A democracy where unemployed youth asking questions are called ‘cockroaches’ is a democracy dangerously close to confusing accountability with disobedience.
The irony is brutal: The system fears the jobless youngster with a phone more than the powerful man with a fraud file.
If criticism is ‘attacking the system,’ then perhaps the system has become too fragile to survive scrutiny.
History shows repeatedly Every establishment first mocks its critics, then demonises them, then quietly steals their language years later.
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कुछ लड़के होते हैं जिन्हें कभी खुले शब्दों में नहीं, लेकिन धीरे-धीरे हर जगह से ठुकरा दिया जाता है। पिता की आँखों में वे कभी उम्मीद नहीं बन पाए, माँ की थकान में उनका नाम कहीं पीछे छूट गया, घर की दीवारों ने उन्हें अपनापन नहीं बल्कि जिम्मेदारियों का बोझ दिया। वे घर में रहते हुए भी मेहमान जैसे रहे, न किसी ने उनके सिर पर हाथ फेरा, न उनके भीतर के डर को पढ़ा। उनसे बस इतना कहा गया कि मजबूत बनो, रोना मत, सवाल मत करो।
ऐसे लड़के बचपन में ही बड़े हो जाते हैं। उन्हें खिलौनों से ज्यादा हिसाब-किताब समझाया जाता है। उनके हिस्से में डाँट ज्यादा आती है, दुलार कम। पिता के शब्द अक्सर तुलना से भरे होते हैं “देखो फलाँ का बेटा…” और माँ के पास आँसू होते हैं, पर समय नहीं। वो लड़का सोचता रह जाता है कि क्या मैं सच में इतना बेकार हूँ? क्या मेरे हिस्से का स्नेह किसी और को दे दिया गया?
जब घर से मन टूटता है तो वह बाहर रिश्तों में सहारा ढूँढता है। दोस्ती में दिल लगाता है, प्रेम में खुद को पूरी तरह सौंप देता है। उसे लगता है कि शायद कोई तो होगा जो उसे बिना शर्त अपनाएगा। लेकिन अक्सर वही लड़के सबसे ज्यादा इस्तेमाल होते हैं। क्योंकि वे मना करना नहीं जानते। उन्हें डर होता है कि अगर उन्होंने न कहा तो जो थोड़ा-बहुत साथ है, वह भी चला जाएगा। वे अपनी जरूरतें दबा देते हैं, अपनी इच्छाएँ छुपा लेते हैं, सिर्फ इसलिए कि कोई उन्हें छोड़कर न चला जाए।
और फिर एक दिन वही होता है, प्रेम भी ठुकरा देता है। कारण कुछ भी हो, लेकिन अंत में उँगली उसी पर उठती है। उसे कहा जाता है कि वह कमाता कम है, समझता कम है, या फिर वह पर्याप्त नहीं है। वह फिर से वहीं खड़ा होता है जहाँ बचपन में खड़ा था अकेला, असमंजस में, ये समझने की कोशिश करता हुआ कि उसकी कमी आखिर है क्या।
ऐसे लड़के रोते नहीं, कम से कम सामने तो नहीं। वे रात के सन्नाटे में छत को देखते रहते हैं। उनके भीतर एक गहरा शोर होता है, पर बाहर से वे शांत दिखते हैं। वे अपनी पीड़ा को हँसी में बदलने की कला सीख लेते हैं। लोग उन्हें मज़बूत समझते हैं, पर सच मायने में वे टूटकर भी संभलने की मजबूरी जी रहे होते हैं। उन्हें कभी ये सुविधा नहीं मिली कि वे किसी के कंधे पर सिर रखकर खुलकर रो सकें।
समाज उनसे उम्मीद करता है कि वे कमाएँ, घर संभालें, बहनों की शादी करें, माँ-बाप की सेवा करें, पत्नी को खुश रखें, बच्चों के भविष्य की चिंता करें। लेकिन कोई ये नहीं पूछता कि उनके भीतर जो खालीपन है, उसका क्या? जो पिता से अपनापन नहीं मिला, जो माँ से बिना शर्त प्रेम नहीं मिला, जो घर से सुरक्षा का एहसास नहीं मिला उस अधूरेपन का इलाज कौन करेगा?
कई बार वे गुस्सैल दिखने लगते हैं, चिड़चिड़े हो जाते हैं। लोग कहते हैं लड़कों का स्वभाव ही ऐसा होता है। कोई ये नहीं समझता कि वो गुस्सा दरअसल बरसों की अनसुनी चीख है। वो चिड़चिड़ापन दरअसल उस बच्चे की थकान है जिसे कभी बचपन जीने नहीं दिया गया।
सबसे ज्यादा दुख तब होता है जब वही लड़का अपने बूढ़े माता-पिता के लिए सबकुछ करता है, जिनसे उसे कभी भरपूर प्रेम नहीं मिला। वो शिकायत नहीं करता, बस चुपचाप जिम्मेदारियाँ निभाता है। क्योंकि उसके भीतर कहीं एक मासूम उम्मीद अब भी जिंदा रहती है कि शायद एक दिन पिता उसकी पीठ थपथपाएँगे, माँ उसे गले लगाकर कहेंगी तू बुरा नहीं है बेटा। लेकिन अक्सर वो दिन नहीं आता।
ऐसे लड़के प्यार में भी पूरी ईमानदारी से डूबते हैं। वे धोखा देना नहीं जानते, क्योंकि उन्हें खुद ठुकराए जाने का दर्द पता है। वे अपने साथी को वो सब देना चाहते हैं जो उन्हें कभी नहीं मिला सुरक्षा, विश्वास, साथ। लेकिन जब वही रिश्ता भी उन्हें अधूरा छोड़ देता है, तब उनके भीतर कुछ स्थायी रूप से मर जाता है। वे फिर भी जीते हैं, काम पर जाते हैं, लोगों से मिलते हैं, मुस्कुराते हैं पर भीतर से वे जान चुके होते हैं कि इस दुनिया में उनका अपना कोई कोना नहीं है।
फिर भी यही लड़के सबसे ज्यादा संवेदनशील होते हैं। वे किसी की आँखों का दर्द तुरंत पहचान लेते हैं। वे भूखे को खाना दे देंगे, दुखी को समय दे देंगे, दोस्त के लिए रात भर जाग लेंगे। क्योंकि वे जानते हैं कि अकेलापन क्या होता है। वे नहीं चाहते कि कोई और वैसा महसूस करे जैसा उन्होंने किया।
सच मानिए ठुकराए गए लड़के बुरे नहीं होते, बस थके हुए होते हैं। वे गलत नहीं होते,बस समझे नहीं गए होते। उनकी खामोशी को अकड़ समझ लिया जाता है,उनके आत्मसम्मान को अहंकार। लेकिन अगर कभी कोई उनके भीतर झाँक सके तो पाएगा कि वहाँ अब भी एक बच्चा बैठा है जो सिर्फ इतना चाहता है कि कोई उसे बिना शर्त अपना कहे।
क्योंकि कहीं न कहीं उन्हें उम्मीद है कि एक दिन कोई उनके भीतर के उस बच्चे को देखेगा और कहेगा अब तुम्हें कहीं जाने की जरूरत नहीं..तुम अपने ही हो!
@SocialistLeadr बिना बात बेबात बिना सबूत के सिर्फ अधिकारियों से कुंठा रखना, इकट्ठा सब को चिल्ला कर चोर बोल देना अगर इसे पत्रकारिता समझते हो तो बेकार ही है और क्या कहें? अधिकारी क्या व्यक्ति नहीं है उसकी कोई गरिमा नहीं है? पत्रकारिता के नाम पे पागलपन मत प्रमोट करो।
More than a half people like to see reactions of other people, rather than content. They can't even formulate their own opinion on any certain event or content.
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