आज़ादी की लड़ाई से मौजूदा दौर का सफ़र
क़लम की ताकत से लेकर कैमरे का असर
हर दौर में आपको रखे आगे
एबीपी न्यूज़
साल 1933 में #रविन्द्रनाथटैगोर ने आनंद बाज़ार पत्रिका के लिये क्या लिखा था , उसकी पंक्तियाँ- ☺️☺️
चंपत राय जी जबतक कुर्सी पर बैठे रहेंगे, निष्पक्ष जाँच की बात बेमानी होगी. जिस तरह जैन हवाला कांड के आरोप लगते ही आडवाणी जी ने इस्तीफ़ा दिया था और बेदाग़ होने के बाद चुनाव लड़ा . उन्होंने नैतिकता का सर्वोच्च मानदंड स्थापित किया था.
आप उस पद पर बने रहेंगे तो आपको लेकर निष्पक्ष जाँच की उम्मीद पूरी तरह बेमानी है. जब तक जाँच चले, चंपत राय जी को खुद ही पद छोड़ देना चाहिये.
बच्चे हमारी बातों से नहीं, हमारे व्यवहार से सीखते हैं।
अगर बेजुबान जीव अपने बच्चों को अच्छे संस्कार दे सकते हैं, तो हम इंसानों की जिम्मेदारी और भी बड़ी है।
अच्छे संस्कार दें, क्योंकि बच्चे वही बनते हैं जो वे रोज़ देखते हैं।
#अच्छेसंस्कार#GoodValues#Parenting#Inspiration
𝐋𝐞𝐚𝐝𝐞𝐫𝐬𝐡𝐢𝐩 𝐢𝐬 𝐞𝐚𝐫𝐧𝐞𝐝 𝐭𝐡𝐫𝐨𝐮𝐠𝐡 𝐭𝐫𝐮𝐬𝐭, 𝐫𝐞𝐥𝐞𝐯𝐚𝐧𝐜𝐞, 𝐚𝐧𝐝 𝐚𝐮𝐝𝐢𝐞𝐧𝐜𝐞 𝐞𝐧𝐠𝐚𝐠𝐞𝐦𝐞𝐧𝐭.
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जीतन राम मांझी जी आप मेरे बेहद प्रिय हैं. इसलिए आपसे मुझे बहुत ज्यादा उम्मीदें हैं. माँझी साहब आप भोजपुर पुलिस की पीठ थपथपा रहे हैं तो सिर्फ मैं भोजपुर की बात कर लेती हूँ. महादलित “मुसहर” समाज आपको वोट देता है.
मेरी ये रिपोर्ट आपको बतायेगी कि आपके समाज से आने वाले लोगों को मुफ़्त का अनाज नहीं मिल रहा, इनके बच्चे एक टाइम भूखा सोते हैं,
मेरी ये रिपोर्ट आपको बतायेगी कि आपके समाज से आने वाली बेटियां स्कूल कॉलेज नहीं जातीं, वो चूल्हा जलाने के लिये लकड़ी बीनने जाती हैं.
मेरी ये रिपोर्ट आपको बतायेगी कि आपकी नाक के नीचे मुसहर समाज के बच्चे स्कूल नहीं जाते क्योंकि उनके पास साफ कपड़े नहीं होते, ना कॉपी किताब होता है.
आप मुसहर समाज से आने वाले पूरे बिहार के बड़े नेता हैं,
आपको आपके अधिकारियों ने इस त्रासदी/ बेचारगी वाली ग़रीबी से अवगत नहीं कराया होगा, नहीं तो आप अपने समाज का भला जरुर करते.
आपके संज्ञान में ये रिपोर्ट डाल रही हूँ ताकि दोबारा जब मैं रिपोर्टिंग के लिये जाऊं तो ये बच्चे मुझसे ये सवाल ना पूछें कि क्या एक टाइम का खाना हम भात-दाल तरकारी के साथ नहीं खा सकते ?
क्योंकि इनको ये भी नसीब नहीं हो रहा है मंत्री जी-
https://t.co/Iy9e6gMYfn
दलितों का एंकाउंटर हो तो “नक्सली था मारा गया”,
मुसलमान का एंकाउंटर हो तो “आतंकवादी था मारा गया”,
ऐसा कहने वाले लोग ही भरत तिवारी के एंकाउंटर पर सवाल उठा रहें हैं…
पर सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर भरत तिवारी के पास अवैध पिस्टल कहाँ से आया?
किन लोगों के शह पर इस आपराधिक वारदात पर राजनीति हो रही है?
देश संविधान से चलेगा या फिर अवैध पिस्टल की नोक से?
भरत तिवारी को कोई क्रांतिकारी नहीं था जिनका जातिवादी मानसिकता के लोग समर्थन कर रहें हैं,पुर्व में भी अपराधिक मामले को लेकर इनकी गिरफ़्तारी हो चुकी थी।
वैसे चित्रा त्रिपाठी जी जैसे कुछ लोगों के लिए ये लाईन सटीक है…
लश्कर भी तुम्हारा है सरदार तुम्हारा है,
तुम झूठ को सच लिख दो अखबार तुम्हारा है…