इमरान और जिन्ना जिंदगी के पूर्वार्ध में अपेक्षाकृत अधिक उदार और प्रगतिशील सोच के थे. लेकिन उत्तरार्ध में दोनों का झुकाव संकीर्णता और कट्टरपंथ की तरफ बढ़ता गया | दीपांकर शिवमूर्ति
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जब भारत-बांग्लादेश का क्रिकेट मैच होता है तो दोनों देशों के राष्ट्रगान “जन गण मन” और “आमार सोनार बांग्ला” के अलावा पार्श्व में भी “रबीन्द्रो संगीत” ही बजता है. इन शब्दों, ध्वनियों यहाँ तक कि दृश्यों को जोड़ने वाला एक साझा पुल है- टैगोर. किसी एक शख़्सियत का ऐसा वृहत्तर प्रभाव पेशानी पे बहुत ज़ोर डालने पर भी शायद ही याद आए.
थोड़ी प्रतिभा हो और साधने की इच्छाशक्ति तो किसी भी एक-दो क्षेत्र में उल्लेखनीय कर लेना मुश्किल नहीं होता. लेकिन रचनात्मकता का ऐसा वैविध्य...प्रतिभा का ऐसा बहुमुख...अति दुर्लभ है! मुझे हिंदुस्तानी इतिहास में तो एक ही शख़्स याद आता है- अमीर ख़ुसरो (आपको कोई और भी सूझ रहा हो तो बताएं).
ज़रा गुरूदेव की रेंज देखिये: उनकी कविता को तो छोड़ ही देते हैं. कहानी और उपन्यास को लें. तक़रीबन उसी समय लिखे जा रहे शायद दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण गद्य रूसी साहित्य के साथ तराजू के दूसरे पलड़े पे रखा जा सकता है. उनके नाटक, आलोचना हद तक कि नोबेल पाने के बाद दुनिया भर में दिए गए भाषणों का संग्रह जो “साधना” और “मेडिटेशन” इत्यादि नाम से प्रकाशित हुए. उनमें भी दर्शन, सौंदर्यबोध और मनोविज्ञान की नयी दृष्टि है जो आज भी प्रासंगिक है. मेरे हिसाब से कालातीत होना किसी भी रचनात्मकता के मूल्यांकन का आधारभूत पैमाना होना चाहिए.
जब मैं नया-नया विश्वविद्यालय में आया था तो हमारे प्रोफेसर अरविंद कृष्ण मेहरोत्रा (जिनकी टैगोर जैसी ही दाढ़ी है) का कबीर के “बीजक” का अनुवाद साया हुआ था. शायद अशोक वाजपेयी ने कहीं कहा था कि अरविंद का अनुवाद टैगोर से भी बेहतर है. मैंने टैगोर के कबीर के अनुवाद पढे थे. यह मुझे साहित्यकारों की दोस्ती निभाने और एक दूसरे की ख़ुशामद करने वाला मामला लगा. अब लगता है, साहित्य और सौन्दर्य की नज़र से तो नहीं, लेकिन तकनीकी और सटीकता के लिहाज़ से ये तुलना मुमकिन हो भी सकती है. क्योंकि मुझे नहीं पता टैगोर हिंदी की उपभाषाओं में कितने निष्णात थे (कबीर की भाषा तो पंचमेल खिचड़ी है) और मेहरोत्रा के पास टैगोर और दूसरे लोगों के किए गए काम की पश्चदृष्टि (Hindsight) भी थी. टैगोर ने ही पश्चिमी दुनिया का परिचय “बाउल” से करवाया और कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो समेत कई ऐतिहासिक दस्तावेज़ों का बांग्ला में भी अनुवाद किया.
अपनी दोस्त विक्टोरिया की प्रेरणा (अब ये फ़साना मिथक का दर्ज़ा पा चुका है और इस पर एक शॉर्ट फिल्म “थिंकिंग ऑफ हिम” भी बन चुकी है) और विश्व भारती के लिए फंड जुटाने की ग़रज़ से जब टैगोर ने अपने चित्रों की प्रदर्शनी लगाई तो उसे “रेखाओं में कवित्त” कहा गया. याद रखिए, बंगाल स्कूल ऑफ आर्ट के संस्थापक और नंदलाल बोस के गुरू अबनींद्रनाथ रबीन्द्रनाथ के भतीजे ही थे.
कर्नाटिक संगीत से प्रभावित होकर टैगोर ने “रबीन्द्रो संगीत” के ज़रिये नए तालों से तआर्रुफ़ करवाया क्योंकि पारंपरिक तालों में उनके गीत लयबद्ध नहीं हो पा रहे थे. बतौर शिक्षाशास्त्री “विश्व भारती” उनकी अंतर्दृष्टि का जीवंत दस्तावेज़ है. मेरे फेसबुक कवर पे शंभू शाहा की ली हुई एक तस्वीर है जिसमें एक छात्रा पेड़ की शाख पर बैठी अध्ययनरत है.
टैगोर के राजनैतिक विचारों ने भी भारतीय समाज और स्वतन्त्रता आंदोलन को गहरे प्रभावित किया. वो गांधी को महात्मा कहते और हिन्दुस्तानी आवाम को सूत्रबद्ध करने की क्षमता की हमेशा तारीफ़ें करते. फिर भी उनकी आर्थिक नीतियों, स्वराज, राष्ट्रवाद और असहयोग आंदोलन की आलोचना करने से परहेज भी नहीं करते थे. मिसाल के लिए, जब गांधी ने अंग्रेजी में अभिव्यक्ति के लिए तिलक और राममोहन रॉय की आलोचना की तो टैगोर ने कहा “मुझे नहीं लगता किसी भी नस्ल,किसी भी संस्कृति को ख़ारिज़ करना भारतीयता की आत्मा में है”
जिन्ना और अंबेडकर के बाद टैगोर गांधी के तीसरे सबसे मूल्यवान और महत्वपूर्ण आलोचक थे. मेरे विचार में टैगोर की आलोचना ने गांधी के शिष्य नेहरू के लिए पृष्ठभूमि तैयार करने में मदद की होगी कि अगर गांधी के विचार तर्क या प्रासंगिकता की कसौटी पर खरे नहीं उतरते तो उनसे सम्यक दूरी बनाई जा सके.
विजेता के लिए उदार होना और पराजित का संकुचित हो जाना स्वाभाविक लगता है. टैगोर हमेशा लेखन और एक्टिविज़्म को अलग रखने के हक़ में थे.
कहा जाता है इक़बाल ने टैगोर के मिलने की गुज़ारिश ठुकरा दी थी. जिन्ना और गांधी की डाह का एक और समनांतर इक़बाल की टैगोर से प्रतिद्वंदता का भाव भी हो सकता है. मेरे हाथ में तथ्य और दस्तावेज़ तो नहीं मगर जीवन वृत्त और चेतना से लगता है, ऐसा होना ही चाहिए.
अंत में टैगोर का जीवन के प्रति दृष्टि:
मरिते चाही ना आमि सुंदर भुवने
मानुषेर आमि बाचिबारे छाई.
(मैं इस सुंदर संसार में मरना नहीं चाहता. मैं मनुष्यों के बीच में जीना चाहता हूँ)
#Tagore
अगर ये सवाल मज़े में पूछा जाए कि नॉर्थ और साउथ ब्लॉक के पावर कॉरिडोर में कौन चेन स्मोकर है तो शायद आपको एकदम से जवाब ना सूझे!
अमरजीत सिंह दुलत मेरे दूसरे सबसे पसंदीदा भारतीय जासूस हैं. कहने की ज़रूरत नहीं कि एम के नारायणन मेरे सर्वकालिक पसंदीदा. काव को मैं जान बूझ कर छोड़ दे रहा क्योंकि उनका उनका दर्ज़ा इतना ऊंचा है कि वो कोटियों और श्रेणियों से परे हैं.
जहां तक अजीत डोभाल की बात है निस्संदेह वो बेहतरीन जासूस हैं. बतौर राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार भारत के आंतरिक मामलों (खासतौर से कश्मीर और उत्तर-पूर्व) और पाकिस्तान को उनसे बेहतर कोई नहीं संभाल सकता. मगर उसके परे अंतरराष्ट्रीय मामलों में उनकी स्पष्ट सीमाएं भी हैं. मिसाल के लिए अमरीकन सेनाओं के अफ़गानिस्तान से निकलने के पहले के हालात पर उनके स्पीच का एक वीडियो है. कोई रोज अख़बार पढ़ने वाला आदमी भी समझ सकता है कि उनकी वो स्पीच कितनी बचकानी है!
पाकिस्तान में अंदर कवर एजेंट के तौर पर रहा, ये सब बातें फ़साना थी. IB वालों को डिप्लोमैटिक पोजिशन पे भेजा जाता है बाक़ायदा डिप्लोमैटिक इम्यूनिटी के साथ. दुनिया भर के इंटेलीजेंस ऑफिसर एंबेसीज में काम करते हैं. पाकिस्तान में भी अजीत एक राजनयिक की हैसियत से ही रहे.
ख़ास तौर से अजीत इस मामले में ख़ुशक़िस्मत हैं कि 82 साल का हो जाने के बाद भी वो अपने कार्यकाल के 13वें साल में हैं. इतना लम्बा काम करने का अवसर बृजेश मिश्रा को भी नहीं मिला जिसका वो बाद के सालों में अफ़सोस जताते भी रहे.
अगर भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों की रैंक बनानी हो तो मैं डोभाल को जे एन दीक्षित, एम के नारायणन, बृजेश मिश्रा यहां तक कि शिवशंकर मेनन के बाद रखूंगा. इन चारों ने सुरक्षा, कूटनीति और वैश्विक शक्ति-संतुलन, तीनों को एक साथ साधने की क्षमता का कहीं अधिक व्यापक परिचय दिया.
#SpyStories
#AjitDoval
Bankipur result is very significant; it is as embarrassing for the ruling party as losing Ayodhya in the last election
@yadavakhilesh#Bankipur@PrashantKishor
@khuchrep जिनको पीके के जीतने में बीजेपी का षडयंत्र लगता है:
कौन सी सत्ताधीश पार्टी राजद और तेजस्वी जैसे काहिल और सुस्त विपक्ष को जन सुराज और प्रशांत से बदलना चाहेगी?
#prashantkishor
जिनको पीके के जीतने में बीजेपी का षडयंत्र लगता है:
कौन सी सत्ताधीश पार्टी राजद और तेजस्वी जैसे काहिल और सुस्त विपक्ष को जन सुराज और प्रशांत से बदलना चाहेगी?
#prashantkishor
प्रशांत किशोर का चुनाव जीतना कोई जनमत नहीं है,
राजनीत के जानकार सिर्फ इसे ये समझें कि ये RJD और जेडीयू के खात्मे का प्लान है।
सत्ता पक्ष अब इन दोनों से मुक्ति चाहता है, इसलिए एक नए पार्टी का उदगम हुआ है।
RJD के विधानसभा चुनाव में हारने का बहुत बड़ा कारण प्रशांत किशोर ही थे, क्योंकि इन्हें जीतने की नहीं बल्कि हारने की रकम मिली थी।
बृजभूषण शरण सिंह: क्या उन्हें अदालत से पहले ही सज़ा दे दी गई थी?
तो अब बृजभूषण शरण सिंह ट्रायल कोर्ट से बरी हो चुके हैं। शिकायतकर्ता इस फैसले को ऊपरी अदालत में चुनौती देंगे, इसलिए कानूनी प्रक्रिया अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। लेकिन इस फैसले ने एक बार फिर उस बहस को ज़िंदा कर दिया है कि मीडिया ट्रायल, कथित पीड़ित, कथित आरोपी और न्यायिक प्रक्रिया—इन सबकी सीमाएँ आखिर हैं कहाँ?
पहलवानों के आंदोलन के दौरान देश का शायद ही कोई ऐसा मीडिया मंच रहा हो, जहाँ बृजभूषण शरण सिंह को लगभग दोषी घोषित न कर दिया गया हो। स्टूडियो में फैसले सुनाए जा रहे थे, सोशल मीडिया पर सजाएँ तय हो रही थीं और एक ऐसा माहौल बना दिया गया था मानो अदालत की भूमिका केवल औपचारिकता भर रह गई हो। जबकि किसी भी लोकतंत्र में आरोप और दोषसिद्धि एक ही चीज़ नहीं होते।
इस पूरे प्रकरण में मुझे सबसे दिलचस्प राजनीतिक रूख़ अखिलेश यादव का लगा। लगभग पूरा विपक्ष इस मुद्दे पर खुलकर उतर आया, लेकिन अखिलेश ने एक तरह का संयम बरता। तब उन पर आरोप लगे कि उन्होंने एक 'बाहुबली' से समझौता कर लिया है, नैतिकता छोड़ दी है। विपक्ष के किसी नेता में ये सेनिटी' भी उल्लेखनीय है.
आज अदालत के फ़ैसले के बाद कम-से-कम इतना तो पूछा ही जा सकता है कि क्या अदालत से पहले किसी को अपराधी घोषित कर देना ही राजनीति और नैतिकता की कसौटी होनी चाहिए थी? लोकतंत्र में न्यायपालिका का इंतज़ार करना भी तो एक लोकतांत्रिक मूल्य है।
बृजभूषण शरण सिंह की राजनीति अपने आप में एक अलग कहानी है। 1991 से लगातार लोकसभा की राजनीति में बने रहना कोई साधारण बात नहीं है। तीन अलग-अलग लोकसभा क्षेत्रों से जनता ने उन्हें चुनकर संसद भेजा। देवीपाटन की राजनीति में उन्होंने आनंद सिंह, कीर्तिवर्धन सिंह और पंडित सिंह जैसे प्रभावशाली नेताओं को चुनौती देकर अपना वर्चस्व स्थापित किया। यह जनाधार किसी संयोग का परिणाम नहीं था।
लेकिन उनकी राजनीति का सबसे बड़ा विरोधाभास यही है कि इतना बड़ा जननेता होने के बावजूद वे कभी केंद्रीय मंत्री नहीं बन सके। भारतीय राजनीति में यह दुर्लभ है। जिन नेताओं का जनाधार उनसे कहीं छोटा था, वे सत्ता के शिखर तक पहुँचे, लेकिन बृजभूषण हमेशा दरवाज़े तक आकर लौट गए।
शायद इसकी वजह उनका स्वभाव भी रहा। वे उन नेताओं में नहीं रहे जो हर परिस्थिति में सिर झुकाकर चलना जानते हों। पार्टी के भीतर भी अपनी बात खुलकर कहना, स्थानीय राजनीति में किसी से समझौता न करना और अपने तरीके से राजनीति करना—इन सबकी कीमत उन्होंने पदों से चुकाई। कुश्ती संघ के अध्यक्ष पद से भी उन्हें हाथ धोना पड़ा।
हो सकता है लोग उन्हें पसंद करें या नापसंद करें। यह लोकतंत्र है, हर व्यक्ति को अपनी राय रखने का अधिकार है। लेकिन किसी भी व्यक्ति के साथ न्याय का पहला सिद्धांत यही है कि उसे अदालत से पहले अपराधी न मान लिया जाए। शिकायत करने वाले का सम्मान जितना ज़रूरी है, उतना ही ज़रूरी आरोपी के संवैधानिक अधिकारों का सम्मान भी है।
बृजभूषण शरण सिंह के मामले ने यही सवाल हमारे सामने रख दिया है कि क्या हम अब न्यायालयों के फैसलों का इंतज़ार करने वाला समाज रह गए हैं, या फिर कैमरों और ट्रेंडिंग हैशटैग के आधार पर ही लोगों का भाग्य तय कर देने लगे हैं?
#BrijBhushanSharanSingh
बास्केटबॉल कोर्ट के उस पार
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रिस्पना नदी के किनारे दून यूनिवर्सिटी के गेस्ट हाउस में मेरा कमरा एक ख़ास नज़ारे से नवाज़ा गया है. जब से यहाँ हूँ, कोई दिन बारिश के बिना नहीं गुज़रा. खिड़की से बाहर देखते ही बास्केटबॉल कोर्ट दिखाई देता है. अक्सर शाम ढलते ही वहां लड़के-लड़कियों की टोलियाँ शोर मचाते, दौड़ते, हँसते, कभी-कभी बहस करते भी दिखते हैं. उस कोर्ट के ठीक बगल में एक इंडोर हॉल है, जहां हम बरसात में बैडमिंटन खेला करते हैं.
इसी इंडोर कोर्ट में मेरी मुलाक़ात अरीना से हुई.
फ्रेंच में फाइनल ईयर की छात्रा है — लंबे भूरे बाल, कलाई पर बंधा एक छोटा-सा काला धागा और वो ‘आर’ को थोड़ी सी फ्रेंच लय में खींचती हुई बोलती. देहरादून उसके लिए बस एक शहर नहीं, एक वजह भी है. असलम नाम का लड़का, जो उसका लिव-इन पार्टनर है, ग्रैजुएट हो चुका है लेकिन अब भी यहीं रुका है — शायद अरीना के लिए.
शुरुआती दिनों में हम बस बैडमिंटन की रैकेट थामते हुए ‘हैलो-हाय’ तक सीमित थे, लेकिन धीरे-धीरे वो औपचारिकताएं दोस्ती में घुलने लगीं. शाम को अक्सर अरीना और नयोनिका बास्केटबॉल कोर्ट पर दिख जातीं. दोनों के पास अपने-अपने जीवन की एक उलझी हुई सरलता थी.
नयोनिका — अंग्रेज़ी साहित्य की छात्रा. तीखी आँखें और हल्की मुस्कान. एक दिन मैंने नाम का मतलब पूछा, तो हँसते हुए बोली:
"बंगाली में इसका मतलब है — जिसकी आँखें सुंदर हों."
उसने कहा जैसे कहने की ज़रूरत न हो, मानो यह तो यूँ ही साफ़ दिखता हो.
हम तीनों अब कभी-कभार साथ बैठने लगे थे. चाय, मैगी, इंस्टा स्टोरीज़ और कभी-कभी लंबी बहसें. लड़कियों की ‘आज़ादी’ से लेकर फ्रेंच साहित्य तक.
एक शाम, मैंने हल्के अंदाज़ में पूछ ही लिया,
"तुम लोग इतनी लिबर्टी कैसे ले लेती हो? मतलब, घरवाले कुछ नहीं कहते?"
अरीना हँसी, फिर एक ठहराव के बाद बोली —
"पूछो मत, यार! एक दिन पापा ने इंस्टा पे मेरी शॉर्ट्स वाली तस्वीर देख ली. बस फिर क्या — हर एक घंटे पर कॉल करके डाँटते रहे. मैं तो घबरा गई. मम्मी को फोन करके बताया तो मम्मी ने बोला, ‘ब्लॉक कर दो उन्हें. कुछ भी बोलते हैं फालतू."
फिर अरीना ने सिर हिलाया — "उस दिन समझ आया कि कभी-कभी माँ ही असली क्रांति होती है घर में"
नयोनिका मुस्कराई और बोली,
"मेरे घरवाले तो चाहते हैं कि मैं कोलकाता में पढ़ाई करूँ."
मैंने सहज ही कहा,
"तो करो न! प्रेसीडेंसी और कोलकाता यूनिवर्सिटी — दोनों के अंग्रेज़ी विभाग शानदार हैं. और यहाँ तो अभी विभाग बनने शुरू हुए हैं. नई यूनिवर्सिटी है. दिक्कत क्या है वहाँ?"
उसकी मुस्कान एकदम फीकी हो गई.
"यही तो दिक्कत है ना. अगर वहाँ एडमिशन लिया तो घर में ही रहना पड़ेगा, यार."
वो वाक्य जैसे हवा में लटक गया था — अनकहा बहुत कुछ कहता हुआ.
उस शाम लौटते हुए मैं खिड़की से बास्केटबॉल कोर्ट की ओर फिर देखने लगा. वहाँ अंधेरा घिर चुका था, लेकिन मेरी आँखों में दो लड़कियों की आकृतियाँ अब भी दौड़ रही थीं. एक जो इंस्टा के ज़रिए अपने पापा से जूझ रही थी, और दूसरी जो अपने ही शहर से बाहर जाने के लिए विद्रोह कर रही थी.
आज़ादी कहीं भी हो — देहरादून के कैंपस में हो या कोलकाता की सड़कों पे — उसे जीने के लिए हर लड़की को कुछ न कुछ छोड़ना पड़ता है.
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2018 में जब केंद्र सरकार ने कुछ उच्च शिक्षण संस्थानों को "Institution of Eminence (IoE)" का दर्जा देने की घोषणा की थी, तब सबसे ज़्यादा विवाद जियो इंस्टीट्यूट को लेकर हुआ था।
विवाद इसलिए था क्योंकि उस समय यह संस्थान अस्तित्व में भी नहीं आया था। सरकार का तर्क था कि इसे एक ग्रीनफील्ड संस्थान के रूप में चुना गया है, यानी ऐसा संस्थान जिसे शुरू से ही विश्वस्तरीय बनाने की परिकल्पना है। कुछ प्रतिष्ठित विद्वानों, जिनमें अरविंद पनगढ़िया भी शामिल थे, ने यह दलील दी थी कि कई बार पुराने संस्थानों की जड़ता को बदलने से आसान होता है, नए संस्थानों को शुरुआत से उत्कृष्ट मानकों पर खड़ा करना।
आज, लगभग आठ वर्ष बाद, यह सवाल फिर उठता है कि उस प्रयोग का परिणाम क्या निकला?
तथ्य यह है कि जियो इंस्टीट्यूट अब नवी मुंबई में एक वास्तविक परिसर के साथ संचालित हो रहा है। वहाँ प्रबंधन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डेटा साइंस और कुछ अन्य क्षेत्रों में कार्यक्रम चल रहे हैं तथा शोध गतिविधियाँ भी शुरू हुई हैं। लेकिन दूसरी ओर, 2026 में संसद में सरकार ने स्पष्ट किया कि जियो इंस्टीट्यूट को औपचारिक रूप से "Institution of Eminence" के रूप में अधिसूचित नहीं किया गया है। यानी शुरुआती चयन और अंतिम अधिसूचना के बीच अंतर रहा। इसलिए जिस दर्जे को लेकर कभी सबसे अधिक बहस हुई थी, वह अंततः उसे औपचारिक रूप से मिला ही नहीं।
पिछले विधानसभा चुनाव में बिहार में जो लोग पीके के नाम पर हँसते थे इस बार वे सब चाह रहे थे कि पीके जीतें। बिहार की जनता बदलाव के लिए बेचैन है। एक बोलने वाला नेता, मैदान में लड़ने वाला नेता बदलाव पाने के लिए बहुत होता है।
बांकीपुर उपचुनाव के नतीजों के बाद अब ये बहस भी किसी हद तक सेटल हो जाएगी कि प्रशांत किशोर ज़मीन पर नहीं, सिर्फ़ हवा (सोशल मीडिया) में हैं. अगर मौजूदा रुझान नतीजों में तब्दील होते हैं, तो यह सिर्फ़ एक सीट की जीत नहीं होगी, बल्कि बिहार की राजनीति में एक नए विपक्षी ध्रुव के उभरने का संकेत होगी.
राजद और तेजस्वी की मौजूदा राजनीतिक स्थिति को देखते हुए कहा जा सकता है कि जन सुराज बिहार का डी फ़ैक्टो विपक्ष बनकर उभर सकता है.
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कभी-कभी एक उपचुनाव सिर्फ़ एक सीट का फ़ैसला नहीं करता, बल्कि आने वाली राजनीति की दिशा भी तय कर देता है.
कल बांकीपुर उपचुनाव के नतीजे में यदि प्रशांत किशोर रनर-अप भी रहते हैं, तो भी वे बिहार की राजनीति में एक गंभीर दावेदार के रूप में स्थापित हो जाएंगे. लेकिन यदि वे बीजेपी प्रत्याशी को हराकर जीत दर्ज करते हैं, तो यह बिहार की राजनीति में एक मील का पत्थर साबित हो सकता है.
याद रखिए, बड़े राजनीतिक बदलावों की आहट अक्सर उपचुनावों से ही सुनाई देती है. स्वतंत्र भारत के सबसे महत्वपूर्ण उपचुनावों में गिने जाने वाले 1963 के लोकसभा उपचुनावों ने पहली बार कांग्रेस के विरुद्ध विपक्षी एकता को वास्तविक राजनीतिक बल दिया. यही प्रयोग आगे चलकर ग़ैर-कांग्रेसवाद' और 1967 के सत्ता-परिवर्तन की बुनियाद बना.
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अमर सिंह विरोधाभासों से भरी हुई शख़्सियत थे. समाजवादी राजनीति के नेता थे, लेकिन बड़े उद्योगपतियों के सबसे करीबी मित्रों में गिने जाते थे और बॉलीवुड के सबसे बड़े सितारों के साथ उनकी घनिष्ठता थी. वे संसद में भी सहज थे और फिल्मी महफ़िलों में भी.
आज अमर सिंह की पुण्यतिथि है. भारतीय राजनीति में अनेक नेता हुए, अनेक सत्ता के केंद्र में भी रहे, लेकिन बहुत कम लोग ऐसे हुए जिन्होंने राजनीति, उद्योग, मीडिया और फिल्म जगत—चारों क्षेत्रों में एक साथ वैसा प्रभाव बनाया जैसा अमर सिंह ने बनाया. शायद यही उनका सबसे बड़ा एनिग्मा था.
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#IndianPolitics
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क्या था अमर सिंह का एनिग्मा?
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योगी आदित्यनाथ ने एक बार कहा था कि "मुझे गर्व है कि मैं क्षत्रिय घर में पैदा हुआ. सारे भगवान क्षत्रिय घर में पैदा हुए." आज के दौर में ऐसी बातें खुलेआम कैमरे के सामने कहने वाले नेता असामान्य नहीं हैं. लेकिन एक समय भारतीय राजनीति में जाति, सत्ता, पूंजी और प्रभाव के बारे में जिस तरह की बेबाक बातें कैमरे के सामने होती थीं, उनमें अमर सिंह का नाम सबसे अलग दिखाई देता था.
2014 के लोकसभा चुनाव प्रचार अभियान में नरेंद्र मोदी ने अपनी प्रचार दक्षता का बखान करते हुए कहा था कि उन्होंने 2012 में कच्छ के रण की रेत की भी अमिताभ बच्चन से ब्रांडिंग करवा दी. लेकिन उससे पहले 2007 में ही अमर सिंह ने समाजवादी पार्टी की सरकार में अमिताभ बच्चन को उत्तर प्रदेश का ब्रांड एम्बेसडर बनवा दिया था. "यूपी में है दम, क्योंकि जुर्म यहाँ है कम" जैसे अभियान के पीछे भी अमर सिंह की सोच और नेटवर्किंग की बड़ी भूमिका मानी गई.
यही अमर सिंह का सबसे बड़ा एनिग्मा था. वे किसी एक दुनिया के आदमी नहीं थे. उनकी गति राजनीति, अर्थ, फिल्म, क़ानून और साहित्य में समान रूप से थी. मिसाल के लिए जिस सहजता से वो हरिवंश राय बच्चन की आत्मकथा के अलग-अलग खंडों से वाक़ये उद्धृत करते थे, वैसे अमिताभ बच्चन भी नहीं कर सकते थे. उनके मित्रों की सूची में उद्योगपति भी थे, फिल्म सितारे भी, वरिष्ठ वकील भी, पत्रकार भी और लगभग हर दल के नेता भी. शायद ही भारतीय राजनीति में कोई दूसरा ऐसा नेता हुआ हो, जिसकी पहचान किसी विचारधारा से अधिक उसके संपर्कों के विस्तार से बनी हो.
मीडिया के भी वे बेहद चहेते थे. इसकी वजह केवल उनकी वाकपटुता और अनन्य वाचालता भर नहीं थी, बल्कि यह थी कि वे सत्ता के अंतःपुर की वे ख़बरें, क़िस्से और विश्लेषण सामने रखते थे, जिन्हें सामान्यतः राजनेता सार्वजनिक रूप से कहने से बचते थे. वे टीवी स्टूडियो में भी उतने ही सहज दिखाई देते थे, जितने किसी उद्योगपति के ड्रॉइंग रूम या किसी राजनीतिक रणनीति की बैठक में.
उनकी जीवन यात्रा भी कम दिलचस्प नहीं रही. छात्र जीवन में उन्होंने कांग्रेस के छात्र संगठन एनएसयूआई से शुरुआत की. बाद में समाजवादी पार्टी के टिकट पर राज्यसभा पहुंचे और जीवन के एक दौर में अपनी अलग राजनीतिक पार्टी भी बनाई. अपने अंतिम वर्षों में वे भारतीय जनता पार्टी के निकट आ गए थे.
राजनीति में आने से पहले ही उन्होंने प्रभावशाली लोगों के बीच अपनी जगह बनानी शुरू कर दी थी. शुरुआती दौर में वे भरतिया परिवार के क़रीब आए और कुछ समय तक दिल्ली में उनके घर में भी रहे. यहीं से उनकी पहचान बड़े कारोबारी घरानों तक बनी. बाद में वे धीरूभाई अंबानी के निकट आ गए और धीरे-धीरे कॉरपोरेट जगत में उनकी गहरी पैठ बन गई. उस दौर में उन्हें उद्योग और राजनीति के बीच सबसे प्रभावशाली सेतु के रूप में देखा जाने लगा.
राजनेताओं में पहले उनकी घनिष्ठता माधवराव सिंधिया और पूर्व प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर से रही. बाद में वे मुलायम सिंह यादव के खेमे में आए. मुलायम सिंह ने उनकी राजनीतिक उपयोगिता को पहचाना और 1996 में उन्हें पहली बार राज्यसभा भेज दिया. इसके बाद लगभग डेढ़ दशक तक वे समाजवादी पार्टी के सबसे प्रभावशाली नेताओं में गिने गए.
अमर सिंह के दोस्तों की फेहरिस्त में समाज के लगभग हर क्षेत्र के सफल लोग थे. एक समय अमर सिंह, अमिताभ बच्चन और अनिल अंबानी की तिकड़ी को अमर अकबर, एंथोनी और A3 जैसे नाम दिए गए. जया बच्चन को सक्रिय राजनीति में लाकर समाजवादी पार्टी से राज्यसभा भेजने का श्रेय भी काफ़ी हद तक अमर सिंह को ही दिया जाता है. फिल्म जगत और राजनीति के बीच उन्होंने जिस तरह की कड़ी बनाई, वह उस समय अभूतपूर्व थी.
हालांकि अमर सिंह का रिश्ता जितना प्रभाव से था, उतना ही विवादों से भी रहा. और ये भी कहा जाता कि वे जहां रहते हैं वहाँ झगड़ा ज़रूर करवा देते हैं. वही हश्र अमर, अमिताभ और अनिल की तिकड़ी का भी हुआ. एक पार्टी में आख़िरी बार मिलते हुए तीनों अपने-अपने जीवन में एकदूसरे के बिना आगे बढ़ने पर सहमत हुए. बाद में मुलायम सिंह के यादव परिवार में फूट की वजह भी अमर सिंह को बताने की कोशिश की गई.
2003 में बहुजन समाज पार्टी में टूट के बाद समाजवादी पार्टी की सरकार बनवाने की राजनीतिक क़वायद हो या 2008 में भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु समझौते के दौरान यूपीए सरकार को समाजवादी पार्टी का समर्थन दिलाने की भूमिका. दोनों घटनाओं में वे सत्ता के सबसे प्रभावशाली रणनीतिकारों में गिने गए. 2008 के 'कैश फॉर वोट' विवाद में भी उनका नाम प्रमुखता से उछला, हालांकि उन्होंने अपने ऊपर लगे आरोपों से लगातार इनकार किया।