ज़िंदगी के कुछ किस्से इंसान को इतना गहरा दर्द दे जाते हैं, जो इंसान को सिर्फ दुखी नहीं करते, बल्कि उसे अंदर से खाली कर देते हैं। फिर न शिकायत करने का मन करता है, न किसी से कुछ कहने का… बस चुपचाप जीने की आदत हो जाती है।
ऐसे ही दर्द और ज़िंदगी की हकीकत नाना पाटेकर जी की कही एक बात बहुत गहराई से समझाती है—
“हमको मालूम है कि जाना है… हमको 12 मन लकड़ी लगने वाली है। उतनी ही लगेगी। यही मेरी फाइनल प्रॉपर्टी है। उसी के साथ चला जाऊँगा। मैंने अपनी लकड़ी जमा करके रखी है, वो भी सूखी है। उसी में जलाना… गीली लकड़ी मत इस्तेमाल करना, नहीं तो धुआँ आएगा। दोस्त लोग और आसपास के लोग आएँगे, उनकी आँखों में पानी आएगा… और मरते वक्त गलतफहमी होगी कि मेरे लिए रो रहे हैं। कम से कम मरते वक्त तो गलतफहमी नहीं होनी चाहिए।”
शायद ज़िंदगी भी कुछ ऐसी ही है—इंसान पूरी उम्र बहुत कुछ जोड़ता रहता है, रिश्ते, दौलत, पहचान और उम्मीदें… लेकिन अंत में उसके साथ कुछ नहीं जाता।
मन थमा तो! मोह बिखर गया....!!
आपने मोमबत्ती का जलना देखा,
मैंने उसका पिघलना देखा, फ़र्क़ सिर्फ इतना है..
आपने जो दिख रहा है़, वो देखा
मैंने जो हो रहा है, वो देखा.......!!
आपका दिन शुभ एवम मंगलमय हो.......!!