Sharad Joshi ne apne kisi नाटक me kaha tha "इतनी समस्याएँ हैं – महंगाई, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, व्यवस्था की लापरवाही – फिर भी जनता कभी सड़कों पर नहीं उतरती, कभी खुलकर विरोध नहीं करती। जनता को कभी गुस्सा ही नहीं आता।
एक मरता समाज
गुरुग्राम में जिम से लौट रहे एक इंजीनियर की स्ट्रीट लाइट के खंभे से करंट लगने से मौत हो गई। कल गुजरात में एक पुल अचानक बीच में टूट जाने से 13 लोग मारे गए। मरने वालों में एक दो साल का बच्चा और उसकी बहन भी शामिल थीं। कल ही नोएडा में पार्क में पानी से भरे गड्ढे में गिरने से एक बच्चे की मौत हो गई।
कुछ देर पहले एक वीडियो सामने आया, जिसमें एक ग़रीब आदमी का मोबाइल पानी से लबालब भरी सड़क में गिर जाता है। वह इधर-उधर हाथ मारता हुआ मोबाइल ढूंढ़ रहा है। जब मोबाइल नहीं मिलता, तो वह वहीं सड़क के किनारे बैठकर रोने लगता है। शायद उसने बड़ी मुश्किल से आठ-दस हज़ार का ये मोबाइल ख़रीदा होगा और ये सोचकर उसको रोना आ गया होगा कि वो फिर से इतने पैसे कहां से लाएगा!
एक और वीडियो में, एक चार साल का बच्चा जैसे ही अपने घर के दरवाज़े से बाहर निकलता है, तीन-चार कुत्ते उस पर हमला कर देते हैं। बच्चा वहीं गिर जाता है। उसके बाद क्या हुआ, ये देखने की मेरी हिम्मत नहीं हुई।
कुछ दिन पहले एक ख़बर पढ़ी थी कि एक मज़दूर थक-हारकर सड़क किनारे सो रहा था। तभी कुछ लोग वहां कचरे से भरी ट्रॉली खाली कर देते हैं। वहीं सोया मज़दूर नींद में ही मारा जाता है। दुनिया में इससे बुरी मौत और क्या होगी? एक तो इंसान अपनी नियति से ग़रीब पैदा हो। फिर जैसे-तैसे मज़दूरी करके अपना पेट भरे। मज़दूरी करके जब थक जाए, तो सड़क किनारे ही सो जाए। और वह नींद में ही कोई उस पर कचरे की ट्रॉली उलट दे और वह वहीं मारा जाए! क्या इससे ज़्यादा गरिमाहीन मौत कोई हो सकती है? न ज़िंदगी में सम्मान मिला, न मौत में।
ये ज़्यादातर ख़बरें सिर्फ एक-आध दिन की हैं। ये सारी घटनाएं हिला देने वाली हैं। इनमें से हर एक पर राष्ट्रीय बहस होनी चाहिए। आख़िर किसी भी देश में इंसानी जान इतनी सस्ती कैसे हो सकती है? मगर यहां ऐसी किसी ख़बर पर चर्चा नहीं होती। पता नहीं क्यों, हमने इसे अपनी नियति मान लिया है।
पूरे देश में 'सिस्टम' नाम की कोई चीज़ नहीं बची है। कहीं किसी की कोई ज़िम्मेदारी नहीं है। इसीलिए, मौक़ा मिलते ही लोग पहली फ़ुर्सत में देश से निकल जाते हैं।
किसी भी राजनीतिक पार्टी में न तो कोई राष्ट्रबोध है, न कोई संवेदनशीलता। टीवी पर दिनभर ऐसे घटिया विषयों पर चर्चाएं होती हैं, जिनका देश से कोई लेना-देना नहीं होता। दिनभर राजनीतिक पार्टियां खुद को मसीहा बताते हुए एक-दूसरे को गालियाँ देती हैं। समस्या कोई एक राजनीतिक पार्टी नहीं है। समस्या पूरी की पूरी राजनीति है, जिसमें यह बोध ही नहीं है कि दुनिया कहां की कहां चली गई और हम अब भी हर मामले में पाकिस्तान से अपनी तुलना कर खुश होते रहते हैं। हर वक़्त आंकड़ों की बाज़ीगरी करके अपना दिन बहलाते रहते हैं—"हम इतने ट्रिलियन डॉलर की इकॉनॉमी हो गए", "हमने उसकी बोलती बंद कर दी।"
अरे भाई, हमारी हवा सांस लेने लायक नहीं है। दूध, पनीर, फल-सब्ज़ी—हर चीज़ मिलावटी है। ज़रा-सी बारिश में पूरा सिस्टम जाम हो जाता है। सरकारी स्कूल इस लायक नहीं कि कोई अपने बच्चे को वहां पढ़ा सके। सरकारी अस्पताल इस योग्य नहीं कि कोई अपना वहां इलाज करा सके। पुलिस से लेकर अदालतों तक सब आकंठ भ्रष्ट हैं।
चीन से लेकर अमेरिका तक, सारी दुनिया हम पर चढ़ने के लिए तैयार बैठी है और हम एक-दूसरे को इसलिए पीट रहे हैं क्योंकि उसे मराठी नहीं आती। पीटे कोई, पिटे कोई—लेकिन ज़लील पूरा देश हो रहा है। और ज़लालत की कोई भाषा नहीं होती—वह बस हर जगह दिखती है। और उसे पढ़ने के लिए किसी subtitle की ज़रूरत नहीं होती। ये इस देश के माथे पर लिखा है।
-Neeraj Badhwar
वृद्धाश्रम डोनेशन वाले एड आते हैं ना जिनमें बूढ़े लोग होते हैं। जो एड्स देखकर लोग सोचते हैं कि कैसे घटिया-नीच बच्चे होते हैं जो बूढ़ों को वृद्धाश्रम छोड़ जाते हैं।
यह वीडियो बताती है कि हमेशा बच्चे नीच नहीं होते, कुछ बुड्ढे लात खाना ही डिज़र्व करते हैं।
British deserve this, Invading other countries and imposing their culture on them has been part of British history, they are now tasting their own medicine
भाई बहन ,भाभी ,भतीजा भतीजी ,ममिया ससुर फूफिया चाचा, बहनोई ,साढ़ू सबके नाम ज़मीन ख़रीदेगा तेरा मोहन🤡
मुख्यमंत्री हो तो ऐसा हो वरना ज़िंदा तो….खैर हटाओ!!
@mk_srivastava20@khurpenchh Fix tab hoga. Jab kuch LOW IQ log ek cheez ke time usi cheez par rahe. Na ki sabko ek sath sahi karne ki soche. Unko kaise sikhaoge ?
@mk_srivastava20@khurpenchh Problem with an Indian ki hame har cheez me Comparision karna hota hai. Ham compromise bhut krte hai. Fix krne ka sochte bhi nhi..