलाव का कदम बताया गया।
आज, लगभग एक दशक बाद, सवाल पूछना ज़रूरी है: उस वादे का क्या हुआ?
हकीकत यह है कि योजना का विस्तार वर्षों से ठप पड़ा हुआ दिखाई देता है। नए आवेदन स्वीकार नहीं किए जा रहे हैं, चयन प्रक्रिया लगभग रुक चुकी है और जिन 20 विश्वस्तरीय संस्थानों की कल्पना दिखाई गई थी, उनका कोई स्पष्ट परिणाम देश के सामने नहीं है। भारत आज भी वैश्विक विश्वविद्यालय रैंकिंग में सीमित उपस्थिति रखता है और उच्च शिक्षा में संरचनात्मक चुनौतियाँ जस की तस बनी हुई हैं।
लेकिन इस योजना की सबसे बड़ी पहचान उसकी उपलब्धियाँ नहीं, बल्कि अंबानी के Jio Institute का विवाद बन गया।
2018 में सरकार ने Jio Institute को “Institution of Eminence” प्रक्रिया में शामिल किया, जबकि उस समय वह संस्थान अस्तित्व में ही नहीं था। न कोई छात्र, न कोई शिक्षक, न कोई कैंपस, न कोई शोध रिकॉर्ड। सरकार ने कहा कि उसे “ग्रीनफील्ड” श्रेणी में केवल Letter of Intent दिया गया है। लेकिन देश भर में सवाल उठा कि जब दशकों पुराने विश्वविद्यालय संसाधनों और मान्यता के लिए संघर्ष कर रहे थे, तब एक गैर-मौजूद संस्थान को विशेष दर्जे की दौड़ में आगे क्यों रखा गया?
बाद में सामने आए दस्तावेज़ों से पता चला कि वित्त मंत्रालय के अधिकारियों ने भी ऐसे संस्थानों को केवल प्रस्तावों के आधार पर चुनने पर गंभीर आपत्तियाँ जताई थीं। इसके बावजूद निर्णय कायम रहा। इससे यह धारणा और मजबूत हुई कि नीति निर्माण में पारदर्शिता और निष्पक्षता के बजाय प्रभावशाली कॉरपोरेट समूहों को प्राथमिकता दी जा रही है।
लेकिन इस पूरी बहस का सबसे महत्वपूर्ण पहलू इतिहास से तुलना है।
1947 में जब भारत आज़ाद हुआ, तब देश के पास संसाधन सीमित थे, विदेशी मुद्रा का संकट था, औद्योगिक आधार कमजोर था और साक्षरता बेहद कम थी। इसके बावजूद प्रधानमंत्री Jawaharlal Nehru की सरकार ने उच्च शिक्षा और वैज्ञानिक संस्थान निर्माण को राष्ट्र-निर्माण का केंद्रीय लक्ष्य बनाया। उसी दौर में Indian Institutes of Technology की स्थापना शुरू हुई, All India Institute of Medical Sciences बना, University Grants Commission को सशक्त किया गया, राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं का जाल बिछाया गया, परमाणु ऊर्जा और अंतरिक्ष अनुसंधान कार्यक्रमों की नींव रखी गई। उस समय भारत गरीब था, लेकिन संस्थान वास्तविक थे—कैंपस थे, छात्र थे, शिक्षक थे, प्रयोगशालाएँ थीं और शोध हो रहा था।
इसके विपरीत आज भारत दुनिया की शीर्ष अर्थव्यवस्थाओं में गिना जाता है। सरकार के पास संसाधन कहीं अधिक हैं, लेकिन “20 विश्वस्तरीय विश्वविद्यालय” जैसी महत्वाकांक्षी घोषणा का परिणाम अभी भी स्पष्ट नहीं है। सवाल यह नहीं है कि कौन-सी सरकार बेहतर थी। सवाल यह है कि क्या आज हम उतनी ही गंभीरता से संस्थान बना रहे हैं, जितनी गंभीरता से उनके बारे में प्रचार कर रहे हैं?
आख़िरकार इतिहास घोषणाओं को नहीं, संस्थानों को याद रखता है।
जब कोई सरकार 20 विश्वस्तरीय विश्वविद्यालयों का वादा करे, तो दस साल बाद देश को विज्ञापन नहीं, विश्वविद्यालय दिखने चाहिए। और यदि परिणाम दिखाई नहीं देते, तो सवाल पूछना राजनीति नहीं, लोकतंत्र का दायित्व है।
भुवनेश्वर
भोपाल
रांची
जोधपुर
अहमदाबाद
हैदराबाद
अमरावती
दिल्ली
में NEET पेपर लीक और CBSE OSM घोटाले के विरोध में शिक्षा मंत्री के इस्तीफा की, NTA बैन की और न्यायिक जाँच की मांग करते हुए
@nsui और @IYC के नेतृत्व में संघर्ष करता Gen Z का सैलाब नहीं दिखा ‘तलवाचाटू गोदी मीडिया’ को ?
जिस गर्मी में AC से बाहर लोग नहीं निकलते है उस गर्मी में विनोद जाखड़ छात्रो की लड़ाई लड़ रहा है , AC कमरों में बैठ कर अगर रीट्वीट भी नहीं कर सकते तो लाहनत है पब्लिक पर 🙏
धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा चाहते हो तो रीट्वीट करते जाओ 🙏
तपती गर्मी में
बरसात में
पानी के कैनन के सामने
लाठियाँ खाते हुए
लहूलुहान
गिरफ़्तार हुए
NSUI और युवा कांग्रेस के साथियों ने छात्रों की आवाज़ उठाई
NEET पेपर लीक और CBSE में मार्किंग झोल के ख़िलाफ़ प्रदर्शन किया
Gen Z की बात की
कितने टीवी चैनल पर दिखाये गए वो?