@itihasa24 Recently visited Meenakshi temple, it's amazing one particularly the carving on the 8 pillars in front of Shiva temple within the same campus
शरीर से मांस का एक-एक कतरा गल चुका था। पसलियां बाहर आ गई थीं। हिलने-डुलने तक की ताकत नहीं बची थी।
जब अंग्रेजों ने देखा कि यह 25 साल का लड़का टूट नहीं रहा, तो उन्होंने जबरदस्ती नाक में नली ठूंसकर दूध पिलाने की कोशिश की। वह नली खाने की नली की जगह फेफड़ों में चली गई।
दूध फेफड़ों में भर गया। वो तड़पते रहे, खून की उल्टियां करते रहे, लेकिन अनशन नहीं तोड़ा।
13 सितंबर 1929 को लाहौर जेल में एक क्रांतिकारी ने अपने प्राण त्याग दिए। 63 दिन... जी हाँ, 63 दिन तक बिना अन्न का एक दाना खाए।
इतिहास के पन्नों में अक्सर हम भगत सिंह की फांसी की बात करते हैं, लेकिन उस साथी को भूल जाते हैं जिसने भगत सिंह की बाहों में दम तोड़ा था।
आज हम बात कर रहे हैं 'यतींद्र नाथ दास' की, जिन्हें दुनिया 'जतिन दा' के नाम से जानती थी।
पेशे से वो बम बनाने में माहिर थे, लेकिन उनका हथियार बना उनका अपना शरीर।
वो चाहते तो माफी मांग सकते थे, खाना खा सकते थे। लेकिन मांग सिर्फ एक थी - "भारतीय राजनीतिक कैदियों के साथ जानवरों जैसा सलूक बंद करो।"
अंग्रेजों को लगा कि भूख इसे तोड़ देगी। लेकिन उन्हें नहीं पता था कि यह शरीर मिट्टी का नहीं, फौलाद का बना है।
जब जतिन दा की हालत बिगड़ने लगी, तो अंग्रेजों ने क्रूरता की सारी हदें पार कर दीं। जेल के डॉक्टर और सिपाहियों ने उन्हें दबोच लिया। नाक से नली डाली। दर्द से वो चीखते रहे, लेकिन उनका संकल्प नहीं डिगा।
उनकी शहादत की खबर जब बाहर आई, तो पूरा देश रो पड़ा था।
कहा जाता है कि जब उनका शव लाहौर से कलकत्ता ले जाया जा रहा था, तो हर स्टेशन पर हजारों लोग फूल लेकर खड़े थे। कलकत्ता में उनकी अंतिम यात्रा में 6 लाख से ज्यादा लोग शामिल हुए।
सुभाष चंद्र बोस ने खुद उनके पार्थिव शरीर को कंधा दिया था।
लेकिन आज? आज कितने लोग उस 63 दिन की तपस्या को याद करते हैं?
मरते वक्त जतिन दा ने कहा था, "मैं कोई साधु नहीं हूँ, मैं बस एक साधारण इंसान हूँ जो अपने देश की गरिमा के लिए मरना चाहता है।"
आजादी चरखे से आई या बिना खड्ग-ढाल के, यह बहस का विषय हो सकता है। लेकिन यह सच है कि आजादी की नींव में जतिन दा जैसे नौजवानों की गल चुकी हड्डियां गड़ी हैं।
हमें यह आजादी खैरात में नहीं मिली, इसके लिए किसी ने अपनी जवानी के 63 दिन भूखे रहकर कुर्बान किए हैं।
हर भारतीय का कर्तव्य है कि वो जाने कि जिस हवा में वो सांस ले रहा है, उसकी कीमत क्या थी।
इस जानकारी को साझा करें ताकि आने वाली पीढ़ियां जान सकें कि असली 'हीरो' कौन थे।
यह पोस्ट केवल उन भूले-बिसरे नायकों को नमन करने के लिए है....Read News
राज्यात लाखो किलो बनावट पनीर आणि खवा तयार होत होता हे आता उघड झालेय. हा खवा आणि पनीर विकत घेणारी एक साखळी राज्यभरात कार्यरत होती. राजस्थान तसेच उत्तरप्रदेश मधून इकडे आलेल्या बिकानेर स्वीट्स, जयपूर मिठाई, राजस्थान स्वीट्स, आग्रा मिठाई, अग्रवाल स्वीट्स, शर्मा स्वीट्स, पुरोहित नमकीन, राजपुरोहित स्वीट्स आणि तत्सम स्वीट्स मेकर्सची झाडाझडती एफडीएने घेतली पाहिजे! खूप मोठे सत्य समोर येऊ शकते.
राज्यभरात लग्न कार्ये, संमेलने अथवा वेगवेगळ्या औचित्यावर भोजनावळी दिल्या जातात त्याचे काम घेण्यासाठी स्थानिक आचारी लोकांत राजस्थानी गुजराती महाराज घुसले, त्यांची एक खासियत आहे की झोपडपट्टीमधील लग्न असो की महालात राहणाऱ्याचे लग्न असो, ते किमान एक तरी पनीर डिशचा आग्रह धरतात! ह्या पनीर भाज्यांचे खरे स्वरूप आठवून आता पोटात कालवतेय! ह्या केटरिंगवाल्यांची चौकशी व्हायला हवी!
हे लोक काय विकत होते हे इथल्या ग्राहकांना कळाले पाहिजे, कारण बिफोर तुकाराम मुंढे आणि आफ्टर तुकाराम मुंढे असे यांच्या पदार्थांच्या चवीचे, रंगांचे, टेक्श्चरचे पॅटर्न आहेत.
पुर्वी कधी तुम्ही जर ह्या लोकांकडून काही खरेदी केली असेल तर, आता यांच्या स्वीट होमला भेट दिली तर फरक कळेल, तो पुर्वीचा गंध, रंग आणि स्वरूप आता तसेच जाणवत नाही, त्यात आमूलाग्र बदल झालाय!
पुर्वी कसलेही तिखटजाळ खाऊन अथवा अगदी कालच्या दिवसाचे शिळ्या चपातीचे तुकडे खाऊनही पोट टकटकीत असणाऱ्या मराठी माणसाचे पोट नाजुक का झाले याच्या मुळाशी अशा पनीरगोष्टीही निघू शकतात!
कोणत्याही वृत्तवाहिनीने अथवा वर्तमानपत्राने याविषयी स्टिंग किंवा वृत्तमालिका केल्याचे माझ्या तरी पाहण्यात नाही. याचे काय कारण असेल?
- समीर गायकवाड #Facebook post
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ओठांवर विठ्ठलाचे नाम आणि हृदयात अखंड भक्ती…
याहून मोठी श्रीमंती जगात दुसरी कोणती ? देवाचे अभंग ओव्या गात भक्तिरसात न्हाऊन निघण्याचा आनंद काही वेगळाच !
वारकरी साधेपणाने जगतो, पण श्रद्धेने समृद्ध असतो. अज्ञानी माणसासारखा तो प्रमेश्वराला घेऊन निःशंक नसतो. त्याची ईश्वरावर एक शुद्ध श्रद्धा असते पराकोटीचा शुद्ध विश्वास असतो. याच भक्तीमुळे वारी ही केवळ वारी नसून भक्तिमय जीवन जगण्याची शिकवण आहे.
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कैलाश मंदिर के रहस्य की पूरी कहानी।
वैज्ञानिक मानते हैं एलियन ने बनाया होगा!!
आज आपको हिन्दू होने पर गर्व महसूस हुआ होगा!!
जय सत्य सनातन धर्म 🛕🚩
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