बेफालतू की कंट्रोवर्सी अगर किसी को करनी है तो करता रहे।
#विजय_बैंसलाजी ने कुछ गलत नहीं बोला,
ये हमारे समाज को #अंधविश्वास से बाहर निकालने की एक कोशिश है, ताकि समाज सशक्त बने।
@VijaySBainsla
आरक्षण संघर्ष समिति के वरिष्ठ उपाध्यक्ष और 'कर्नल साहब के हनुमान' नाम से प्रसिद्ध स्व. कैप्टन हरप्रसाद तंवर जी को सादर श्रद्धांजलि। कृतज्ञ समाज सामाजिक न्याय मे आपके योगदान के लिए सदा आभारी रहेगा।
वक्त लगा, संघर्षों का सामना करना पड़ा, आखिरकार समाज की जीत हुई,
विजय बैसला की दहाड़ से पुलिस प्रशासन पीछे हटा,
और मूर्ति लगाकर ही दम लिया।
धन्य हो वीर बगड़ावत,....गुर्जर एकता जिन्दाबाद।
🙏🙏
@VijaySBainsla
@arvindchotia पुलिस के पास न्याय लेने जाओ तो घूंस दो,
•तहसील काम करवाने जाओ तो घूंस दो
•मृत्यु प्रमाण पत्र बनवाना है तो घूंस दो
•जन्म प्रमाण पत्र बनवाना है तो घूंस दो
•ड्राइविंग लाइसेंस बनवाना है तो घूंस दो
•पासपोर्ट वेरीफिकेशन करवाना है तो पुलिस को घूंस दो
सत सत नमन उन वीर शहीदों को जिनकी वजह से आज हमे पांच प्रतिशत आरक्षण मिला मुझे याद है वो दिन 2007 का जिस दिन सरकार ने गुर्जरों पर गोलियां चलाई ओर 73 भाई शहीद हो गए
समाज के हक की लड़ाई और स्वाभिमान के लिए गुर्जर आंदोलन में अपना सर्वस्व बलिदान करने वाले कौम के वीर सपूतों को सादर नमन।
आप सभी का यह त्याग आने वाली पीढ़ियों को हमेशा प्रेरित करता रहेगा।
🙏🏽🙏🏽
#गुर्जर_आंदोलन_बलिदान_दिवस#गुर्जर_आंदोलन_बलिदान_दिवस
समाज के हक की लड़ाई और स्वाभिमान के लिए गुर्जर आंदोलन में अपना सर्वस्व बलिदान करने वाले कौम के वीर सपूतों को सादर नमन।
आप सभी का यह त्याग आने वाली पीढ़ियों को हमेशा प्रेरित करता रहेगा।
🙏🏽🙏🏽
#गुर्जर_आंदोलन_बलिदान_दिवस#गुर्जर_आंदोलन_बलिदान_दिवस
बुके, ब्यूरोक्रेसी और हम मीडिया वालों का बटर-अप बिज़नेस!
राजस्थान में अभी जो दृश्य दिखा कुछ ऐसा ही था। चीफ़ सेक्रेटरी भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के स्वागत की तस्वीरें स्वयं ही पोस्ट कर रहे हैं और टोंक की सोशल मीडिया स्टार कलक्टर टीना डाबी भी कहाँ पीछे रह सकती थीं। उनका गुलदस्ता-प्रसंग आज सोशल मीडिया में काफ़ी वायरल है।
दरअसल, यह किसी एक अफ़सर या एक बुके भर का मामला नहीं है; यह हमारे समय का पूरा राजनीतिक-प्रशासनिक एक्स-रे है। मुख्यमंत्री के साथ सरकारी कार्यक्रम में अफ़सरों की उपस्थिति समझ में आती है; लेकिन पार्टी पदाधिकारी के स्वागत में उस तरह की उत्सुकता, वह बुके, वह प्रतीक्षारत विनम्रता और फिर उसका सार्वजनिक प्रदर्शन आदि यह सब बताता है कि सत्ता, संगठन और ब्यूरोक्रैटिक मर्यादाओं की रेखा अब इतनी धुंधली कर दी गई है कि संविधान भी शायद चश्मा पोंछकर समझने की कोशिश कर रहा होगा कि मामला सरकार का है या पार्टी का।
हो भी क्यों न! हम मीडिया वाले कौनसा दूध के धुले हैं। सुप्रीम कोर्ट तक भारत सरकार का बना दिया जाता है और हमें ख़बर तक नहीं होती। बड़े-बड़े संपादक सत्ताधारी दल के मुखिया के स्वागत में ऐसे लहालोट होने लगें, जैसे लोकतंत्र नहीं, किसी बरात का घोड़ा निकल रहा हो तो भला ब्यूरोक्रेसी कैसे पीछे रहे? आखिर बाबू भी इसी देश की मिट्टी से बने हैं; फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि पत्रकारिता कभी नैतिकता और आचार-संहिता की दुहाई देती थी और ब्यूरोक्रेसी संवैधानिक आचार-संहिता से बंधी थी। लेकिन आजकल दोनों ने लगता है आचार-संहिता को अचार का मर्तबान समझ लिया है। कभी-कभी खोलते हैं, सूंघते हैं और फिर ढक्कन कसकर बंद कर देते हैं। और यह स्वाभाविक भी है कि कुलपति भी किसी मंत्री के स्वागत में बुके लेकर स्टेशन या एयरपोर्ट पर घंटों इंतज़ार कर रहा हो तो यही सोचना पड़ता है कि हम सब एक ही टकसाल में ढाले गए सिक्के हैं।
पत्रकारिता से लेकर विश्वविद्यालयों और कॉलेजों से लेकर कोर्ट तक का हाल यह है कि सत्ता के चरणों में अपनी मेधा रखी जाती है और फिर उसी मेधा से हम जनता को बताते हैं कि देखिए, हम स्वतंत्र हैं। संपादक सत्ताधारी दल के नेता से मिलकर लौटते हैं तो चेहरे पर वही चमक होती है, जो पुराने जमाने में किसी जागीरदार के दरबार से इनाम पाकर लौटे प्रशस्ति गान करके लौटे कवि के चेहरे पर होती थी। फ़र्क़ इतना है कि तब कवि खुलकर कहता था“महाराज की जय!” आजकल हम मीडिया वाले कहते हैं, “हमने कठोर सवाल पूछे।” और कठोर सवाल यह होता है, “सर, इतनी ऊर्जा आप लाते कहां से हैं?” या हम यहीं बैठे-बैठे ही हारे हुए को किसी सुदूर प्रदेश का चुनाव जितवा देते हैं और जीतने वाले को हरवा देते हैं। हम प्रतिपक्ष से तीखे सवाल पूछते हैं और तटस्थ विश्लेषक के रूप में सत्तारूढ़ दल का ख़ास चमचा ढूंढ़कर लाते हैं।
अब जब पत्रकारिता, शिक्षा और न्याय तक ने सत्ता से घी-शक्कर का रिश्ता बना लिया है तो प्रशासन के अधिकारी भला क्यों पीछे रहें? वे भी मनुष्य हैं। उनके भी कॅरियर हैं, ट्रांसफ़र हैं, पोस्टिंग हैं, एसीआर है, भविष्य है, यह अप्रैल है तो हो सकता है कि अगस्त में रिटायरमेंट हो, यह सितंबर है तो हो सकता है कि नवंबर में हो और आरपीएससी चेयरमैन का पद खाली हो रहा हो और भविष्य में कहीं किसी आयोग, प्राधिकरण, सलाहकार मंडल या राजभवन के किसी कमरे में बैठकर राष्ट्र-निर्माण करने की संभावना भी तो हो सकती है। पद की अवधि भी तो बढ़ सकती है। इसलिए वे भी समझदार हैं। वे जानते हैं कि संविधान क़िताब में रहता है और सत्ता सामने खड़ी रहती है। क़िताब को सलाम बाद में भी किया जा सकता है; सामने खड़े आदमी को गु़लदस्ता अभी देना पड़ता है; क्योंकि बिना क़िताब भी उससे ख़िताब मिल सकता है।
आप ध्यान से देखेंगे तो बुके एक अजीब चीज़ है। इसे कोई लेकर जूनियर अफ़सर आता है, वह सीनियर को देता है, सीनियर उसे वीवीआईपी को सौंपता है और वीवीआईपी तत्काल ही अपने जूनियर को। यानी गुलदस्ता एक जूनियर से दूसरे जूनियर तक ही चलता रहता है। वीवीआईपी तो उसे छूता भर है।
यहीं से लोकतंत्र का वह सुंदर दृश्य शुरू होता है, जिसमें जनता दूर खड़ी रहती है, नेता मंच पर खड़े रहते हैं, पत्रकार कैमरे के पीछे मुस्कुराते हैं और अफ़सर गुलदस्ता लेकर बीच में खड़े रहते हैं। गु़लदस्ता अब फूलों का नहीं रहा; वह संकेतों का गुच्छा है। उसमें गेंदा कम, कॅरियर अधिक होता है। गुलाब कम, निष्ठा अधिक होती है। रिबन कम, संदेश अधिक होता है; “सर, हम समझते हैं कि सरकार और पार्टी में फ़र्क़ होता है, पर हम इतने मूर्ख नहीं हैं कि उस फ़र्क़ को सार्वजनिक रूप से दिखा दें।”
सवाल यह नहीं है कि कोई अधिकारी किसी कार्यक्रम में गया क्यों। अगर मुख्यमंत्री हैं, सरकारी कार्यक्रम है, प्रशासनिक समन्वय है तो अफ़सरों की उपस्थिति स्वाभाविक है। सवाल यह है कि वे किसका स्वागत कर रहे हैं? संवैधानिक पद का या पार्टी पद का? मुख्यमंत्री का या पार्टी अध्यक्ष का? सरकार का या संगठन का? प्रशासन का काम व्यवस्था संभालना है, आरती उतारना नहीं। लेकिन अब व्यवस्था और आरती में फ़र्क़ मिट गया है। अफ़सर का चेहरा बताता है कि वह उपस्थित नहीं है, पूर्णरूपेण प्रस्तुत है।
ऑल इंडिया सर्विसेज़ के नियम राजनीतिक तटस्थता की बात करते हैं; अफ़सर को किसी राजनीतिक दल की गतिविधि से दूरी रखने को कहते हैं। पर हमारे समय की प्रतिभा यही है कि नियम वही रहते हैं, उनका अर्थ बदल जाता है। तटस्थता का अर्थ अब यह हो गया है कि अफ़सर हर सत्ता के साथ समान उत्साह से तटस्थ रहेगा। आज जो फूल इस दल को दिए गए हैं, कल परिस्थिति बदलेगी तो वही हाथ दूसरे दल को भी फूल दे देंगे। यह तटस्थता का उच्चतर रूप है। सिद्धांत से नहीं, संभावनाओं से संचालित तटस्थता। ठीक वैसे ही जैसे एक सीएम होता है तो हमारे भीतर उसका डीएनए काम करता है और दूसरा आता है तो हम मीडिया वालों का डीएनए उस तरह बदल जाता है। इसलिए ब्यूरोक्रेसी और मीडिया से मिलकर ही तो हम मीडियोक्रेसी का सृजन करते हैं!
नेहरू और पटेल ने जिस “स्टील फ्रेम” की कल्पना की थी, वह शायद लोहे का ढांचा था। कठोर, निष्पक्ष, संविधाननिष्ठ। अब वही फ्रेम मुलायम हो गया है। उसमें स्टील कम, स्पंज अधिक है। सत्ता का दबाव आता है और वह आकार बदल लेता है। अफ़सर कहता है “मैं सरकार की सेवा कर रहा हूं।” जनता पूछती है,“सरकार की या पार्टी की?” अफ़सर मुस्कराता है, “आजकल दोनों में इतनी निकटता है कि अलग-अलग पहचानना प्रशासनिक कठिनाई है।”
और सच पूछिए तो यह कठिनाई अकेले अफ़सर की नहीं है। पूरा देश इसी भ्रम में जी रहा है। सरकारी कार्यक्रम में पार्टी अध्यक्ष मुख्य अतिथि हो जाते हैं, सरकारी अधिकारी उनका स्वागत करते हैं, सरकारी प्रचार तंत्र तस्वीरें जारी करता है और फिर कहा जाता है, “इसमें राजनीति कहां है?” राजनीति तो अब इतनी सामान्य हो गई है कि दिखाई देना बंद हो गई है। जैसे घर में अगरबत्ती रोज जले तो उसकी गंध पहचान में नहीं आती; वैसे ही सत्ता और दल का मिलन रोज हो तो लोकतंत्र को घुटन भी सुगंध लगने लगती है।
ब्यूरोक्रेसी की असली मर्यादा यही थी कि वह सरकार बदले तो भी अपने चेहरे का रंग न बदले। उसका चेहरा संविधान का होना चाहिए, पार्टी कार्यालय का नहीं। जिला कलक्टर जिले का प्रशासनिक चेहरा है, किसी दल की स्वागत-समिति का सदस्य नहीं। चीफ़ सेक्रेटरी राज्य-व्यवस्था का शीर्ष अधिकारी है, किसी राजनीतिक श्रद्धा-समारोह का संयोजक नहीं। जैसे संपादक का एक कैबिन होता है और उसमें प्रतीक्षारत अफ़सर या नेता हुआ करते थे; लेकिन अब संपादक ब्यूरोक्रेट या अफ़सर के ही नहीं, मंत्री के पीएस के कैबिन में प्रतीक्षारत रहते देखा जा सकता है। अब बताओ कोई रिपोर्टर या सामान्य ब्यूरोक्रेट अपनी स्टील वाली रीढ़ को ले जाकर छुपाए! इसलिए आजकल सब चीज़ों का अर्थ बदल गया है। बड़ा पद जितना बड़ा होता है, झुकने की कला उतनी परिष्कृत हो जाती है। छोटे अफ़सर बेचारे खुलकर झुकते हैं, बड़े अफ़सर गरिमा से झुकते हैं। झुकना वही रहता है, कैमरा एंगल बदल जाता है।
पत्रकारिता और ब्यूरोक्रेसी दोनों का पतन एक-दूसरे को देखकर साहस पाता है। मैं पत्रकार सोचता हूँ, “जब अफ़सर इतने खुले हैं तो हम क्यों संकोच करें?” अफ़सर सोचता है, “जब ये संपादक ही सत्ता के स्वागत में अपनी रीढ़ के स्टील को फोम के फाॅर्म में कर लाया है तो हम कौन-से इस्पात जैसी धातु हैं?” इस तरह लोकतंत्र में नैतिकता सामूहिक अवकाश पर चली जाती है। क़लम कहती है, “मैं स्वतंत्र हूं।” फ़ाइल कहती है, “मैं निष्पक्ष हूं।” और दोनों के पीछे सत्ता कहती है, “शाबाश! आप दोनों मेरे साथ चलिए।” सब कुछ सरकार का है। मुख्य न्यायाधीश हो सकता है तो मुख्य सचिव क्यों नहीं? मुख्य संपादक या मुख्य रिपोर्टर क्यों नहीं?
पर समस्या केवल गुलदस्ते की नहीं है। समस्या उस मानसिकता की है, जिसमें सत्ता के निकट होना योग्यता का प्रमाण बन जाता है। जो अधिकारी अधिक विनम्र दिखता है, वह अधिक उपयोगी माना जाता है। जो पत्रकार अधिक प्रशंसक होता है, वह अधिक “एक्सेस” वाला कहलाता है। जो प्रश्न पूछे, वह कटु है; जो स्वागत करे, वह व्यावहारिक है। जो संविधान की बात करे, वह आदर्शवादी है; जो सत्ता की भाषा समझे, वह परिपक्व है। यही हमारा नया प्रशासनिक दर्शन है, “तटस्थ रहो, पर सत्ता को नाराज़ मत करो; निष्पक्ष दिखो, पर संकेत सही भेजो।”
लोकतंत्र में सबसे ख़तरनाक क्षण वह नहीं होता जब नेता सत्ता का दुरुपयोग करता है। सबसे ख़तरनाक क्षण वह होता है जब संस्थाएं स्वयं अनुमान लगाकर झुकने लगती हैं। कोई आदेश नहीं देता, फिर भी स्वागत हो जाता है। कोई दबाव नहीं डालता, फिर भी पोस्ट हो जाती है। कोई धमकी नहीं देता, फिर भी रीढ़ अपनी सुविधा से छोटी हो जाती है। यही स्वैच्छिक दासता है। उसमें जंजीरें नहीं होतीं, सिर्फ़ अवसर होते हैं।
इसलिए बात किसी एक अफ़सर, किसी एक गुलदस्ते या किसी एक फ़ोटो की नहीं है। बात उस पूरे दृश्य की है, जिसमें लोकतंत्र का तटस्थ चेहरा धीरे-धीरे दलगत मुस्कान में बदल रहा है। पत्रकारिता अगर सत्ता की बारात में शहनाई बन जाए और ब्यूरोक्रेसी स्वागत-द्वार पर माला लेकर खड़ी हो जाए तो जनता को समझ जाना चाहिए कि संविधान भीतर कहीं बैठा खांस रहा है। उसे पानी देने वाला कोई नहीं; क्योंकि सब मंच पर व्यस्त हैं।
और अंत में प्रश्न वही है, जब पत्रकार सत्ता के साथ घी-शक्कर हो जाएं और अफ़सर फूल-माला लेकर खड़े हो जाएं तो जनता किससे उम्मीद रखे? शायद उसी पुराने, धूल खाए जर्जर संविधान से, जिसे अभी तक किसी ने पूरी तरह पार्टी-कार्यालय में जमा नहीं कराया है। वह अब भी कहता है : राज्य जनता का है, दल का नहीं; अफ़सर संविधान का है, संगठन का नहीं; पत्रकार जनता की आंख है, दरबार का आईना नहीं।
लेकिन यह आवाज़ धीमी है। गु़लदस्तों की खु़शबू तेज है। सत्ता को फूल पसंद हैं। और हमारे समय का सबसे बड़ा व्यंग्य यही है कि जिन हाथों को संविधान को उठाना था, वे या तो स्वागत के फूल लिए खड़े हैं या फिर उनकी प्रशस्तियाँ लिखने और प्रसारित करने में व्यस्त हैं!
संघर्ष के प्रतीक, सामाजिक आंदोलन की प्रखर आवाज स्व. कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला जी की पुण्यतिथि पर मैं उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ।
#कर्नल#किरोड़ीबैंसलाअमररहे
संघर्ष के प्रतीक, सामाजिक आंदोलन की प्रखर आवाज स्व. कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला जी की पुण्यतिथि पर मैं उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ।
#कर्नल#किरोड़ीबैंसलाअमररहे
एक-एक शब्द सच और दिल से निकला हुआ
प्राइवेट अस्पतालों में मरीज को जिस तरह नोंचा जाता है, उस पर कोई लगाम नहीं है। परिवार एक ही बार में यहां से गरीब बनकर लौटता है