सुना है तुम्हारा शहर छोटी-बड़ी पहाड़ियों से घिरा हुआ है। सोचता हूँ कि किसी रात उन्हीं में से किसी एक पहाड़ पर चढ़’कर पूरे शहर को ताकूँ। दूर से आती हुई रोशनियों को देख’कर सोचूँ कि मीरा शायद यहाँ होगी, शायद वहाँ होगी। लेकिन, ये जानता हूँ कि चाहे कितना भी ढूँढ लूँ तुम अब नहीं मिलोगी
उँगलियाँ जब तुम्हारी उँगलियों से गलती से भी टकरा जाती थी तो फिर पहरों तुम्हारे हाथ से लिपटी रहती थीं। यही उँगलियाँ अब तुम्हारा फ़ोन नंबर डायल करने में भी थरथराती हैं।
बस कोई जादू की छड़ी घूम जाए
और तू मेरी दुनिया में आ जाए
एक बार जो तू मुझे गले लगाए,
इस बेसब्री को थोड़ा सुकून आ जाए
दिल का क्या है, ख़्याल बना के खुश हो लेता है,
पर असली दुनिया का सच मुझे सज़ा देता है
कश्मकश बस यही हरदम होती
के न तुम मुस्कुराते और न ये बात होती।
- ना’मालूम।