जनसत्ता के कोलकाता और चंडीगढ़ संस्करण के संपादक रहे और बेबाकी से लिखने वाले सुविख्यात पत्रकार शंभुनाथ शुक्ल बड़ा ही सुंदर और चुटीला लिखते हैं। आज उन्होंने फेसबुक पर पंडित जवाहरलाल नेहरू का एक संस्मरण लिखा है, जो बहुत ही पठनीय है। पढ़िए :
नेहरू को मैंने नहीं देखा!
नेहरू जी जिस दिन मरे, उसी दिन मेरा रिजल्ट आया था। मैं पाँचवीं कक्षा के बोर्ड इम्तिहान में पास हो गया था और छठे दरजे के लिए कानपुर में तब के एक अव्वल स्कूल नगर महापालिका गांधी स्मारक इंटर कालेज, गोविंद नगर में मुझे प्रवेश मिल गया था। मैं उसके एडमिशन टेस्ट में भी पास हो गया था और कालेज के सूचना पट्ट पर 40 छात्रों की जो सूची लगी थी उस पर मेरा भी नाम था। यह बताने के लिए मैं घर की तरफ भागा। लेकिन घर आकर देखा कि पिताजी खुद घर पर हैं और उदास-से हैं। मैंने उनकी उदासी को अनदेखा करते हुए कहा पिताजी मैं पास हो गया। मगर पिताजी कुछ नहीं बोले। मैंने फिर कहा लिस्ट में मेरा नाम है, पर पिताजी फिर चुप। तब मैंने पूछा क्या हुआ? पिताजी ने बताया कि चाचा नेहरू नहीं रहे। अम्माँ सुबक रही थीं और दादी भी। आसपास के सारे लोग रो रहे थे। वहां पंजाबियों की बस्ती थी मगर वे भी उदास थे। हालांकि पंजाबी नेहरू जी को पसंद नहीं करते थे।
बाहर आकर देखा कि नीलम की झाई से लेकर बाबा बस्तीराम तक सब पूछ रहे थे कि रेडियो किस के पास है। पर पूरे छह ब्लाक में किसी के पास रेडियो नहीं। तब हम सब बी ब्लाक स्थित एक शुक्ला जी के घर को भागे। शुक्ला जी वहां एक इंटर कालेज में फिजिक्स के लेक्चरर थे और उनके घर पर रेडियो से लगातार सूचनाएं प्रसारित हो रही थीं। उनके घर के बाहर मेला लगा था। ठठ के ठठ लोग जुटे थे और रो रहे थे। हम वहां शाम तक रहे और सबके सब चुपचाप आंसू बहाते वहां बैठे रहे। सूचना आई कि तमिलनाडु में एक औरत ने आत्मदाह कर लिया।
कुछ लोगों को भरोसा ही नहीं हो रहा था कि अब देश का क्या होगा। तब किसी ने नहीं कहा कि उनकी बेटी तो है। सब यह सोच रहे थे कि देश फिर गुलाम हो जाएगा क्योंकि एक ऐसा आदमी चला गया जिसका कोई जोड़ीदार नहीं था। देर रात हम लौटे। मां तब तक जाग रही थीं।
पिताजी को छोड़कर किसी ने नेहरू जी को देखा नहीं था लेकिन नेहरू का नाम ही सबको सिहरा देता था। मरे आदमी को जीवन दे सकता था। नेहरू जी मर गए, नेहरू जी मर सकते थे, ऐसा सोचना भी असंभव लग रहा था। इसके बाद नेहरू जी अंत्येष्टि और उनकी अस्थियों का संगम में प्रवाह देखने हेतु लोग इलाहाबाद गए। पिताजी मुझे तब पहली बार संगम ले गए थे। वहां की भीड़ देखकर लगा कि महाकुंभ शायद ऐसा ही होता होगा। आज नेहरू जी को दिवंगत हुए 62 साल हो गए।
केंद्र सरकार नेहरू जी की स्मृति में एक सरकारी स्तर पर आयोजन करे। भले वे कांग्रेस पार्टी के रहे हों मगर नेहरू जी वह प्रधानमंत्री थे, जिन्होंने कभी भी जनसंघ (जो बाद में भारतीय जनता पार्टी बनी) को नेस्तनाबूद करने की तमन्ना नहीं की। उलटे 1957 में जनसंघ के युवा सांसद अटलबिहारी वाजपेयी ‘भारत की विदेश नीति’ पर अपना ओजस्वी भाषण देकर जब अपनी सीट पर बैठे तो प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने उनकी वक्तृता की प्रशंसा की। अभिभूत वाजपेयी ने उनके पैर छुये, तो उन्होंने भविष्यवाणी की थी कि यह युवा सांसद एक दिन देश का प्रधानमंत्री बनेगा। उन ब्राह्मण पंडित नेहरू की भविष्यवाणी सच निकली। अटल जी ने भी नेहरू की बेटी को देवी दुर्गा बताया था। उस विभूति को याद करना चाहिए जो आज के भारत का भाग्यविधाता था।
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जिस सीकर के शिक्षक ने व्हिसलब्लोअर बनकर साहस और नैतिक कर्तव्य का परिचय दिया, उसे तो सीकर से जोड़ने की ज़रूरत नहीं समझी गई, लेकिन सीकर को पेपर लीक का एपिसेंटर बताने में कोई कमी नहीं रखी गई। अब जब सीबीआई जाँच में पी.वी. कुलकर्णी के उन खुलासों का ज़िक्र हो रहा है जिनके अनुसार 2019 से ही NEET पेपर्स तक पहुँच उपलब्ध थी, तो फिर पुणे–लातूर को एपिसेंटर क्यों नहीं कहा जा रहा?
अपराध की न तो कोई भौगोलिक पहचान होती है, न किसी समुदाय या शहर से उसका चरित्र निर्धारित होता है। अपराध हमेशा व्यक्तिगत आचरण का प्रश्न होता है। इसे किसी एक शहर या समुदाय से जोड़ना न केवल संकुचित दृष्टि है, बल्कि भ्रामक नैरेटिव गढ़ने जैसा है।और नैरेटिव तो यह भी हो सकता है कि किसी नेशनल कोचिंग के इशारे पर लोकल कोचिंग संस्थानों को बदनाम करने के लिए ऐसी कहानी रची गई हो।
एयरपोर्ट पर ₹20 वाली पानी की बोतल ₹100 में, ₹350 का समोसा और ₹250 की चाय मिलती है।
एक आम आदमी एयरपोर्ट पर पानी पीकर पेट भरने को मजबूर है क्योंकि एयरपोर्ट का खाना इतना महँगा है!
दिल्ली विश्वविद्यालय के मेरे अज़ीज़ ज़ाकिर हुसैन दिल्ली कॉलेज के हिंदी विभाग में जिन कुछ बेहद ख़ास लोगों ने हम अनगढ़ को गढ़ा, उनमें डॉ विजेंद्र सिंह चौहान का नाम सबसे आगे है. विजेंद्र सर उस सेलेक्शन कमेटी में शामिल थे, जो मुझे निकालने का निर्णय ऊपर से लेकर आई थी. विजेंद्र ने पूरी कोशिश की कि अन्याय न हो. मगर अन्यायी भारी पड़े. आज विजेंद्र IAS का इंटरव्यू लेने के साथ देश के जाने माने चेहरे हैं. पिछले लगभग चौदह साल जिनके साथ काम किया, मेरे लिए उनके द्वारा ये सुनना किसी तमग़े से कम नहीं. मगर डीयू में जिस क़दर सो कॉल्ड ‘मेरिट’ की हत्या करते हुए हम जैसों की रीढ़ होने की सज़ा मिली. मगर हमने लड़ने की ठान ली. अब ये देखकर हिम्मत आसमाँ पर है.
परिंदे से उसका शज़र नहीं छीनना चाहिए था.
ऑफ़िशियल रिज़ल्ट का इंतज़ार कर रहा हूँ. उसके बाद बोलूँगा. चौदह साल जिस कॉलेज में पढ़ाया, चौदह मिनट के इंटरव्यू के बाद आपके पद पर किसी और को परमानेंट कर दिया जाए. तो क्या ये सवाल करना नहीं बनता है कि आख़िर क्यों? वज़ह क्या है? ये सवाल तो होगा और जवाब भी देना पड़ेगा.
बस आधिकारिक सूचना का इंतज़ार कर रहा हूँ. चाहने वालों के फ़ोन मैसेज पोस्ट के जवाब में अभी ये पोस्ट लिखना पड़ा कि सूचना सही है. बस रिज़ल्ट सार्वजनिक होने दीजिए. एक एक बात लिखूँगा, सारे खेल तमाशे पर बोलूँगा और सवाल करूँगा. जवाब तो देना पड़ेगा. तैयारी कर लो.
बर्रे के छत्ते में हाथ नहीं डालना था.
#WATCH | Jharkhand: Vice President Jagdeep Dhankhar attended the 43rd Convocation of the Indian Institute of Technology-IIT (Indian School of Mines) in Dhanbad, earlier today.