देश के संसद में OBC के मुद्दों पर इतनी स्पष्टता आख़िरी बार श्रद्धेय शरद जी में देखा था। फिर आज देखा है।
बधाई हो @sanjuydv भैया, विमर्श ऐसे ही बदलते हैं। कभी लालू जी, शरद जी, नेताजी ने सदन में यही किया था, अब आप कर रहें हैं।
देश के केंद्रीय विश्वविद्यालयों से लेकर IIT, IIM जैसे सर्वोच्च अकादमिक संस्थानों में आज भी SC, ST, OBC के आधे से ज़्यादा पद ख़ाली हैं।
हम किसी के ख़िलाफ़ नहीं हैं—हम सिर्फ़ अपने संवैधानिक हक़, अधिकार और हिस्सेदारी की माँग करते हैं।
आज सदन में भाजपा की मंशा जाहिर हो गई, ये लोग SC ST OBC को प्रोफेसर और VC के लायक नहीं मानती!
45 सेंट्रल यूनिवर्सिटी में 38 वाइस चांसलर (कुलपति) सवर्ण जातियों से है।
वंचितों के हक में बोलने वाली चंद आवाजों में से एक सांसद संजय सिंह @SanjayAzadSln जी भाजपा की परत दर परत पोल खोल रहे है।
चोरी के ख़िलाफ़ क़ानून बनने से किसे दिक्कत होगी? जो चोर होगा! अत्याचार के ख़िलाफ़ नियम बनने से कौन तिलमिलायेगा? जो अत्याचारी होगा! भेदभाव रोकने वाले क़ानूनों का विरोध कौन करेगा? जो भेदभाव करता होगा!
अगर कोई कानून किसी वर्ग या समूह के सम्मान को बचाने के लिए बनाया गया है तो इसमें दिक्कत क्या है? जातिगत भेदभाव और पक्षपात हमारे समाज की पुरानी बीमारी है, और पुरानी बीमारियों का इलाज कड़वी दवाइयों से ही होता है.
SC-ST एक्ट ऐसी ही कड़वी दवाई थी जिसका भरपूर विरोध किया गया था. आरक्षण भी ऐसी ही एक कड़वी दवा है, जिसका खूब विरोध होता है…लेकिन मेरा यकीन कीजिए, इन कड़वी दवाइयों ने समाज की सेहत में सुधार ही किया है.
कहीं कुछ लोग इस वजह से तो नाराज नहीं हैं कि वो अब दूसरों को अपमानित नहीं कर पायेंगे? कहीं उन्हें ये तो नहीं लग रहा कि उनका ये अवैध विशेषाधिकार छिनने वाला है?
देश का संविधान समानता के बुनियादी सिद्धांत पर टिका है, लेकिन क्या देश का हर नागरिक बराबर सम्मान पाता है? दरअसल नहीं!
बीते तमाम सालों में ले-देकर एक काम तो ढंग का हुआ है, और कुछ लोग इसका भी विरोध करने लग गए! और विरोध कर भी कौन रहा है! वही लोग जो अखंड भारत के नाम पर स्वास्थ्य, शिक्षा, रोज़गार जैसी बुनियादी चीजों से समझौता करने को तैयार थे…
…वही लोग जो राष्ट्रवाद के नाम पर अपने ही देश के नागरिकों की लिंचिंग तक को सही बताते थे और सरकार से चार कायदे के सवाल पूछने वालों को देशद्रोही कहते थे…आज वही लोग एक ढंग का क़ानून आने पर बिलबिला रहे हैं…क्यों भाई! अब मज़ा नहीं आ रहा क्या?
देश का हर नागरिक जब तक गौरवान्वित, सम्मानित और कॉंफिडेंट महसूस नहीं करेगा, तब तक ये देश मजबूत नहीं होगा…देशवासियों के आत्मसम्मान को बढ़ाने वाला ये क़ानून देशहित में है, और इस क़ानून के ख़िलाफ़ बोलने वाले लोग देशहित के ख़िलाफ़ बोल रहे हैं. उन्हें ये काम नहीं करना चाहिए.
जातिगत स्वार्थों के लिए देशहित से समझौता मत कीजिए भाई! देश को मजबूत बनाने वाले क़ानून का समर्थन कीजिए. सबसे पहले देश है…जाति-बिरादरी बहुत बाद में आती है.
ये कोई मामूली क़ानून नहीं है…18-18 घंटे मेहनत करने के बाद ये क़ानून बनाया गया है…आपको इसका सम्मान करना चाहिए.
(वीडियो में पक्षपात के शिकार स्वर्गीय रोहित वेमुला जी की मूर्ति के साथ उनकी माताजी हैं)
चोरी के ख़िलाफ़ क़ानून बनने से किसे दिक्कत होगी? जो चोर होगा! अत्याचार के ख़िलाफ़ नियम बनने से कौन तिलमिलायेगा? जो अत्याचारी होगा! भेदभाव रोकने वाले क़ानूनों का विरोध कौन करेगा? जो भेदभाव करता होगा!
अगर कोई कानून किसी वर्ग या समूह के सम्मान को बचाने के लिए बनाया गया है तो इसमें दिक्कत क्या है? जातिगत भेदभाव और पक्षपात हमारे समाज की पुरानी बीमारी है, और पुरानी बीमारियों का इलाज कड़वी दवाइयों से ही होता है.
SC-ST एक्ट ऐसी ही कड़वी दवाई थी जिसका भरपूर विरोध किया गया था. आरक्षण भी ऐसी ही एक कड़वी दवा है, जिसका खूब विरोध होता है…लेकिन मेरा यकीन कीजिए, इन कड़वी दवाइयों ने समाज की सेहत में सुधार ही किया है.
कहीं कुछ लोग इस वजह से तो नाराज नहीं हैं कि वो अब दूसरों को अपमानित नहीं कर पायेंगे? कहीं उन्हें ये तो नहीं लग रहा कि उनका ये अवैध विशेषाधिकार छिनने वाला है?
देश का संविधान समानता के बुनियादी सिद्धांत पर टिका है, लेकिन क्या देश का हर नागरिक बराबर सम्मान पाता है? दरअसल नहीं!
बीते तमाम सालों में ले-देकर एक काम तो ढंग का हुआ है, और कुछ लोग इसका भी विरोध करने लग गए! और विरोध कर भी कौन रहा है! वही लोग जो अखंड भारत के नाम पर स्वास्थ्य, शिक्षा, रोज़गार जैसी बुनियादी चीजों से समझौता करने को तैयार थे…
…वही लोग जो राष्ट्रवाद के नाम पर अपने ही देश के नागरिकों की लिंचिंग तक को सही बताते थे और सरकार से चार कायदे के सवाल पूछने वालों को देशद्रोही कहते थे…आज वही लोग एक ढंग का क़ानून आने पर बिलबिला रहे हैं…क्यों भाई! अब मज़ा नहीं आ रहा क्या?
देश का हर नागरिक जब तक गौरवान्वित, सम्मानित और कॉंफिडेंट महसूस नहीं करेगा, तब तक ये देश मजबूत नहीं होगा…देशवासियों के आत्मसम्मान को बढ़ाने वाला ये क़ानून देशहित में है, और इस क़ानून के ख़िलाफ़ बोलने वाले लोग देशहित के ख़िलाफ़ बोल रहे हैं. उन्हें ये काम नहीं करना चाहिए.
जातिगत स्वार्थों के लिए देशहित से समझौता मत कीजिए भाई! देश को मजबूत बनाने वाले क़ानून का समर्थन कीजिए. सबसे पहले देश है…जाति-बिरादरी बहुत बाद में आती है.
ये कोई मामूली क़ानून नहीं है…18-18 घंटे मेहनत करने के बाद ये क़ानून बनाया गया है…आपको इसका सम्मान करना चाहिए.
(वीडियो में पक्षपात के शिकार स्वर्गीय रोहित वेमुला जी की मूर्ति के साथ उनकी माताजी हैं)
व्याख्याता भर्ती 2026 की एग्जाम डेट सामने है लेकिन अभी तक व्याख्याता भर्ती 2024 की प्रक्रियाँ रुकी हुई है
कोई समय सीमा तो तय होनी चाहिए भर्तियों की
जब चुनाव की समय सीमा फिक्स हो सकती है तो भर्तियों की क्यों नहीं ?
#1st_grade_रिजल्ट_जारी_करो@BhajanlalBjp@RPSC1@madandilawar