आजकल शिक्षक संघों की संख्या देखकर कभी-कभी भ्रम हो जाता है कि हम शिक्षा व्यवस्था में हैं या संगठन व्यवस्था में।
कुछ संघों का हाल यह है कि वर्षों तक तृतीय श्रेणी शिक्षकों के हितों, पदोन्नति, सेवा शर्तों और वास्तविक समस्याओं पर ठोस पहल दिखाई नहीं देती, लेकिन पदाधिकारियों की सूची अवश्य लंबी होती जाती है।
यदि किसी संगठन का केंद्र केवल कुछ चुनिंदा पद या वर्ग हैं, तो उसे उसी रूप में पहचान देना अधिक ईमानदार होगा। जब संगठन सभी शिक्षकों का नाम लेता है, तो उसकी चिंता और संघर्ष भी सभी शिक्षकों के लिए समान रूप से दिखने चाहिए।
संगठन का मूल्य उसके लेटरहेड, पदनाम या सोशल मीडिया पोस्ट से नहीं, बल्कि उन शिक्षकों के चेहरे की मुस्कान से तय होता है जिनके अधिकारों के लिए वह खड़ा होता है।
एक विनम्र प्रश्न—
हम शिक्षक हितों को मजबूत कर रहे हैं या केवल शिक्षक संघों की संख्या?
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