इस वक्त की बड़ी अंतरराष्ट्रीय खबर यूरोप से आ रही है।
यूरोप अब भविष्य में अमेरिकी टेक कंपनियों पर अपनी निर्भरता कम करने की तैयारी कर रहा है। यूरोपियन यूनियन के कई सांसद और नीति-निर्माता अमेरिकी बिग टेक कंपनियों के विकल्प तैयार करने पर ज़ोर दे रहे हैं।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, यूरोपीय कानून निर्माता अब गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, ओपनएआई और अन्य अमेरिकी टेक दिग्गजों के मुकाबले यूरोप में ही विकसित की गई टेक्नोलॉजी और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को बढ़ावा देना चाहते हैं।
इसका मकसद है डिजिटल संप्रभुता, डेटा सुरक्षा और यूरोप की अपनी तकनीकी क्षमता को मज़बूत करना। यूरोप का मानना है कि आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस, क्लाउड कंप्यूटिंग और सर्च टेक्नोलॉजी जैसे अहम क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता बेहद ज़रूरी है।
हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिकी टेक कंपनियों की जगह लेना आसान नहीं होगा, क्योंकि ये कंपनियां तकनीक, निवेश और वैश्विक पहुंच के मामले में काफी आगे हैं।
लेकिन यूरोप इस दिशा में लंबी रणनीति पर काम कर रहा है, जिसमें स्टार्टअप्स को समर्थन, सरकारी निवेश और सख़्त टेक रेगुलेशन शामिल हैं।
आने वाले समय में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि क्या यूरोप अमेरिकी टेक कंपनियों को टक्कर देने में कामयाब हो पाता है या नहीं।
अंतरराष्ट्रीय राजनीति, टेक्नोलॉजी और अर्थव्यवस्था से जुड़ी हर बड़ी खबर के लिए हमारे साथ बने रहिए।”
इस वक्त की एक बड़ी और अहम खबर भारत के टेक सेक्टर से आ रही है।
केंद्रीय मंत्री के बयान के मुताबिक, भारत अगले 12 से 18 महीनों के भीतर अपने खुद के स्मार्टफोन ब्रांड्स को वैश्विक बाज़ार में पेश करने की तैयारी कर रहा है।
सरकार का कहना है कि ये स्मार्टफोन पूरी तरह ‘मेक इन इंडिया’ विज़न के तहत विकसित किए जाएंगे, जिनका उद्देश्य भारत को केवल मैन्युफैक्चरिंग हब ही नहीं, बल्कि एक ग्लोबल टेक ब्रांड निर्माता के रूप में स्थापित करना है।
इस पहल के तहत डिज़ाइन, सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर के अहम हिस्सों में घरेलू कंपनियों और भारतीय टैलेंट की भागीदारी बढ़ाई जाएगी। साथ ही, इन स्मार्टफोन्स को अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता और सुरक्षा मानकों के अनुसार तैयार किया जाएगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम भारत की तकनीकी आत्मनिर्भरता को मजबूत करेगा और वैश्विक स्मार्टफोन बाजार में चीन, अमेरिका और दक्षिण कोरिया जैसे देशों को कड़ी प्रतिस्पर्धा देगा।
सरकार को उम्मीद है कि इस पहल से रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे, निर्यात बढ़ेगा और भारत की पहचान एक मजबूत टेक्नोलॉजी पावर के रूप में और सशक्त होगी।
आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि भारतीय स्मार्टफोन ब्रांड्स वैश्विक बाजार में कितनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कर पाते हैं।
टेक्नोलॉजी और देश-दुनिया की हर बड़ी खबर के लिए हमारे साथ बने रहिए।”
इस वक्त की एक बड़ी और अहम खबर भारत के टेक सेक्टर से आ रही है।
केंद्रीय मंत्री के बयान के मुताबिक, भारत अगले 12 से 18 महीनों के भीतर अपने खुद के स्मार्टफोन ब्रांड्स को वैश्विक बाज़ार में पेश करने की तैयारी कर रहा है।
सरकार का कहना है कि ये स्मार्टफोन पूरी तरह ‘मेक इन इंडिया’ विज़न के तहत विकसित किए जाएंगे, जिनका उद्देश्य भारत को केवल मैन्युफैक्चरिंग हब ही नहीं, बल्कि एक ग्लोबल टेक ब्रांड निर्माता के रूप में स्थापित करना है।
इस पहल के तहत डिज़ाइन, सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर के अहम हिस्सों में घरेलू कंपनियों और भारतीय टैलेंट की भागीदारी बढ़ाई जाएगी। साथ ही, इन स्मार्टफोन्स को अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता और सुरक्षा मानकों के अनुसार तैयार किया जाएगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम भारत की तकनीकी आत्मनिर्भरता को मजबूत करेगा और वैश्विक स्मार्टफोन बाजार में चीन, अमेरिका और दक्षिण कोरिया जैसे देशों को कड़ी प्रतिस्पर्धा देगा।
सरकार को उम्मीद है कि इस पहल से रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे, निर्यात बढ़ेगा और भारत की पहचान एक मजबूत टेक्नोलॉजी पावर के रूप में और सशक्त होगी।
आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि भारतीय स्मार्टफोन ब्रांड्स वैश्विक बाजार में कितनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कर पाते हैं।
टेक्नोलॉजी और देश-दुनिया की हर बड़ी खबर के लिए हमारे साथ बने रहिए।”
इस वक्त की बड़ी अंतरराष्ट्रीय खबर यूरोप से आ रही है।
यूरोप अब भविष्य में अमेरिकी टेक कंपनियों पर अपनी निर्भरता कम करने की तैयारी कर रहा है। यूरोपियन यूनियन के कई सांसद और नीति-निर्माता अमेरिकी बिग टेक कंपनियों के विकल्प तैयार करने पर ज़ोर दे रहे हैं।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, यूरोपीय कानून निर्माता अब गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, ओपनएआई और अन्य अमेरिकी टेक दिग्गजों के मुकाबले यूरोप में ही विकसित की गई टेक्नोलॉजी और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को बढ़ावा देना चाहते हैं।
इसका मकसद है डिजिटल संप्रभुता, डेटा सुरक्षा और यूरोप की अपनी तकनीकी क्षमता को मज़बूत करना। यूरोप का मानना है कि आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस, क्लाउड कंप्यूटिंग और सर्च टेक्नोलॉजी जैसे अहम क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता बेहद ज़रूरी है।
हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिकी टेक कंपनियों की जगह लेना आसान नहीं होगा, क्योंकि ये कंपनियां तकनीक, निवेश और वैश्विक पहुंच के मामले में काफी आगे हैं।
लेकिन यूरोप इस दिशा में लंबी रणनीति पर काम कर रहा है, जिसमें स्टार्टअप्स को समर्थन, सरकारी निवेश और सख़्त टेक रेगुलेशन शामिल हैं।
आने वाले समय में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि क्या यूरोप अमेरिकी टेक कंपनियों को टक्कर देने में कामयाब हो पाता है या नहीं।
अंतरराष्ट्रीय राजनीति, टेक्नोलॉजी और अर्थव्यवस्था से जुड़ी हर बड़ी खबर के लिए हमारे साथ बने रहिए।”
🇮🇳🇪🇺 भारत और यूरोपियन यूनियन के बीच व्यापार को लेकर एक अहम फैसला सामने आया है।
भारत सरकार अब यूरोपियन यूनियन से आने वाली प्रीमियम और लग्ज़री कारों पर आयात शुल्क यानी इंपोर्ट ड्यूटी में बड़ी कटौती करने की योजना बना रही है।
फिलहाल इन महंगी कारों पर 110 प्रतिशत तक का भारी टैक्स लगाया जाता है, लेकिन प्रस्तावित योजना के तहत इसे घटाकर करीब 40 प्रतिशत तक लाया जा सकता है।
सरकार का मानना है कि इस फैसले से भारत और यूरोपियन यूनियन के बीच फ्री ट्रेड एग्रीमेंट को गति मिलेगी, निवेश बढ़ेगा और ऑटोमोबाइल सेक्टर में नई संभावनाएं खुलेंगी।
हालांकि, इस कदम को लेकर घरेलू ऑटोमोबाइल कंपनियों की चिंताएं भी सामने आ सकती हैं, क्योंकि सस्ती इंपोर्टेड लग्ज़री कारों से प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी।
अब देखना दिलचस्प होगा कि यह प्रस्ताव भारतीय उद्योग, उपभोक्ताओं और भारत-EU व्यापार संबंधों को किस दिशा में ले जाता है।
🇮🇳🇪🇺 भारत और यूरोपियन यूनियन के बीच व्यापार को लेकर एक अहम फैसला सामने आया है।
भारत सरकार अब यूरोपियन यूनियन से आने वाली प्रीमियम और लग्ज़री कारों पर आयात शुल्क यानी इंपोर्ट ड्यूटी में बड़ी कटौती करने की योजना बना रही है।
फिलहाल इन महंगी कारों पर 110 प्रतिशत तक का भारी टैक्स लगाया जाता है, लेकिन प्रस्तावित योजना के तहत इसे घटाकर करीब 40 प्रतिशत तक लाया जा सकता है।
सरकार का मानना है कि इस फैसले से भारत और यूरोपियन यूनियन के बीच फ्री ट्रेड एग्रीमेंट को गति मिलेगी, निवेश बढ़ेगा और ऑटोमोबाइल सेक्टर में नई संभावनाएं खुलेंगी।
हालांकि, इस कदम को लेकर घरेलू ऑटोमोबाइल कंपनियों की चिंताएं भी सामने आ सकती हैं, क्योंकि सस्ती इंपोर्टेड लग्ज़री कारों से प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी।
अब देखना दिलचस्प होगा कि यह प्रस्ताव भारतीय उद्योग, उपभोक्ताओं और भारत-EU व्यापार संबंधों को किस दिशा में ले जाता है।
Which is the world's richest cricket board?
These are the richest cricket boards in the world & (BCB) is positioned 5th.
1. Board of Control for Cricket in India 2. Australia (CA)
3. England and Wales Cricket Board (ECB)
4.Pakistan Cricket Board (PCB)
5.Bangladesh Cricket Board (BCB)
Bangladesh Won't Play T20 World Cup In India After ICC Rejects Request To Shift Matches
The Bangladesh cricket team has toured India for bilateral series in
1998,
2016–17,
2019–20,
2024–25.
🇮🇳⚽ Sunil Chhetri | Golden Phase (2007–2013)
From his debut years to peak dominance:
🔥 2007–2013 = Rise of a legend
⭐ 2011 standout year – 13 international goals
💪 Carried Indian football with consistency & leadership
This period built the foundation of a national icon. 🙌
France has announced its support for
suspending the European Union’s trade deal with the United States.
A strong signal that transatlantic trade ties are under strain as economic and political differences widen.
UAE President Sheikh Mohamed bin Zayed Al Nahyan has accepted the US invitation to join the proposed Board of Peace.
A move that places the UAE at the center of emerging diplomatic efforts on global conflict resolution.
Belgian Prime Minister Bart De Wever:
People want to join the European Union. Nobody wants to join China. No neighbor of the United States says, “We want to join the United States.” Nobody wants to.
They want to join the European Union just because we have respect. We have the rule of law. We do speak softly.
Belgian Prime Minister Bart De Wever:
“Russia is not a threat if the West is united. But we are not united.
Russia’s economy is very weak. Its military threat becomes real only when we are divided.”
A blunt warning: division, not Moscow, is the real risk.
French President Emmanuel Macron sent a private note to President Trump - Trump posted it publicly on his social media.
Diplomacy meets Trump-style politics.
French President Emmanuel Macron has called for increased Chinese investment in Europe, signaling an effort to rebalance economic ties amid shifts in global trade.