कभी कभी मन बहुत चाहता है कि रोक ले
पर कदम उठ नहीं पाते हैं
एक आख़िरी बार ज़ुबान चाहती है पुकारना
मगर ज़ख़्म गले में फाँस बन चुभ जाते हैं
…और फिर बहुत देर हो जाती है
तुम्हारी प्यारी सी हँसी
मेरी हर परेशानी का इलाज बन जाती है
तुम्हारी ढेर सारी बातें
मेरी ख़ा���ोशी को भी मात दे जाती हैं
तुम्हारी हर परवाह
मेरी ख़ुद की अहमियत बता जाती है
तुम्हारी बेइंतहा मोहब्बत
मेरी ज़िंदगी को ख़ूबसूरत मुक़ाम दे जाती है