🕉️श्री रामचरितमानस, प्रथम अध्याय, चौपाई🕉️
भानुप्रतापहि बाजि समेता।
पहुँचाएसि छन माझ निकेता॥
नृपहि नारि पहिं सयन कराई।
हयगृहँ बाँधेसि बाजि बनाई॥4॥
भावार्थ : उसने प्रतापभानु राजा को घोड़े सहित क्षणभर में घर पहुँचा दिया। राजा को रानी के पास (-------(शेष संलग्न चित्र मे प्रस्तुत)
🕉️श्री मदभगवत् गीता🕉️
अध्याय - १८, श्लोक-७७
तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः।
विस्मयो मे महान् राजन्हृष्यामि च पुनः पुनः।।77।।
भावार्थ : हे राजन ! श्री हरि के उस अत्यन्त विलक्षण रूप को भी पुनः-पुनः स्मरण करके मेरे चित्त में महान(------(शेष संलग्न चित्र मे प्रस्तुत)
🕉️श्री मदभगवत् गीता🕉️
अध्याय - १८, श्लोक-७८
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम।।78।।
भावार्थ : हे राजन ! जहाँ योगेवश्वर भगवान श्रीकृष्ण हैं और जहाँ गाण्डीव-धनुषधारी अर्जुन हैं, वहीं पर(-------(शेष संलग्न चित्र मे प्रस्तुत)
🕉️श्री रामचरितमानस, प्रथम अध्याय, चौपाई🕉️
दोहा :
नित नूतन द्विज सहस सत बरेहु सहित परिवार।
मैं तुम्हरे संकलप लगि दिनहिं करबि जेवनार॥168॥
भावार्थ : नित्य नए एक लाख ब्राह्मणों को कुटुम्ब सहित निमंत्रित करना। मैं तुम्हारे सकंल्प (के काल (-------(शेष संलग्न चित्र मे प्रस्तुत)
🕉️श्री रामचरितमानस, प्रथम अध्याय, चौपाई🕉️
एहि बिधि भूप कष्ट अति थोरें।
होइहहिं सकल बिप्र बस तोरें॥
करिहहिं बिप्र होममख सेवा।
तेहिं प्रसंग सहजेहिं बस देवा॥1॥
भावार्थ : हे राजन्! इस प्रकार बहुत ही थोड़े परिश्रम से सब ब्राह्मण तुम्हारे वश(-------(शेष संलग्न चित्र मे प्रस्तुत)
🕉️श्री रामचरितमानस, प्रथम अध्याय, चौपाई🕉️
दोहा :
नील महीधर सिखर सम देखि बिसाल बराहु।
चपरि चलेउ हय सुटुकि नृप हाँकि न होइ निबाहु॥156॥
भावार्थ : नील पर्वत के शिखर के समान विशाल (शरीर वाले) उस सूअर को देखकर राजा घोड़े को चाबुक लगाकर तेजी से (-------(शेष संलग्न चित्र मे प्रस्तुत)
🕉️श्री रामचरितमानस, प्रथम अध्याय, चौपाई🕉️
आवत देखि अधिक रव बाजी।
चलेउ बराह मरुत गति भाजी॥
तुरत कीन्ह नृप सर संधाना।
महि मिलि गयउ बिलोकत बाना॥1॥
भावार्थ : अधिक शब्द करते हुए घोड़े को (अपनी तरफ) आता देखकर सूअर पवन वेग से भाग चला। राजा ने (-------(शेष संलग्न चित्र मे प्रस्तुत)
🕉️श्री रामचरितमानस, प्रथम अध्याय, चौपाई🕉️
तकि तकि तीर महीस चलावा।
करि छल सुअर सरीर बचावा॥
प्रगटत दुरत जाइ मृग भागा।
रिस बस भूप चलेउ सँग लागा॥2॥
भावार्थ : राजा तक-तककर तीर चलाता है, परन्तु सूअर छल करके शरीर को बचाता जाता है। वह पशु कभी(-------(शेष संलग्न चित्र मे प्रस्तुत)
🕉️श्री रामचरितमानस, प्रथम अध्याय, चौपाई🕉️
गयउ दूरि घन गहन बराहू।
जहँ नाहिन गज बाजि निबाहू॥
अति अकेल बन बिपुल कलेसू।
तदपि न मृग मग तजइ नरेसू॥3॥
भावार्थ : सूअर बहुत दूर ऐसे घने जंगल में चला गया, जहाँ हाथी-घोड़े का निबाह (गमन) नहीं था। राजा (-------(शेष संलग्न चित्र मे प्रस्तुत)