यदि उसका पता बता दूँ तो लोग उसके पीछे पड़ जाएंगे, अभी ऊपर से बताने का आदेश नहीं हुआ है।'
वह अवतार यानि महापुरुष संत रामपाल जी महाराज जी हैं जिनका जन्म 8 सितंबर 1951 को गाँव धनाना, जिला सोनीपत, हरियाणा में हुआ था जो 7 सितंबर 1971 को 20 वर्ष के हो चुके थे।
तारणहार_संतरामपालजी_महाराज
संत रामपाल जी कौन हैं?
जिस महापुरुष के विषय में जयगुरुदेव पंथ के संस्थापक तुलसीदास जी ने शाकाहारी पत्रिका (जयगुरुदेव की अमरवाणी भाग 2) के पृष्ठ 50 पर 7 सितंबर 1971 को भविष्यवाणी करी कि
'वह अवतार जिसकी लोग प्रतीक्षा कर रहे हैं वह 20 वर्ष का हो चुका है।
कि वह महापुरुष ऐसा ज्ञान बतलायेगा, जो आज से पहले किसी ने भी न सुना होगा, उसके ज्ञान को सुनकर सभी विद्वान कहलाने वाले धर्मगुरुओं को नतमस्तक होना पड़ेगा।”
जो ज्ञान संत रामपाल जी बता रहे हैं वह ज्ञान अब तक किसी को भी पता नहीं था और हम इस बात से भी वाकिफ़ हैं
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कौन हैं संत रामपाल जी?
संत रामपाल जी महाराज जगत के तारणहार, मुक्तिदाता संत हैं जिनके विषय में फ्रांस के विश्व प्रसिद्ध भविष्यवक्ता नास्त्रेदमस ने अपनी भविष्यवाणी के शतक 6 श्लोक 70 में लिखा है:
“मैं छाती ठोककर कहता हूं
महापुरूष फरमान तब, जग तारन को आय।।
घर घर बोध विचार हो, दुर्मति दूर बहाय।
कलियुग में इक होय सब, बरते सहज सुभाय।।
कहा उग्र कहा छुद्र हो, हरै सबकी भव पीर (पीड़)।
सो समान समदृष्टि है, समरथ सत्य कबीर।।
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कौन हैं संत रामपाल जी महाराज?
संत रामपाल जी महाराज कबीर परमेश्वर के अवतार हैं जिनके विषय में कबीर परमेश्वर ने 600 वर्ष पूर्व ही कबीर सागर के अध्याय स्वसमवेद बोध के पृष्ठ 171 पर बताया था कि
पांच सहंस अरू पाँच सौ पाँच, जब कलियुग बीत जाय।
बाद में परब्रह्म, ब्रह्म के लोकों व वेदों की रचना की इसलिए वेदों में कविर्देव का विवरण है।
परमात्मा साकार है!
गुरु ग्रन्थ साहेब, राग आसावरी, महला 1 के कुछ अंश - पृष्ठ 463
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पूर्ण परमात्मा कविर्देव चारों युगों में आए हैं। सृष्टी व वेदों की रचना से पूर्व भी अनामी लोक में मानव सदृश कविर्देव नाम से विद्यमान थे। कबीर परमात्मा ने फिर सतलोक की रचना की,
ऊपर को पूर्ण परमात्मा आदि पुरुष परमेश्वर रूपी जड़ वाला नीचे को तीनों गुण अर्थात् रजगुण ब्रह्मा, सतगुण विष्णु व तमगुण शिव रूपी शाखा वाला अविनाशी विस्तारित पीपल का वृक्ष है, जिसके जैसे वेद में छन्द है ऐसे संसार रूपी वृक्ष के भी विभाग छोटे-छोटे हिस्से टहनियाँ व पत्ते कहे हैं।
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संत रामपाल जी कौन हैं?
गीता अध्याय 15 श्लोक 1 में तत्वदर्शी संत की पहचान बताते हुए गीता ज्ञान दाता ने कहा है कि
ऊर्ध्वमूलम्, अधःशाखम्, अश्वत्थम्, प्राहुः, अव्ययम्,
छन्दांसि, यस्य, पर्णानि, यः, तम्, वेद, सः, वेदवित्।।1।।
हरि अर्थात परमात्मा हरियाणा में प्रकट होंगे। उनके द्वारा बताई शास्त्रोक्त भक्ति की साधना से मोक्ष का मार्ग प्राप्त होगा। संत जम्भेश्वर जी की यह वाणी संत रामपाल जी महाराज पर खरी उतरती है। क्योंकि संत रामपाल जी महाराज ही वह पूर्ण परमात्मा के अवतार हैं
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कौन हैं संत रामपाल जी महाराज?
विश्नोई धर्म के संस्थापक संत जम्भेश्वर जी ने शब्द वाणी सं. 102 में कहा है:
विष्णु-विष्णु भण अजर जरी जै, धर्म हुवै पापां छुटिजै।
हरि पर हरि को नाम जपीजैहिरयालो हरि आण हरूं, हरि नारायण देव नरू
#नारी_रत्न_की_खान
संत रामपाल जी के मार्गदर्शन में सादगीपूर्ण तरीके से विवाह, असुर निकंदन रमैणी का चलन बढ़ा है, जिससे दहेज और अनावश्यक दिखावे से मुक्ति मिली है। इससे न केवल बेटियों का सम्मान बढ़ा है बल्कि समाज में विवाह को एक पवित्र और सरल प्रक्रिया के रूप में स्वीकार किया गया है।
#नारी_रत्न_की_खान
संत रामपाल जी महाराज के सत्संगों से लाखों पुरुषों ने नशे का त्याग किया है, जिससे उनके परिवार, विशेषकर उनकी पत्नियों का जीवन सुखमय हुआ है। नशा मुक्त समाज की दिशा में उनके प्रयासों ने महिलाओं के जीवन में नई उम्मीद और खुशियां भरी हैं।
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संत रामपाल जी महाराज ने समाज में महिलाओं और पुरुषों के बीच समानता स्थापित करने के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। संत रामपाल जी महाराज अपने सत्संगों में बताते हैं कि बेटा-बेटी में कोई अंतर नहीं है। अंतर हमारी सोच के कारण है।
#नारी_रत्न_की_खान
संत रामपाल जी महाराज ने महिलाओं की सुरक्षा को सर्वोपरि मानते हुए समाज को जागरूक किया है। उनके प्रयासों से महिलाओं के प्रति होने वाले अत्याचारों में कमी आई है और समाज में महिलाओं के लिए एक सुरक्षित वातावरण का निर्माण हुआ है।
@narinder modi ji
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संत रामपाल जीने दहेज प्रथा के खिलाफ आवाज़ उठाई व उसका पूर्णतः अंत किया जिससे लाखों बेटियों को बिना किसी आर्थिक दबाव के जीवन जीने का अवसर मिला है प्रयास से में बेटियों का सम्मान बढ़ा है औरविवाह को 17 मिनट की असुर निकंदन रमैणीद्वारा सरल व सादगीपूर्ण बनाया गया है।
सत्संग_क्यों_सुनें
Sant Rampal Ji Maharaj
जगतगुरु तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज ने सचेत किया है कि ज्ञान के बिना मनुष्य पशु-पक्षी की तरह संतानोत्पत्ति और उनके पालन पोषण के लिए आजीवन संघर्षरत रहते हैं। अंत में प्राण त्याग कर कर्मानुसार पुनर्जन्म को प्राप्त होते हैं।