ब्रो! पहले तो धमकी देना और बाप पर जाना बंद करो। हम आपको और आपके जैसे हर नेता को हर गठबंधन में मंत्री बनते देख चुके हैं।
कोई किसी का अधिकार नहीं छीन रहा। अठावले जैसे लोग बाल्मीकि, मुसहर, भुइयाँ, डोम, मातंग आदि को आरक्षण का लाभ नहीं देना चाहते इसलिए उपवर्गीकरण जैसी समीक्षा पर बिलबिला उठते हैं।
आप एक विचारधाराहीन नेता हैं जो दुर्भाग्य से अपने जाति समूह का स्वघोषित नेता बन कर, उसी समूह की 1000 अन्य जातियों का अधिकार खा रहा है।
-40 बौद्धिक स्तर वाले इन भीमटों को लगता है कि “भीमटा” या “नीला कबूतर” कहना इनके खिलाफ ज़हर उगलना है, लेकिन “ब्राह्मणवादी”, “मनुवादी” जैसे शब्दों से गाली देना ज़हर उगलना नहीं है।
जब इनकी फ़र्ज़ी अत्याचार वाली कहानियाँ आजकल कोई खरीद नहीं रहा, तो दिखावे के लिए दो बार “जय संविधान” बोल देंगे और समझेंगे कि बौद्धिक स्तर 100 हो गया। 🤡
Brahmins according to mughlai intellectuals, leftist liberals, secular intelectuals and peedit-shoshit caste deprived of water supply for 500000 years..
(Well dome @nishantshekhar1)
आप कितने भी पढ़ लिख लो या संपन्न हो जाओ, आप के मन से अशांति, जलन और हीन भावना कभी नहीं जाएगी क्यूंकि आप को पता है आप कैसे आगे बढे हो! सब कुछ पाने के बाद भी ऐसे ही जलते रहोगे!
ये क्या किसी श्राप से कम है?
The SC/ST Atrocities Act is India’s own blasphemy law.
Like Pakistan’s blasphemy law, it is widely misused. Like blasphemy cases, allegations can destroy lives before guilt is established. Like blasphemy, you can be booked for “insulting” figures who have been dead for centuries. And like blasphemy laws, its language is dangerously broad.
But there is one difference: the scale is far greater. It is more draconian.
The number of people destroyed by system under the SC/ST Act is vastly greater than those prosecuted under Pakistan’s blasphemy laws.
No country can call itself civilized if it implements laws like blasphemy and SC/ST Atrocity act.
Either reform it or abolish it. #StopMisuseOfScStAct
@SauravDassss तुम चूतिए इसी कारण तीन बार लॉ में फेल हुए हो। तुम्हें लॉ की झाँट समझ नहीं है। और चिकने लूडो, तू तो डिफेंड कर रहा था पीएम की माँ को गाली देना। तू कैसे मॉरल हाय ग्राउंड ले रहा बे लौड़े?
Have you ever seen a politician rush to condemn caste abuse when Brahmins, Rajputs or Banias are targeted?
Our politicians are very clear: they only care about Reservations and Freeloaders. The rest of you can fuck off.
Fairness in law means applying the same standards to everyone. If abusing one caste, community, or religion is considered a criminal offence, while similar abuse against another is dismissed as freedom of speech, then the law is neither fair nor impartial. It also creates a serious problem.
Ajeet Bharti Refuses to Back Down✊
When it comes to protecting the dignity of one’s family, many men would have reacted the same way, what is deeply concerning is how openly such expressions of lπst toward GC women are being normalized under this government.
70 साल में आरक्षण 20% से 75% पर आ गया!
शिक्षा से नौकरी के प्रोमोशन तक आ गया!
Govt, public sector से अब private सेक्टर के दरवाजे पर खड़ा है!
और आप इस मुग़ालते में हैं कि लोग बोलेंगे
"अब हमको आरक्षण नहीं चाहिए"!
ऐसे ही सपने देखते रहिए!
एक दिन यही आपकी संपत्ति और आपकी कंपनी में हिस्सा मांगेंगे!
क्योंकि लालच का कोई अंत नहीं!
और गलत को बढ़ावा दोगे, तो वो कभी अंत नहीं होगा बल्कि बढ़ता ही जायेगा🙏
मेरे ऊपर SC/ST एक्ट में FIR पर कुछ बातें सवर्ण समाज से
कोई मेरी माँ या बहन पर सीधे बलात्कारी मानसिकता के साथ यह कहे कि उसका विवाह मैं चंद्रशेखर के साथ करा दूँ, और मैं चुप रह जाऊँ तो आप बताइए कि मैं कैसा पुत्र या भाई हूँ?
इतने पर भी चंद्रशेखर को ले कर मैंने कोई जातिसूचक शब्द नहीं बोला, जो उक्त वीडियो में है। जब स्टेज से ब्राह्मणों की बेटियों को खींचने की बातें होती हैं और किसी SC नेता का चेला सोच-समझ कर उकसाने के लिए ऐसी बात करेगा, तो मैं चुप कैसे रहूँगा?
आज व्यक्ति अपने मौलिक अधिकारों को समझे या न समझे, वह यह अवश्य जानता है कि SC/ST एक्ट क्या है। तो मैं जब बोलता हूँ तो मुझे अपनी सीमाएँ (चाहे वह कितनी ही अनुचित क्यों न हों) पता हैं कि क्या बोलना है, क्या नहीं।
मैं जानता हूँ कि दिल्ली पुलिस के नॉर्थ अवेन्यू स्टेशन में आजाद समाज पार्टी वालों ने कितना दवाब दे कर रात के बारह बजे यह FIR लिखवाया है जो कोर्ट में दो मिनट नहीं टिकेगा। एक भी धारा ऐसी नहीं है जो होल्ड करेगी।
मैं सैनिक स्कूल का छात्र हूँ और इतनी रैगिंग झेल चुका हूँ कि मेरा मनोबल तोड़ने के लिए दिल्ली पुलिस को कस्टडी में मेरी हत्या करनी पड़ेगी, दो-चार डंडों से मेरा मनोबल नहीं टूटने वाला। और यदि मैं जीवित बच गया तो इसी स्थिति में जंतर मंतर जाऊँगा और अपने समाज से कहूँगा कि बताओ, तुम्हारी बहन और माँ को ले कर कोई ऐसी टिप्पणी करे तो क्या करोगे?
यदि ऐसा कमेंट फिर मेरे वीडियो पर आया तो मैं पुनः उसी तरीके से उत्तर दूँगा जो मैंने दिया। कानून जब तक है, संशोधन नहीं होता, मैं उसका सम्मान करूँगा और दिल्ली पुलिस के साथ पूर्ण सहयोग करूँगा। 92% ऐसे केस केवल प्रताड़ित करने के लिए होते हैं।
अंत में, सवर्ण समाज से यह पूछना चाहता हूँ कि क्या इस तरह की टिप्पणी पर मुझे सह लेनी चाहिए थी क्योंकि किसी पार्टी के लोग नाराज हो जाएँगे? क्या ब्राह्मणों की माँ और बहनें इन रेप मैंटिलिटी से संचालित गुंडों के शाब्दिक बलात्कार के लिए जन्म लेती हैं?
RHA को ले कर सरकार से कुछ बात और माँगें
सरकार अपने स्तर से हर आंदोलन को फूट, समझौता, बल-प्रयोग, समझदारी, मिसइन्फॉर्मेशन कैम्पेन या कायरता दिखा कर कर समाप्त करना चाहती है। और वही उनका कार्य भी है। RHA का नाम ले कर कुछ लोगों ने आंदोलन के लिए जनता को बुलाया और लगभग 7000 की भीड़ जंतर मंतर पर भीतर दिखी, उतने को ही बाहर होल्ड किया गया या लौटा दिया गया।
मैंने केवल दिल्ली पुलिस की बकलोली की अवज्ञा के लिए इसमें भाग लेने की बात की और फिर बहुत लोग मेरे आने पर भी आए। फिर दुबे को पाठक जी ने नेता मान कर एक ऐसे पत्र पर चर्चा के लिए आश्वासन दिया जिसमें आरक्षण शब्द ही नहीं है।
खैर, मैं ये सब तकनीक देखता और जानता आया हूँ। मुझे इस विषय पर सरकार को भीड़ दिखाने की आवश्यकता न पहले थी, न आज है, पर जब चाहूँ वह भी कर सकता हूँ। अगली बार बिना अनुमति के भी ऐसा किया जा सकता है यदि प्रूफ ऑफ कॉन्सेप्ट चाहिए, तो वह भी दिखा देंगे। पर मेरा लक्ष्य वह है ही नहीं।
सरकार को ‘आरक्षण हटाओ आंदोलन’ से इसलिए नहीं डरना चाहिए क्योंकि एक भीड़ पूरे कनॉट प्लेस को घर कर पत्थरबाजी करते हुए संसद घेर लेगी। सरकार को इसलिए डरना चाहिए कि ऐसी कोई भीड़ ही नहीं है, न ही हम संसद को घेरने की योजना बना रहे हैं।
आंदोलन की तपन केवल जलती हुई कार की आग और अराजक भीड़ की ही नहीं होती। एक तपन ऐसी भी होती है जब जनमानस को वैचारिक रूप से इतना सक्षम बना दिया जाता है कि वह स्वयं ही अपने लिए वह निर्णय कर ले, जो वो कल तक किसी दूसरे बहकावे में आ कर कर रहा था।
हमारी माँगें:
१. आरक्षण पर श्वेत-पत्र: क्या लाभ हुआ, किन जातियों को अनुपात से अधिक लाभ लगातार मिला, कौन सी जातियाँ पूर्णतः छूट गईं। आरक्षण किस तरह से देश या समाज के उत्थान में सहायक है, उसके लिए आँकड़े क्या कहते हैं आदि आदि! इस से जुड़ी हर वह रिपोर्ट और सर्वेक्षण जो सार्वजनिक नहीं हुई।
२. EWS को हर वह आर्थिक सहायता दी जाए जो SC को मिलती है। निःशुल्क कोचिंग, निःशुल्क फॉर्म, शून्य हॉस्टल और कोर्स फीस। फिर भी लोन यदि लेना पड़े तो उसमें भी सुविधा।
३. तीनों ही आरक्षित वर्ग में ‘कोटा विदिन कोटा’ लागू हो ताकि वास्तविक दलित-पीड़ित-वंचित जातियों तक लाभ पहुँचे। अभी SC और OBC में हजार-हजार जातियाँ ऐसी हैं जिन्हें नगण्य आरक्षण मिला है। और 4-5 जातियाँ ऐसी हैं जो 70-80% आरक्षण खा रही हैं। इसका आधार पारिवारिक आय हो, न कि वैयक्तिक और दुरुपयोग की संभावना न रहे।
४. मेरिट का सम्मान हो। आरक्षित वर्ग का कटऑफ किसी भी हालत में सामान्य वर्ग के कटऑफ के (से नहीं) 10% के रेंज से बाहर न जाए। और यह भी आज की परीक्षा के अधिकतम आयु सीमा वाले बच्चों की आयु के बाद समाप्त किया जाए। न्यूनतम क्वालिफाइंग मार्क्स तो तय होना ही चाहिए।
५. सरकार यह सर्वेक्षण करे कि क्या गरीबी, भेदभाव या पिछड़ेपन से किसी की बौद्धिक क्षमता घट या बढ़ सकती है? इम्पीरिकल एविडेंस सार्वजनिक करें और उसी आधार पर आरक्षण की नीतियाँ बनें।
६. एक व्यक्ति को एक बार आरक्षण मिले। एक परिवार को एक बार आरक्षण मिले।
७. दशकीय समीक्षा हो। समाप्ति के लिए एक ‘सनसेट क्लॉज’ या रोडमैप कि कब तक रहेगा।
८. कॉलेज/यूनिवर्सिटी पुस्तकालयों में पुस्तकों के अलॉटमेंट का आरक्षण तत्काल निरस्त हो। इसका कोई लॉजिक नहीं है। यह आरक्षण से लड़ कर वहाँ पहुँचे बच्चों को सताने की व्यवस्था मात्र है। या आप पुस्तकों की मात्रा दोगुनी कीजिए और वहाँ ‘आरक्षित सेक्शन’ लिख दीजिए।
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अन्य माँगें:
९. यूजीसी नियमावली निरस्त हो या समीक्षा कर के हर जाति समूह को इसमें सम्मिलित किया जाए।
१०. SC/ST Act की तर्ज पर ‘सवर्ण उत्पीड़न (रोकथाम) कानून पास’ हो। दोनों ही कानून में केस झूठा पाए जाने पर, उस केस में होने वाला दंड आरोप लगाने वाले को झेलना पड़े। आर्थिक जुर्माना भी वसूला जाए।
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सरकार और सुधिजन देख लें। बाकी, चाहे आप दुबे, शेखावत या अन्य को मैनेज कर लें, आंदोलन चलता रहेगा।
Calling every General Category grievance “victimhood” doesn’t make you rational, it makes you a smug clown with a conclusion looking for arguments.
If you admit some policies are blatantly discriminatory, then “there is no systematic problem” is just intellectual cowardice dressed up as nuance.
We score 95%, pay 10× the fees, and still can’t get admission while caste-based policies keep stacking up against us. SC/ST Act, UGC and others aren’t imaginary grievances.
The irony? You’re crying about “emotional arguments” while dismissing an entire category’s grievances with one lazy label. That’s hypocrisy with a superiority complex.