परिवर्तन हमेशा खामोशी से..निरन्तर प्रयास से होते हैं। बहुत धैर्य की आवश्यकता होती है।
स्वतन्त्र भारत के आज तक के इतिहास में पहली बार #अमेरिका ने माना, "..जम्मू-कश्मीर भारत का आंतरिक विषय है, और #अभिन्न_हिस्सा है।" सो 19 अगस्त 2026 का दिन याद रखिएगा।
वरना आज तक अमेरिकी बयान रहा, "..जम्मू-कश्मीर #विवादित_क्षेत्र है।"
अब इसके लिए यदि प्रधानमंत्री @narendramodi का आभार व्यक्त करूं? स्वयं को भारत राष्ट्र के प्रति समर्पित कहूं तो @RahulGandhi का पोतड़ा उठाने वाले मित्रों को अवश्य तिलमिलाहट होगी?
सब उनका तो कुछ कर नहीं सकता, जो ना व्यापक भारत के साथ हैं! ना समाज के साथ! और ना धर्म के साथ।
भारत आए अमेरिकी राजदूत SERGIO GOR का बयान सुनिए। हालांकि इस अंदेशे से इनकार नहीं कर सकता, इस बयान के पीछे #पाक_कश्मीर को भारत में घुसेड़ने की साजिश भी हो सकती है।
राजनीति में जो बोला जा रहा है, उसके कोई मायने नहीं होते, मायने होते हैं, जो नहीं बोला जा रहा है। जरूरी है #मौन को सुनना।
तुमने कहा श्री कृष्ण यदुवंशी थे - ब्राह्मणों ने कहा , वे भगवान हैं
तुमने कहा श्री राम क्षत्रिय हैं- ब्राह्मणों ने कहा, वे भगवान हैं
तुमने कहा बुद्ध , शाक्य मौर्य है -ब्राह्मणों ने कहा वे विष्णु अवतार हैं
तुम्हे कहा विश्वकर्मा बढ़ई हैं - ब्राह्मणों ने कहा वो भगवान हैं
तुमने कहा रावण ब्राह्मण था - ब्राह्मणों ने कहा राक्षस था ,
परन्तु फिर भी जातिवादी ब्राह्मण हैं ??
जिस भी समाज में "backward", "most backward", "extremely backward " कहलवाने ही होड़ मच जाए, वह देश विश्वगुरु तो क्या, विश्व coolie बनाने की औक़ात भी नहीं रखता!
यह categories हमारे हिंदू समाज की देन है ही नहीं।
यह colonial categeries हैं और धर्मांतरण माफिया के हित में बनायी गई।
देश का नेता वही कहलाने योग्य है जो एक झटके में इन categories को कूड़े की टोकरी में फेंक कर reservation policy को रद्द कर दे!
फिर देखेंगे कौन स्वयं को Backward Caste कहलवाने में इतराता है।
सामान्य वर्ग के नागरिको, दिल्ली पहुँचो!
आने वाले कुछ माह (और यदि सरकार हमारी बातें न माने, तो कुछ वर्ष) हमारे भविष्य के लिए निर्णायक होने जा रहे हैं। कुछ लोगों ने मुझे कहा था कि 5-6 दिन मैं प्रधानमंत्री को कुछ न कहूँ, वो लोग ‘कुछ’ कर रहे हैं।
सरकार ने कुछ भी नहीं किया, कोई संकेत भी नहीं किया। सरकार ने वही किया जो ये करते रहे हैं: इस बात पर दाव लगाया कि लोग सुप्रीम कोर्ट, केजरीवाल और ईरान के समाचारों के बीच यूजीसी समाप्त हो जाएगा, यदि कुछ बड़े हैंडल लिखना बंद कर दें।
अभी बिहार चुनाव चर्चा में है, नए सीएम की घोषणा तक समाचारों में वही विषय बना रहेगा। ऐसा @BJP4India और @narendramodi जी के सूचना संचालन दल का सोचना है।
अतः, आठ मार्च को दिल्ली आइए। जहाँ तक मुझे ज्ञात है, जंतर मंतर और रामलीला मैदान, दो स्थानों पर प्रदर्शन है। मैं आयोजकों से आग्रह करूँगा कि रामलीला मैदान में ही यह प्रदर्शन हो, ताकि एक स्थान पर अधिकाधिक लोग आ सकें।
यह प्रदर्शन राजनैतिक रूप न ले, इसका ध्यान करें। उचित बातें हों, और अपनी संगठनात्मक क्षमता का प्रदर्शन करना हमारा लक्ष्य होना चाहिए। सरकार चाहेगी कि मंच से कुछ विचित्र बोला जाए, और मैं जानता हूँ कि कुछ लोग आपके बीच सेंधमारी कर चुके होंगे। उनकी पहचान करें।
सरकार से हमने आरक्षण हटाने को नहीं कहा, हमने यह नहीं कहा कि तुम जय भीम करना बंद कर दो। हमने उनसे सवर्णों पर हो रहे घृणास्पद बयानबाजी, नारेबाजी, पोस्टरबाजी और हिंसक व्यवहारों को उसी तरह अपराध बनाने को कहा, जैसे इन्होंने SC/ST और BC एक्ट में किया है। हमारी एक भी माँग अनुचित नहीं बताई गई है।
अन्य माँगों की एक सूची हमने सार्वजनिक कर रखी है, जो बेयर मिनिमम है। हमारे और आपके ऊपर कॉन्ग्रेसी, सपाई समेत कई पार्टियों के एजेंट होने के आरोप लग चुके हैं, पर हमारी माँगों को अनुचित बताने का कोई तर्क नहीं है इनके पास।
किसी ने भी ‘तुम्हारी भाषा सही नहीं है’ और दो कौड़ी के झाँटू तर्क कि ‘स्टे तो लग ही गया’, के इतर तीसरी बात नहीं कही है।
इसलिए, वापस लिखना चालू कीजिए, वीडियो बनाइए, दलित-वंचित-शोषित-पीड़ित के तुष्टिकरण के हर पर्चे को सार्वजनिक कीजिए। पार्टी या सत्ता के जो भी भ्रम हैं, वो दूर कीजिए। यह हमारे भविष्य की लड़ाई है और भाजपा-संघ को इसे धागे भर का अंतर नहीं पड़ता।
इन पतितों के सामने, इस आंदोलन से जुड़ी हर लड़की का चरित्र हनन इसी भाजपा के कुछ CMO में बैठे लोगों ने किया। भाजपा के आइटी सेल (और वानाबी आइटी सेल) के दलालों की शब्दावली आप देख चुके हैं। इन्होंने नैतिकता की हर सीमा लाँघी है। इनके नेता आज भी चुप ही हैं।
पार्टी ने न तो उन्हें रोका है, न ही वो स्पेस आदि में गाली देने से रुक रहे हैं। स्पष्ट है कि इन चिरकुटों को पार्टी का मौन समर्थन है और वो वही कर रहे हैं जो पार्टी चाहती है। अतः, इनको उचित उत्तर देते रहिए।
सुप्रीम कोर्ट के सामने इस सरकार का लिजलिजापन हम सबने देख लिया। पूरी सरकार रेंगने लगी, नरेन्द्र मोदी स्वतः संज्ञान लेने लगे, उनकी नाराजगी की खबर ‘सूत्रों के हवाले से’ लीक करा कर चलाई गई। पर यह पार्टी यूजीसी पर फेविकोल पी कर सोई हुई है।
यह मैं विश्वास के साथ कह रहा हूँ कि सरकार पिछले सात दिन को अपनी सफलता मान कर नाच रही होगी। उन्हें लग रहा है कि यह समाचार दब गया, विश्व युद्ध के ग्राफिक्स में लोग भूल जाएँगे।
ठीक है, ये मान कर भी देख ही लो।
PS: भाजपा/संघ के लोगों से आग्रह है अब मुझे संपर्क करने की चेष्टा न करें। आपको बहुत समय दे दिया गया, आपने धोखेबाजी की है।
कल #UPSC का अंतिम रिजल्ट आया। खूब हंगामा। खासकर #हिंदी_पट्टी में। क्योंकि दक्षिण, बंगाल, गुजरात या पूर्वोत्तर भारत के युवाओं में IAA/IPS को लेकर इतना जुनून कभी दिखा नहीं मुझे।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय और फिर जनसत्ता, इंडियन एक्सप्रेस, आउटलुक में रहने के बाद समझ आई इन अफसरों की वास्तविक हैसियत। एक समय था, भारत भर से यदि 850 अंतिम सेलेक्शन हो रहे हैं तो इनमें 250 से 300 हमारे बीच पढ़े छात्र होते। मेरे साथ के भी कई UPSC टॉपर रहे। फिर पत्रकारिता में रहते, कैबिनेट सेक्रेटी से लेकर भारत के चीफ जस्टिस या तमाम अफसरों को #पॉवर_कॉरिडोर में निकट से देखा। यकीन मानिए, #व्हाइट_कालर_क्लर्क से ज्यादा हैसियत नहीं होती।
मेरे समय UPSC टॉप किए एक सीनियर छात्र थे। यूपी काडर के। क्या हुआ उनका अंत? आखिरी समय #जेल में बीता। जब सेलेक्शन हुआ तो हमारे विश्वविद्यालय के #नायक थे। मेरे साथ पढ़ा एक सेकंड पोजिशन पाया। यह भी उप्र काडर का। आज पता नहीं कहां पड़ा होगा #गुमनामी में। मुझे खुद खबर नहीं।
एक कहानी और रहती है, प्रतियोगी परीक्षाओं के चयन में #असफल रहे छात्रों की अनसुनी कहानी। इनकी संख्या सफल छात्रों से कई #गुना है। कहां जाते हैं ये असफल छात्र? कहां जाकर खपते हैं ये? जीवन के तीस-पैंतीस वर्ष की आयु एक कमरे में गुजारने के बाद क्या बचता है इनके पास? कभी इन #अनकही_कहानियों को सुना? सुना तो समझने का या अनुभव करने का प्रयास किया? शर्तिया नहीं किया होगा। क्योंकि असफल को कौन याद रखता है इस जगत में?
#अफ़सर_इबादत की हिंदी पट्टी में इतना प्रकोप कई दिशाओं की ओर संकेत दे रहा है...
■ एक तो लंबे समय से हिंदी पट्टी में बौद्धिक, साहित्यकार, रंग या कलाधर्मी या फिर खेल मैदान से कोई #नायक पैदा नहीं हो रहा है। नायक बनने लायक हैं भी नहीं। चौतरफ़ा सन्नाटा पसरा हुआ है।
■ दूसरे, सारा नायकत्व #ब्यूरोक्रेसी और #राजनेताओं तक सिमट चुका है। इतना सिमटा हुआ है, राज्यसभा भेजे जाने वालों में एक भी चेहरा #सृजन_क्षेत्र से नहीं है। राज्यसभा भेजे जाने वाले हर चेहरे को गौर से देखिए, रिटायर्ड ब्यूरोक्रेट होगा या फिर किसी राजनेता का नातेदार।
■ एक और आयाम है, #दलाली का। दलाली के धंधे को #राज्याश्रय चाहिए होता है। और इस आश्रय के लिए ब्यूरोक्रेट्स और राजनेता के अलावा तीसरा विकल्प नहीं।
■ यह कोई छोटा-मोटा संकट नहीं है, इसका असर सोशल मीडिया से लेकर हर क्षेत्र में साफ दिखाई दे रहा है..कहीं ऐसा स्पेस नहीं बचा है, जहां भावी पीढ़ी या युवा अपने मौलिकता को बनाए हुए #नायकत्व स्थापित कर सके। सोशल मीडिया पर भी वो ही इंफलयून्सर हैं, जो राजनीतिक हंगामे में हुनरमंद है। प्रकृति,खेती-किसानी या फिर नृत्य, संगीत, भाषा, या फिर किसी भी इतर क्षेत्र में लिखने या संवाद करने वाले नाममात्र को हैं। इनके फालोवर भी दस-बीस।
■ मेरा उद्देश्य कमी या बेशी बताना नहीं है, मेरा मुद्दा है #राजसत्ता_संघर्ष का दायरा क्या केवल राजनेता और ब्यूरोक्रेट्स हैं? या फिर व्यापक समाज है? निर्णय आप स्वयं कीजिए।
#ईरान रवाना होने से पहले #मुफ्त_राशन की कतार में भारत की #वीरांगनाएं।
…आखिर, बिना राशन-पानी के कोई फ़ौज कैसे जंग लड़ेगी? फिर सफर भी लंबा है। यही वह बुनियादी सवाल है, जिस पर हर किसी का ध्यान नहीं जाता। ना ऐसा सोच पाने का जज्बा है।
यही मेरा भी कहना है, #करप्शन को नागरिक समाज के विमर्श में लाना अनिवार्य है। वरना देश की भावी पीढ़ी समझेगी कैसे कि #व्यवस्था चलती कैसे है? इस व्यवस्था से असमानता कैसे आ रही है? उनका भविष्य क्या है?
■ NCERT के पूर्व निदेशक J. S. Rajput ने एक इंटरव्यू में कहा, देश Supreme Court of India का सम्मान करता है, लेकिन National Council of Educational Research and Training भी कोई छोटा-मोटा संस्थान नहीं है। दशकों से इसी की किताबें पढ़कर छात्र प्रशासन, न्यायपालिका, अकादमिक और राजनीति के बड़े पदों तक पहुंचे हैं।
■ राजपूत का तर्क सीधा है—अगर किताब में कोई त्रुटि थी तो #संवाद से सुधारी जा सकती थी। NCERT हर साल संशोधन करता है, विशेषज्ञों की समितियाँ बैठती हैं, सामग्री अपडेट होती है। फिर “conspiracy” और “scandalous” जैसे कठोर शब्दों की आवश्यकता क्यों पड़ी? क्या असहमति का हर मामला #षड्यंत्र की श्रेणी में डाल दिया जाएगा?
■ यहां सवाल केवल एक पैराग्राफ या अध्याय का नहीं है, सवाल यह है कि क्या #संस्थाओं के बीच संवाद की परंपरा कमजोर हो रही है? लोकतंत्र में न्यायपालिका सर्वोच्च है, लेकिन सर्वोच्चता का अर्थ #अचूकता नहीं होता। खुद अदालतें मानती हैं कि न्यायिक त्रुटियाँ संभव हैं—कई लोग वर्षों बाद निर्दोष साबित होते हैं। तब गलत फैसलों या
करप्शन पर लिखना जरूरी है।
■ यह लोकतांत्रिक जिम्मेदारी है। बच्चों को यह सिखाना भी जरूरी है कि व्यवस्था में कमियाँ हैं और उन्हें सुधारना नागरिक कर्तव्य है।
■ यदि किताब में न्यायपालिका के संदर्भ में भ्रष्टाचार का उल्लेख है, तो वह सामाजिक यथार्थ का हिस्सा भी है। अदालतों में तारीख पर तारीख, पेशकारों द्वारा खुलेआम लेन-देन की शिकायतें, दलाली संस्कृति—ये बातें समाज की चर्चाओं में मौजूद हैं। यह कहना कि “सब भ्रष्ट नहीं हैं” बिल्कुल सही है, पर यह भी उतना ही सच है कि भ्रष्टाचार की घटनाएँ होती हैं और लोगों का भरोसा चोटिल होता है।
लेखकों और शिक्षाविदों का काम आईना दिखाना है, न कि महिमामंडन करना। अगर किताब में भाषा असंतुलित थी तो संशोधन हो सकता था, पर कठोर शब्दों से प्रतिक्रिया देना क्या समाधान है? इससे तो यह संदेश जाता है कि आलोचना #असहज करती है।
लोकतंत्र में संस्थाओं की गरिमा संवाद से बढ़ती है, टकराव से नहीं।
■ न्यायपालिका का सम्मान जरूरी है, पर शिक्षा संस्थानों की स्वायत्तता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। सवाल यह नहीं कि कौन बड़ा है—सवाल यह है कि क्या हम असहमति को सहने का साहस रखते हैं?
अगर हर आलोचना को “षड्यंत्र” और हर असुविधाजनक सत्य को “स्कैंडल” कहा जाएगा, तो फिर पाठ्यपुस्तकें बच्चों को सच बोलना कैसे सिखाएँगी?
■ लोकतंत्र की असली परीक्षा यही है—सत्ता और व्यवस्था दोनों आईने में खुद को देखने की हिम्मत रखें।
खैर भारत का नागरिक समाज अभी इन मसलों पर विमर्श के मूड में नहीं है।
@narendramodi@AmitShahOffice
केंद्रीय गृहमंत्री अमित भाई शाह आपको भारत माता की शपथ है ‘’ भारत मे रहनेवाले इन ईरानीयों को सम्मान के साथ ईरान भेजो Pls.
भारत सरकार थोड़ा ध्यान दें और जल्द से जल्द इन्हें भेजने का प्रबंध करे.....
ईरान के #लोकतांत्रिक_मुखिया#खामनेई_साहब के बर्बर कत्ल पर आदरणीय #सोनिया_गांधी को सिर्फ @narendramodi से ही नहीं, संयुक्त राष्ट्र के #महासचिव से #शोक_संदेश की मांग करनी चाहिए। ये दोनों अव्वल दर्जे के #तानाशाह हैं, दोनों ने कतरा बराबर संदेश जारी नहीं किया।
मुझे इस बात पर फख्र है, खामनेई साहब #बैलेट_पेपर और #EVM के दुर्घष युद्ध से निकल कर ईरान के #लोकतांत्रिक_सरपरस्त बने थे। ईरान के सबसे लंबे समय से लोकतंत्रिक प्रधान रहें। उनकी पार्टी का नाम है #ईरानी_रिवोल्यूशनरी_गार्ड।
मुझे उम्मीद है, भारत के युवराज आदरणीय @RahulGandhi जी आर्यावर्त की #राजमाता से अपील करेंगे, संयुक्त राष्ट्र के महासचिव को कस कर डांट लगाएं। अखबारों में आर्टिकल लिखें। देश राजमाता के साथ है।
कोई शक?
कोई सवाल?
@UN
#मोईजी_इस्तीफा_दो।