मिलने वाले अब,
मुझ तक नहीं आते,
टकराकर इनपर,
अपनी बात लिख जाते हैं,
वर्षों से मैंने चारों ओर
'दीवारें' खड़ी कर रखी हैं,
जो मुझे सुनती हैं, समझती हैं
और बहस नहीं करती।
आदि से अनंत की वेदनाएं सहता हूँ
मैं क्यों भविष्य या भूत में नहीं रहता हूँ।
ना कि कल कैसा होगा,
कितना धन अर्जित होगा,
कितनी ऊर्जा बची रहेगी,
कब तक स्वांस थमी रहेगी।
भविष्य सैर कराता है अंत दिशा की ओर,
इस जीवन की माया से उस सागर की ओर।
मोह भंग नहीं करता, प्रेमरंग में बहता हूँ।
भूत बताता है रहस्य जन्मों के,
कब कितने युद्ध लड़े,
किस युग मे षणयंत्र रचे,
दर्शन कब हुए प्रभु महात्म्य के,
बुद्धि व्यापकता एवं आध्यात्म के।
कितने तड़पे रोगी बनकर,
कितने काटे धड़ से सर,
भाल पकड़ कर, भाव जकड़कर, वर्तमान में रहता हूँ।
मैं क्यों भविष्य या भूत में नहीं रहता हूँ।
यदि ये नभ, सूर्य, धरा, पवन व ऋतुएँ आदि से यहीं थी तो निश्चित है कि तुम भी यहाँ इससे पहले थी!
इसी प्रकार मेरे साथ, मेरे प्रेम में, व्याकुल और तृप्त, आगे भी रहोगी किसी अन्य काल में, अंत तक!
पहले लोगों का चिंतन व्यक्तित्व पर होता था और अब छवि पर होता है।
पहले लोग संसार के हित के लिए जीवन समर्पित करते थे और अब स्वयं को संसार समर्पित करते हैं।
जीवन का सार यही है कि 'सुख-दुःख' जो जहाँ ढूंढ पाए और जिसे जहाँ मिल जाए।