तुम फिर वही बात कर रहे हो जो मैंने कही ही नहीं। मैंने प्रतिनिधित्व पर नहीं, समाधान पर बात की थी। अगर किसी वर्ग का बच्चा आर्थिक रूप से कमजोर है तो उसे ऐसी शिक्षा, स्कॉलरशिप और संसाधन मिलने चाहिए कि वो अपने दम पर प्रतिस्पर्धा कर सके। मेरा सवाल आज भी वही है, कम नंबर पर सीट देना बड़ा समाधान है या लोगों को इतना सक्षम बनाना कि उन्हें कम नंबर की ज़रूरत ही न पड़े?
क्या चाहते हो? अब 1000 साल इसका उल्टा हो? उच्च जाति का शोषण करें? आरक्षण का फ़ायदा SC ST OBC के गरीबों को आज होना भी तो चाहिए। अधिकांश फ़ायदा तो बस उन केटेगरी के अमीर लोगों का हो रहा ना की जरूरतमंद हो।
बात आरक्षण खत्म करने की तो है ही नहीं, जरूरतमंद तक पहुंचते ये मसला है। जरूरतमंद में गरीब General जाति वालों की भी बात हो रही।
@RajratnaWrites एक तो तुम जो चरस-गांजा फूंक के कुछ भी लिख देते हो, बस इसी वजह से विश्वगुरु बनना संकट में है। अपने बच्चों को तो पैसे के दम पर अच्छे स्कूल- कॉलेज में पढ़ा लोगे, लेकिन जिनके पास लाखों की फीस भरने के पैसे नहीं हैं, उनके लिए दोगे?
अगर नहीं, तो ज्ञान कम बाँटो।
मैं खुद चौहान हूँ और OBC से आता हूँ, जिस कैटेगरी को 27% आरक्षण मिलता है। फिर भी मुझे इस सिस्टम से दिक्कत है। क्योंकि इसका फायदा ज़्यादातर उसी वर्ग के आर्थिक रूप से मजबूत लोगों को मिलता है, जो पहले से अच्छी स्कूलिंग, कोचिंग और बाकी सभी सुविधाएँ अफोर्ड कर सकते हैं। जबकि उसी Category का गरीब बच्चा आज भी पीछे रह जाता है। इसलिए मेरा मानना है कि मदद जाति नहीं, ज़रूरत के हिसाब से मिलनी चाहिए—अच्छी शिक्षा, स्कॉलरशिप और आर्थिक सहायता के रूप में।
भाई, पहले मेरी पोस्ट ठीक से पढ़ लो। मैंने कहीं नहीं कहा कि आर्थिक आरक्षण से किसी की बुद्धि या अंक बढ़ जाएंगे। मेरा पॉइंट इतना था कि अगर किसी की सबसे बड़ी समस्या आर्थिक है, तो उसका समाधान अच्छी और मुफ़्त शिक्षा, स्कॉलरशिप, कोचिंग और आर्थिक सहायता है। कम नंबर पर सीट देना और लोगों को इतना सक्षम बनाना कि वो अपने दम पर अच्छे नंबर लाकर सीट लें, दोनों अलग बातें हैं। मेरा फोकस दूसरे वाले पर है, पहले वाले पर नहीं। बात को ट्विस्ट मत करो।
जाती के आधार पर अराजकता इसीलिए है क्युकी आरक्षण के वाबजूद भी परीक्षा में अच्छे अंक लाकर वहाँ पहुँच नहीं पा रहे अन्य जाति वाले। आरक्षित वर्ग कम नंबर में उच्च पदों पर पहुँचने की महत्वकांशा रखने के वजाये आर्थिक आरक्षण के लिए लड़ते अगर तो शायद पहुँच पाते। शिक्षा फ्री हो हर लेवल पर इसके लिए संघर्ष करो, वरना जब कम नंबर पे सीट मिल रही उसकी में सन्तुष रहकर और अपने जीने का आधार मानकर चलेंगे तो 500 साल में भी कभी स्थिति नहीं सुधरने वाली ।
अगर हर बहस में “बाप” बनने का इतना ही शौक़ है, तो पहले ये बता दो कि देश किसी के बाप की जागीर कब से हो गया? संविधान किसी के बाप की धमकी पर नहीं चलता, न ही नीतियाँ किसी के बाप की निजी संपत्ति हैं।
अगर आरक्षण इतना ही मज़बूत और न्यायसंगत है, तो इसकी समीक्षा से डर किसके बाप को लग रहा है? समय-सीमा की बात आते ही किसके बाप का आत्मविश्वास हिल जाता है? सवाल पूछो तो कुछ लोग ऐसे भड़कते हैं जैसे पूरी व्यवस्था उनके बाप की विरासत हो।
किसी का बाप टैक्स देता है, किसी का बाप दिन-रात मेहनत करता है, किसी का बाप अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए सब कुछ दाँव पर लगा देता है। इसलिए किसी भी नीति पर सवाल पूछना किसी के बाप का अपमान नहीं, लोकतंत्र का अधिकार है।
बहस करनी है तो तथ्यों पर करो। “बाप” बनकर नहीं। लोकतंत्र में आख़िरी फ़ैसला किसी के बाप का नहीं, जनता का होता है.
तो किसी के बाप की मेहनत कोई और का बाप खा रहा है, और किसी का बाप बस इसलिए पीछे रह गया क्योंकि किसी के बाप ने आरक्षण को जीने का अधिकार बना रखा है। और रही बात सरकार में बैठे बापों की, जिनके बापों ने तहज़ीब नहीं सिखाई कि संविधान किसी के बाप की धमकियों से नहीं चलता।
खुली चुनौती है—अगर आरक्षण सच में बराबरी का माध्यम है, तो इसकी समय-सीमा और समीक्षा से डर क्यों?
दशकों बाद भी अगर व्यवस्था सिर्फ जाति के नाम पर चलेगी, तो योग्यता और समान अवसर का क्या होगा?
“बाप” बनने की कोशिश मत करो, लोकतंत्र में जनता सबसे बड़ा बाप है। बहस करनी है तो तथ्यों और संविधान के आधार पर करो, भावनात्मक धमकियों से नहीं।
हर बार वही पुराना कैसेट चला दिया जाता है—इतिहास बता दो, बहस खत्म।
लेकिन आज कौन ज़रूरतमंद है, इस सवाल पर सबकी आवाज़ अचानक धीमी पड़ जाती है।
अगर व्यवस्था सच में न्याय के लिए है, तो उसकी समीक्षा से डर कैसा?
या फिर कुछ लोगों को डर है कि “ज़रूरत” आधार बन गई, तो सालों से चला आ रहा आराम कहीं छिन न जाए?
सुधार की बात करते ही ज्ञान की दुकान खुल जाती है, लेकिन ज़रूरत के आधार पर पात्रता तय करने की बात आते ही सबको तकलीफ़ होने लगती है।
70+ साल बाद भी अगर किसी नीति की समीक्षा तक नहीं हो सकती, तो सवाल नीति पर नहीं, राजनीति पर उठते हैं। आरक्षण का उद्देश्य असमानता खत्म करना था, उसे स्थायी व्यवस्था बनाना नहीं। अब समय है कि अवसरों का आधार योग्यता, आर्थिक स्थिति और वास्तविक वंचितता हो—न कि सिर्फ जन्म। लोकतंत्र में हर नीति पर बहस और समीक्षा ज़रूरी है।
#reservationhataomovement #EndReservation #ReservationFreeIndia #reservation @ajeetbharti@ARanganathan72@Bharat_Yatra_@WokeFuneral@dalit_in@CJP_for_India
जब भी आरक्षण की बात होती है, कई लोग कुछ जातियों की खराब स्थिति और दयनीयता दिखाकर आरक्षण के मुद्दे को अलग ही दिशा में भटका देते हैं कि जिनको आरक्षण से दिक्कत है, वो ये देखो… फलाना-ढिमका।
अरे, जिनकी स्थिति ठीक नहीं है, उन्हीं के लिए तो आरक्षण मिले, यही तो मुद्दा है।
अब जिनको 80 सालों से आरक्षण मिलता रहा और आज वो चांदी की चम्मच से खाने लगे हैं, बस उन्हें ही सबसे ज़्यादा दिक्कत है कि लोग आरक्षण पर सवाल क्यों उठा रहे हैं।
आरक्षण का लाभ वास्तव में ज़रूरतमंद तक पहुँचे, भले ही किसी भी जाति से हो, न कि केवल जन्म के आधार पर पीढ़ी-दर-पीढ़ी मिलता रहे।
अगर उद्देश्य सामाजिक न्याय है, तो न्याय का लाभ भी उसी तक पहुँचना चाहिए जिसे आज उसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत है।
#ReservationFreeIndia #reservationHataoMovement #EndReservationNow #Reservation @ARanganathan72@ajeetbharti@Bharat_Yatra_@CJP_for_India
Hello Friends
We’ve seen a lot of discussions about reservation in the last few days.
Many different opinions are coming from various General Category accounts:
-Some want to completely end reservation
-Some want only reforms in the current system
-Some want reservation based on economic status
-Some also want to end caste discrimination
Let’s be clear:
All these views are part of the same movement.
We all want to openly discuss the problems with reservation and find a better path forward - one that benefits the country and rewards merit.
Even if our opinions differ, we share the same goal.
So let’s support each other.
This is just the beginning…
The beginning of a merit-based society, where talent is rewarded, not caste.
Thank You🙏
Jai Hind 🇮🇳 Jai Bharat 🇮🇳💪
#reservationhataomovement
#EndReservationNow
अब देखो Selective Comfort किसे कहते हैं।
और दोगलापन भी समझो।
NEET छात्रों की आत्महत्या के संदर्भ में जो विद्वान सोशल मीडिया पर छात्रों के लिए अखंड ज्ञान दे रहे थे, आज वही विद्वान आरक्षण के मुद्दे पर बता रहे हैं कि आरक्षण कितना ज़रूरी है। उसकी history, polity और social justice का पूरा ज्ञान दे रहे हैं।
लेकिन आरक्षण की वजह से जो करोड़ों छात्र सालों से संघर्ष कर रहे हैं, निराशा झेल रहे हैं, और जिनमें से कई आत्महत्या तक कर चुके हैं, उनके हिस्से में बस ज्ञान आता है, संवेदना नहीं।
किसी भी छात्र की आत्महत्या दुखद है, लेकिन अगर आपकी संवेदना मुद्दा देखकर बदल जाती है, तो वह संवेदना नहीं, Selective Comfort है।
ग़ज़ब के विद्वान हैं।
Hey @PetaIndia@CollectorGuna@GunaPolice@MPPoliceDeptt, Can you help this out? This Dog might have broken bone and roaming here on this location. I just took break for tea here and I don’t know what to do. Please see.
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