साढ़े तीन लाख लूटने वाले को मिलकर मारते हो साढ़े तीन लाख करोड़ लूटने वाले को माला पहनाते हो।
इतना सन्नाटा क्यों है भाई?
अरे आपका मात्र 3.5 (साढ़े तीन लाख) करोड़ ही तो लूटा गया है।
और फिर लूटने वाला भी तो अपना भाई हिंदू हृदय सम्राट महामानव 56 इंची ही है।
"वर्दी सत्ता की नहीं, संविधान की होती है।"
आर्मी ऑफिसर के बीवी ने वर्दी का क्या धर्म ओर क्या फ़र्ज़ होता है ये खूबसूरत तरीके से समझाया
"आपके कंधों के सितारे ताकत नहीं, जिम्मेदारी का प्रतीक हैं। अशोक चिन्ह याद दिलाता है कि आपकी निष्ठा किसी सरकार से नहीं, संविधान और देश की जनता से है।
लाठी आवाज़ दबाने के लिए नहीं, कानून की रक्षा के लिए है। वर्दी का सम्मान उसके कपड़े से नहीं, उसे पहनने वाले के चरित्र से होता है।
वर्दी का धर्म: सेवा, संयम और संविधान।" 🇮🇳
₹15.15 लाख करोड़ का महाघोटाला? राजेश एक्सपोर्ट्स की बैलेंसशीट में ऐसा क्या खेल हुआ कि पूरी मार्केट हिल गई।
राजेश एक्सपोर्ट्स का मामला अब सिर्फ एक कंपनी की गड़बड़ी नहीं रह गया है। यह भारतीय शेयर बाजार, ऑडिट सिस्टम, बैंकिंग निगरानी और कॉर्पोरेट गवर्नेंस की पूरी व्यवस्था पर बड़ा सवाल बन गया है।
SEBI ने ज्वेलरी और गोल्ड कारोबार से जुड़ी कंपनी राजेश एक्सपोर्ट्स पर आरोप लगाया है कि कंपनी ने कई साल तक अपनी कमाई के आंकड़े बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए। यह आरोप कोई छोटा-मोटा नहीं है। रकम है करीब ₹15.15 लाख करोड़।
यानी इतना बड़ा आंकड़ा कि कई राज्यों के सालाना बजट भी इसके सामने छोटे लगें।
सवाल सीधा है अगर कंपनी की बैलेंसशीट में इतना बड़ा खेल चल रहा था, तो ऑडिटर क्या कर रहे थे? बैंक क्या देख रहे थे? बोर्ड ने क्यों नहीं रोका? और बाजार नियामक को भनक इतनी देर से क्यों लगी?
विदेशी कंपनियों के नाम पर कारोबार का पहाड़
SEBI के मुताबिक राजेश एक्सपोर्ट्स ने अपनी कुल कमाई का 97 से 99 प्रतिशत हिस्सा विदेशी सहायक कंपनियों से दिखाया। इनमें सबसे अहम नाम स्विट्जरलैंड की कंपनी Valcambi SA का है।
कहानी यहीं से संदिग्ध हो जाती है।
राजेश एक्सपोर्ट्स के कागजों में Valcambi SA को ऐसा दिखाया गया जैसे कंपनी का असली कारोबार वहीं से चल रहा हो। लेकिन जब उसके अपने ऑडिटेड खातों को देखा गया तो तस्वीर मेल नहीं खाती दिखी।
सरल भाषा में समझिए भारत में बैठी कंपनी कह रही थी कि हमारी विदेशी कंपनी से बहुत बड़ी कमाई हो रही है, लेकिन विदेशी कंपनी के अपने दस्तावेज उस दावे को मजबूत नहीं कर रहे थे।
यही वह दरार थी जहां से पूरा मामला खुलना शुरू हुआ।
कागजों पर बिक्री, कागजों पर खरीद?
SEBI के आदेश में एक और चौंकाने वाला आरोप सामने आया है। कंपनी ने एक संस्था के साथ हजारों करोड़ रुपये की बिक्री और खरीद दिखाई। लेकिन उस संस्था ने ऐसे लेन-देन से ही इनकार कर दिया।
अगर यह आरोप जांच में सही साबित होता है, तो इसका सीधा मतलब होगा कि कारोबार असल में नहीं हुआ, सिर्फ कागजों पर दिखाया गया।
यानी बिक्री भी कागजों पर, खरीद भी कागजों पर, और कंपनी की कमाई भी कागजों पर।
लेकिन शेयर बाजार में निवेशक इन्हीं कागजों पर भरोसा करते हैं। बैंक भी इन्हीं दस्तावेजों के आधार पर कंपनी की ताकत आंकते हैं। और यही वजह है कि यह मामला बेहद गंभीर हो जाता है।
कंपनी का पैसा निजी खातों तक कैसे पहुंचा?
SEBI ने यह भी आरोप लगाया है कि कंपनी के पैसे मालिक राजेश मेहता के निजी खातों तक पहुंचे। कुछ रकम का इस्तेमाल व्यक्तिगत डेरिवेटिव ट्रेडिंग में होने की बात भी कही गई है।
किसी भी कंपनी में मालिक और कंपनी के पैसे के बीच साफ दीवार होनी चाहिए। कंपनी का पैसा शेयरधारकों का पैसा होता है। उसे निजी ट्रेडिंग या निजी खातों में इस्तेमाल करना गंभीर कॉर्पोरेट गवर्नेंस उल्लंघन माना जा सकता है।
अगर यह साबित हुआ, तो सवाल सिर्फ अकाउंटिंग का नहीं रहेगा। मामला फंड डायवर्जन, निवेशकों से विश्वासघात और संभावित टैक्स जांच तक जा सकता है।
ऑडिटर ने मुहर कैसे लगा दी?
यह इस पूरे मामले का सबसे बड़ा सवाल है।
कंपनी की बैलेंसशीट कोई WhatsApp मैसेज नहीं होती कि किसी ने लिख दिया और सबने मान लिया। उसे तैयार करने के बाद कई स्तरों पर जांच होती है। मैनेजमेंट, बोर्ड, ऑडिट कमेटी, स्वतंत्र निदेशक और अंत में ऑडिटर।
ऑडिटर का काम सिर्फ दस्तखत करना नहीं होता। उसका काम यह देखना होता है कि कंपनी जो आंकड़े दिखा रही है, वे सच हैं या नहीं।
अब सवाल उठता है
विदेशी सब्सिडियरी से इतनी बड़ी कमाई दिखाई गई तो उसके दस्तावेज क्यों नहीं परखे गए?
कथित बिक्री और खरीद के लिए सामने वाली पार्टी से पुष्टि क्यों नहीं ली गई?
अगर कंपनी का पैसा निजी खातों में जा रहा था तो उसे पकड़ा क्यों नहीं गया?
क्या ऑडिट सिर्फ कागजी खानापूर्ति बनकर रह गया था?
बैंक और रेटिंग एजेंसियों की भूमिका भी सवालों में
इतना बड़ा कारोबार दिखाने वाली कंपनी को बैंकिंग सिस्टम भी गंभीरता से देखता है। कारोबार जितना बड़ा, बैंकिंग सुविधाएं उतनी बड़ी। क्रेडिट लिमिट, लोन, गारंटी, लेटर ऑफ क्रेडिट, एक्सपोर्ट फाइनेंस सब कंपनी के वित्तीय आंकड़ों पर निर्भर करते हैं।
अब सवाल यह है कि क्या बैंकों ने कंपनी के आंकड़ों को स्वतंत्र रूप से जांचा?
क्या निर्यात, बिक्री, भुगतान और विदेशी लेन-देन का मिलान किया गया?
क्या किसी ने यह देखा कि जिस कारोबार का दावा किया जा रहा है, उसका वास्तविक पैसा कहां है?
अगर बैंक भी सिर्फ ऑडिटेड बैलेंसशीट पर भरोसा करते रहे, तो यह बैंकिंग निगरानी की भी बड़ी विफलता है।
क्या यह टैक्स चोरी का मामला भी बन सकता है?
फिलहाल SEBI ने मुख्य रूप से गलत खुलासे, गलत आंकड़े और फंड डायवर्जन की बात कही है। लेकिन मामला यहीं रुकता नहीं दिखता।
अगर जांच में यह साबित होता है कि फर्जी बिक्री, फर्जी खरीद, गलत इनवॉइस या पैसा घुमाकर विदेश भेजने का खेल हुआ है, तो आयकर विभाग, GST विभाग, ED और FEMA से जुड़ी एजेंसियां भी सक्रिय हो सकती हैं।
क्योंकि जहां फर्जी कारोबार दिखता है, वहां टैक्स का सवाल अपने आप उठता है।
क्या गलत खर्च दिखाकर टैक्स बचाया गया?
क्या पैसा विदेश भेजा गया?
क्या विदेशी कंपनियों का इस्तेमाल केवल आंकड़े सजाने के लिए हुआ?
क्या शेयर बाजार में भरोसा पैदा करके निवेशकों को भ्रमित किया गया?
इन सभी सवालों की जांच जरूरी है।
SEBI को इतनी देर से गंध क्यों नहीं आई?
यह सवाल सिर्फ राजेश एक्सपोर्ट्स से नहीं, पूरे बाजार सिस्टम से है।
कंपनी सालों तक शेयर बाजार में सूचीबद्ध रही। हर साल रिपोर्ट आई। ऑडिटेड बैलेंसशीट आई। निवेशक पैसा लगाते रहे। शेयर बाजार में कंपनी की वैल्यू बनती-बिगड़ती रही।
फिर इतने बड़े आरोप तक पहुंचने में इतने साल क्यों लगे?
क्या सिस्टम शिकायत आने का इंतजार करता रहा?
क्या शेयर बाजार की निगरानी सिर्फ कागजी नियमों तक सीमित है?
क्या बड़े नाम और बड़े आंकड़े अपने आप भरोसेमंद मान लिए जाते हैं?
सबसे ज्यादा नुकसान छोटे निवेशकों का
ऐसे मामलों में सबसे बड़ा नुकसान आम निवेशक का होता है। वह कंपनी के मालिक को नहीं जानता। वह बैलेंसशीट खुद जांच नहीं सकता। वह ऑडिटर की मुहर, SEBI के सिस्टम और स्टॉक एक्सचेंज के खुलासों पर भरोसा करता है।
जब यही भरोसा टूटता है, तो छोटे निवेशक की पूंजी डूबती है।
SEBI के मुताबिक इस कथित गड़बड़ी और फंड डायवर्जन से शेयरधारकों की संपत्ति को हजारों करोड़ का नुकसान हुआ। इसका सबसे बड़ा असर उन लोगों पर पड़ता है जिन्होंने कंपनी के प्रकाशित आंकड़ों पर भरोसा करके शेयर खरीदे।
यह सिर्फ कंपनी का मामला नहीं, सिस्टम की परीक्षा है
राजेश एक्सपोर्ट्स केस भारत के कॉर्पोरेट सिस्टम की बड़ी परीक्षा है।
अगर आरोप सही साबित होते हैं, तो यह पूछा जाएगा कि ₹15.15 लाख करोड़ जैसे आंकड़े सालों तक बैलेंसशीट में कैसे चलते रहे?
ऑडिटर सो रहे थे या सिस्टम अंधा था?
बोर्ड ने सवाल क्यों नहीं पूछे?
बैंक कैसे भरोसा करते रहे?
और SEBI को इतनी देर से क्यों पता चला?
अब यह देखना होगा कि जांच सिर्फ कंपनी और उसके मालिक तक सीमित रहती है या उन सभी लोगों तक पहुंचती है जिनकी मुहर, मंजूरी और चुप्पी से यह कथित खेल इतना बड़ा हुआ।
क्योंकि अगर लाखों करोड़ के आंकड़े भी बिना असली कारोबार के बैलेंसशीट में घूम सकते हैं, तो यह सिर्फ निवेशकों के लिए खतरा नहीं, बल्कि पूरे वित्तीय सिस्टम के लिए खतरे की घंटी है।
#RajeshExports @SEBI_India @FinMinIndia@dir_ed@CBIHeadquarters
लोकेशन: झारखंड हजारीबाग
हजारीबाग में संजीत पासवान ने 12 साल की एक मासूम मुस्लिम लड़की तमन्ना का रेप कर उसपर एसिड डालकर उसकी हत्या कर दी.
जब इन सब चीजों से मन नहीं भरा तो उसने तमन्ना के छोटे भाई रिजवान जिसकी उम्र महज 3 साल थी उसने उसकी भी हत्या कर शरीर के 4 टुकड़े कर दिए..
दुर्भाग्य से पुलिस वालों की बंदूक की नली जाम हो गई थी क्योंकि आरोपी हिंदू था…
हिंदू संगठन वालों के पैरों में लकवा लग गया था और कान से बहरे हो गए थे शायद इसी लिए उन मासूमो की चींख अभी तक उनके कानों में नहीं गई…
MY CLARIFICATION...
to statements made by Lieutenant Governor of Ladakh regarding his warning to me to refrain from making comments on #CockroachJantaParty
The meeting and the LG's tweet happened on 26th evening, yet I avoided reacting to the post that evening. But next morning it dawned on me that it was more of a press statement than just a tweet as the absurd statement appeared in several newspapers. So I made this video but again restrained myself from posting...
Shayad unki aakhri ho yeh sitam, har sitam yeh soch kar hum seh gaye...
But this morning even more media channels carried this... and I kept getting calls from journalists for my comments.
So finally here it is...
Media house are welcome to use it... no copyright
#diesellockdown lagta hai bacpan ke din wapas laut Rahe hai pahele rokel ke dabbe line main huwa karte the fark itna hai ab diesel ke liye log lage hai @PetroleumMin@PMOIndia@RahulGandhi diesel ka shortage hai ya bewajha penic create kiya ja raha hai
@NavbharatTimes Janshayog dange bhadkane ke liye ya logo ko apas main ladane ke liye ucc kanoon kanoon lagu ho gaya hai sab normal sahab ko shayad maza nahi aa raha hai isliye janshayog aur jagrukta lag rahi hai abhi filhal log gas oil grocery main pareshan hai