कोउ पितु भगत बचन मन कर्मा। सपनेहुँ जान न दूसर धर्मा।।
सो सुत प्रिय पितु प्रान समाना। जद्यपि सो सब भाँति अयाना।।
पुरूष नपुंसक नारि वा जीव चराचर कोइ।
सर्ब भाव भज कपट तजि मोहि परम प्रिय सोइ।।
लोग रुपए- पैसे, स्वास्थ्य, गाड़ी, बेटा बेटी के लिए भगवान का नाम लेते हैं तो वह उचित और राजनीति के लिए भगवान का नाम ले लिया तो गलत!
ईश्वर को दोष नहीं लगता भई वह सबको पवित्र हो करता है।
रैदास जी के शालिग्राम पूजने पर भी कुछ पंडितों ने हो हल्ला किया था, केवल थोड़े वर्णाश्रम के अभिमान के कारण आज कुछ लोगों के मन में निर्मलता नहीं आ पाई, यह दुख भी है।
विश्वामित्र चाहते तो मारीच और सुबाहु को स्वयं भी दंड देने का विचार कर सकते थे, परंतु नहीं... यह काम तो ईश्वर का है जो दंड भी कल्याण के लिए ही करता है, इसीलिए उसी ईश्वर को हमारे जीवन में आना चाहिए जिससे हमारे दुख और दोष का विनाश हो सके।