कहीं कुछ कर न बैठूँ मैं तेरे संग
कि डर लगता है तेरे देखने से
बचा कर और क्या माज़ी से लाता ?
वही दो-तीन ख़त...वो भी फटे से
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छूट गया गुड्डा मेले में
घर में गुमसुम सी गुड़िया है
सिलवट-सिलवट चादर रोयी
करवट-करवट चुप तकिया है
रूह-नदी के पार है जाना
और बदन गोया पुलिया है
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डुबो देगा तुम्हें सैलाब उन आँखों का ��क दिन
नहीं...उन चश्म-ए-पुरनम को नहीं तुम जानते हो
क़यामत है क़यामत वो जो चिलमन में छुपा है
संभलना ! हुस्न-ए-आलम को नहीं तुम जानते हो
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मुहब्बत वाले मौसम को नहीं तुम जानते हो
अभी कमसिन हो जाँ...हमको नहीं तुम जानते हो
सुनो ! उल्फ़त की धुन दिल में बजी तो टीस देगी
जवाँ धड़कन की सरगम को नहीं तुम जानते हो
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दोपहर सोफ़े पर थक के लुढ़की सी है
न्यूज़-पेपर है बिखरा हुआ आज का
साँवली शाम आगोश में आयी है
फ़र्श का सुर्ख़ कालीन लो हँस पड़ा
सामने छज्जे से एक सीटी बजी
एक खिड़की का पर्दा ज़रा सा हिला
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भीगी ज़ुल्फ़ों से जब गी��ा टॉवल खुला
रूम में जैसे बादल घना सा उठा
धूप शावर में जब तक नहाती रही
चाँद कमरे में सिगरेट पीता रहा
दिन तो बैठी है सीढ़ी पे चुपचाप से
और टेबल पे है फ़ोन बजता हुआ
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इतरा कर उसने पूछा जब... "नाम तो अपना बतलाओ"
दिल धड़का था, ज़ुबाँ सिली थी और था हक्का-बक्का नाम
नाम-पहेली उसकी तो फिर खुलते-खुलते खुलती है
नाम मुहब्बत, नाम इबादत, नाम क़यामत... कैसा नाम
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यारों से कल वो पूछ रहे थे हमारा हाल
महफ़िल जमेगी आज बड़े धूम-धाम से
कब राब्ते का सिलसिला आगे बढ़ेगा और
मिलता नहीं सुकून दुआ और सलाम से
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सुबुक उदासी टुक सी याद
लम्हा-लम्हा तेरे बाद
इश्क़ है सहमा-सहमा सा
हुस्न के करतब...ज़िन्दाबाद
लहू लगा है मुँह को यूँ
उफ़...तेरे होठों का ��्वाद
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जिस्म क्या रूह तक जलेगी
मियाँ ये मुहब्बत है... सोचना था ना !
फिर से रूठे वो... तो मनाया नहीं
मन ये मेरा भी अनमना था ना !
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तपिश बढ़ती ही जाये है...तुम्हें जब तक ख़बर होगी
वजूद अपना कहीं इक दिन न ये इकदम सुलग उट्ठे
तड़पता है, ठिठुरता है, सिहरता है...वो तेरे बिन
गले उसको लगा ले अब...तेरा 'गौतम' सुलग उट्ठे
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वो कब ��ी सैर कर के जा चुकी शिकारे से, मगर
न जाने क्यों अभी भी डल में चुप खड़ा चिनार है
तपिश है बीते वस्ल की…या है असर ये हिज्र का
कि रात के बदन पे इक सौ चार का बुख़ार है
जो मॉनसून अब के इस तरफ़ न आए…ग़म नहीं
तेरी हँसी ही मेरे वास्ते हसीं फुहार है
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है ये दीवाने की ज़िद..हाँ, ज़िद है...ज़िद है अब इसे
तू मिले तो ठीक है...वरना ज़माना चाहिये
और कब तक चुप रहूँ मैं...सुन ऐ लड़की अब तो बस
तेरा नंबर चाहिये...तेरा ठिकाना चाहिये
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कुछ देर कुछ न बोल…परेशान कर ज़रा
ऐ इश्क़ आज हुस्न को हैरान कर ज़रा
सुन ! हो गई है मुझसे मुहब्बत तुझे अगर
महफ़िल में एक बार तो ऐलान कर ज़रा
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हर लम्हा... हाँ, हर लम्हा उफ़ ! ज़ेह्र में क��ंधते रहते हैं
याद तुम्हारी, ख़्वाब तुम्हारे और तुम्हारा मीठा नाम
इक बार पुकारो तो जैसे बन जाए कोलाज कोई
चाँद, समन्दर, बारिश, खुश्बू, नग्मा, क़िस्सा, दरिया नाम
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कौन थे दानिश जो कहते थे... क्या रक्खा है नामों में
हमसे पूछो...एक नाम पर भूल गये हम स���का नाम
उजली-उजली किरणें निकली नीले-नीले इंक से उफ़
कॉपी के सादे पन्ने पर जब-जब तेरा लिक्खा नाम
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इसका...उसका, तुमने लिक्खा है जाने किस-किस का नाम
कभी कहीं इक बार लिखो तो साथ में मेरे अपना नाम
लिस्ट बनाओ बेशक तुम तो ख़ुद पर मरने वालों की
लेकिन सबसे ऊपर लिखना बस मेरा ही मेरा नाम
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