Primeminister of India, Narendra Modi, would not take my question, I was not expecting him to.
Norway has the number one spot on the World Press Freedom Index, India is at 157th, competing with Palestine, Emirates & Cuba.
It is our job to question the powers we cooperate with.
आजादी चरखे से नही आई!!
यह सच है।
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छोटा सा अंदाजा लगायें।
सन 2024 में देश मे 1330 जेलें है, जिनमे 5.25 लाख कैदी है। यह तब, जब उनमे अधिकतम क्षमता से दो-तीन गुने कैदी हैं।
तो सवाल यह कि.सन 1920, या 1940 मे देश मे कितनी जेलें होंगी??
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उन जेलों की कितनी क्षमता होगी?याद रखिए देश की पॉपुलेशन, तब बत्तीस करोड़ थी।
अगर 1% भी लोग जेल जाने को तैयार हो गए तो 32 लाख जेलार्थी होते हैं।
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और जेल जाकर आने वाले से पूछिए। फिल्मों में ही देख लीजिए, जेल मुफ्त छात्रावास की तरह है। आपका खान पान, कपड़े, लत्ते, बीमारी सबकी जिम्मेदारी सरकार की है।
लेकिन जेल जाने से डर नही लगता साहब, उससे खत्म हो जाने वाले मान सम्मान से लगता है।
सजायाफ्ता अपराधी की इज्जत खत्म, कोई नौकरी, छोकरी, व्यापार नही देता। आपके चरित्र पर गिरावट की स्थायी मुहर लग जाती है।तो जेल डराती है।
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पर क्या होगा...
जब जेल जाना इज्जत की बात हो जाये??
उनसे पूछिये, जिनके दादे परदादे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे, जेल गए थे। उनके वंशज दशकों बाद भी उनका नाम सीना फुलाकर बताते हैं।
दरअसल सीना तो उनका पिचका है, जिनका कोई पूर्वज जेल नही गया।
उस कायर सावरकर का नाम सिर्फ इसलिए ही रिंग में उछाला जाता है, क्योकि गैंग का एकमात्र आदमी है, जो जोश जोश में जेल गया था।
तो यह गांधी की करामात थी, जिसने उस दौर में आम आदमी का जेल जाना, इज्जत का सबब बना दिया।
वे दरअसल, जेलें भरना चाहते थे।
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क्योकि दमन गोली से होगा, या जेल से।
अब गोली से अंग्रेज 30 करोड़ लोग मार नही सकते। ये जर्मनी नही था। बंदूक चलाने वाले, यहां फौज और पुलिस में 90% भारतीय थे।
और जेल में तो 50 लाख भी रखना असंम्भव है। 5-10 लाख जेल अभिलाषियों में सरकार की चूलें हिल जाती।
पर इस जज्बे में काम मे बीस साल लगे।
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गांधी स्वयं जेल गए। बड़े कांग्रेसी जेल गए। जेल जाना, बड़प्पन का, नोबल सोल होने का प्रतीक बन गया।
लेकिन जेल के लिए अपराध चाहिए।
कैसा अपराध करें?? क्या हम थाने जलाएं, कलक्टर, एसपी, पटवारी को मारें?
नही, उसमे सजाएं हार्श हैं।
मौत, लंबी जेल, या आजीवन कारावास।
गांधी ने हल्के अपराधों का चयन किया। नमक कानून तोड़ो। गली गली, सड़क में, सरकार को दिखाकर... पुलिस वालों के सामने- नमक बनाओ,
गिरफ्तार हो जाओ।
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धारा 144 का उल्लंघन करो, गिरफ्तार हो जाओ। राजद्रोही भाषण दो, पर्चे लिखो, अखबार चलाओ, गिरफ्तार हो जाओ।
शराब दुकान खुलने मत दो।
मार खाओ, गिरफ्तार हो जाओ।
इसके बीच, पवित्र अहिंसा का संदेश, आपके अपराध को जघन्यता की तरफ न जाने देने के लिए था। यह अंग्रेजो का नही...
आपका सुरक्षा चक्र था।
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और चरखा..
मन मजबूत करने को। सुबह बैठकर प्रार्थना करते है, ईश्वर को समीप पाते हैं। फिर वह दिन भर साथ रहता है।आपकी साइकोलॉजी में बैठा रहता है।
सुबह चरखा चलाइये। गांधी आपके समीप आ जाएंगे। आजादी का जज्बा भीतर प्रविष्ट होगा। दिन भर, आपकी साइकोलॉजी में बैठा रहेगा। आप अंग्रेजो की नकार, और राष्ट्रभाव के सकार में रहेंगे।
द्रोण की मूर्ति की तरह, सुबह जब चरखा आपके सामने होगा। आप एकलव्य की तरह, हर पल आजादी के संधान की प्रैक्टिस करेंगे। लिखने, बोलने, प्रदर्शन में जाने, पिटने, जेल भरने को तैयार होंगे।
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देश मे करोड़ो लोग चरखा चला रहे थे। कपड़ा नही बना रहे थे। तकली के हर घुमाव के साथ वे अपने भीतर स्टील के तार बुन रहे थे।
मजबूत हो रहे थे।
और कुछ बरसों तक चरखा चलाने वाला हर शख्स, खुद गांधी बन चुका था। 1942 में जब पूरी कांग्रेस जेल भर दी गयी..
देश के कोने कोने से गांधी निकल आये। बलिया का गांधी, कोई गया का, पटना के गांधी, मुम्बई के गांधी। हर गाँव, हर शहर, हर प्रदेश,
जिसके सर पर सफेद टोपी,
वही बना था गांधी।
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वो सबसे मजबूत आंदोलन था। उसे रोकने, दिशादर्शन को गांधी मौजूद नही था। तो कई जगहों पर वह दिशा भी भटका।
नेगोशिएशन के लिए लन्दन से मिशन पर मिशन भेजे जाने लगे। गांधी ने इस बार आंदोलन रोकने की अपील न की।
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अब जनसैलाब के सामने,
एक ही दीवार थी- सेना।
लेकिन अंग्रेजो और उनके वफादार भारतीय सैनिकों के बीच की डोर भी टूट गयी। आजाद हिंद फौज के अफसरों पर लाल किला ट्रायल उल्टे पड़े।
नेवी का विद्रोह हुआ।
जब बांध दरकने लगे, और पीछे खड़े सैलाब की ताकत का आपको अंदाजा हो, तो क्या करेंगे?
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भाग खड़े होंगे।।
जाहिर है- अंग्रेज भाग खड़े हुए।
उस सैलाब से डरकर, जो हर इंसान के दिल मे था। जिसने लाखो भारतीयों को जेल और मौत से बिना डरे, लड़ना सिखा दिया था।
आजादी चरखे से नही आई। उस सैलाब से आई। आप समझ सकें, सो समझिये, कि गांधी का चरखा..
कपड़ा नहीं बुनता था जनाब।
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वह सैलाब बुनता था।
🙏❤️
You slave away to clear medical entrance exams, hope they aren’t leaked, beat 99% others, slave in medical college, become doctor, slave in hospital, get paid low wages, work 36 hour shifts, don’t get a place to sleep and worst case you get killed.
Beta doctor banoge?
The worst part of going through life altering trauma is that even at your happiest you’re incapable of being truly happy without the anxiety of losing it all
- बेल्ट खोल दे रामचंदर
- नही साहेब, मैं नही खोल सकता
- खोल दे, बहुत दर्द हो रहा है ..
रामचंदर कैसे खोलता। थोड़ी देर पहले जब हाथ लगाकर देखा था.. तो समझ गया था कि अंतड़ियां खुल गयी हैं।
बेल्ट ने दबा रखा है।
उसने बेल्ट खोल दी तो...
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साहेब बेहोशी के दौरे में चले जाते, फिर सचेत होते। फिर एक बार बुदबुदाये ..
- अच्छा, एक बात मानेगा मेरी
- हां साहेब
- तू बटालियन चला जा। कहना कि पूरी पलटन शहीद हो गयी। लेकिन कोई पीछे नही हटा
- आपको छोड़कर नही जाऊंगा साहब
पर साहब फिर बेहोश हो चुके थे।
अब जेसीओ रामचन्दर यादव ने उन्हें उठाया, और पहाड़ी के नीचे लाने लगा। रास्ते मे उसे अहसास हुआ। मेजर शैतान सिंह दम तोड़ चुके थे।
बर्फ अब भी गिर रही थी।
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राम चन्दर वहां पहुँचा जहां बटालियन का कैम्प था। पर वहाँ बहुत थोड़े लोग थे। जीप में बिठाकर उसे हेडक्वार्टर लाया गया। उसने कहानी बताई..
बारामूला से उन्हें 2 दिन पहले ही चुशुल सेक्टर में भेजा गया था। वहां LAC के पास रेजांग ला पर एक मोर्चा लगाया गया था। कम्पनी वहीं डटी हुई थी।
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18 नवम्बर की भयंकर सर्दी थी। लेकिन भारतीय सैनिक चौकस थे। रात साढ़े तीन बजे कुछ चीनियों को आते देखा गया। मेजर साहब ने रेंज में आते ही उन पर फायर करने का आदेश दिया।
पहला रेला आते ही एक टुकड़ी ने धुआंधार फायरिंग हुई। चीनी गिरने लगे। वे चींटियों की तरह चढ़े आ रहे थे, मरते जा रहे थे। तीन घण्टे तक लड़ाई चली। फिर थम गई।
सुबह साढ़े छह बजे, रोशनी होते ही बंकरों पर गोले बरसने लगे। मानो बरसात हो रही हो। हर पोस्ट, हर बंकर फटने लगी। आधे घण्टे की शेलिंग के बाद नजारा बदल चुका था।
धुआं छंटते ही चीनी फिर आने लगे। हमारी कई पोस्ट खामोश हो चुकी थी। जो बचे थे, गोलियां दाग रहे थे। मेजर शैतान सिंह को भी शेल का टुकड़ा लगा था।
मगर वे पोस्ट से पोस्ट भागते रहे, जवानों का हौसला बढ़ाते। इसी दौरान गोलियों का एक बर्स्ट लगा। गिर गए, राम चन्दर उन्हें उठाकर ओट में ले आया।
खून तेजी से बह रहा था। साहब बेहोश हो गए। फिर होश में आये। तो जानकारी ली। फिर कहा
- बेल्ट खोल दे रामचंदर
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बर्फबारी कुछ दिन बाद रुकी। सीजफायर हो चुका था, मगर बर्फ की मोटी तह हो चुकी थी। सारे निशान मिट चुके थे।
पूरे तीन माह के बाद बाद जब बर्फ पिघली, इनकी तलाश शुरू हुई।। एक चरवाहे को पहाड़ी पर लाशों के ढेर दिखा।
हैवी शेलिंग से उड़े हुए हाथ पैर, हाथों में अब भी बंदूक, कोई यूँ पड़ा है जैसे अभी उठ कर गोली चलाने लगेगा। गुड्डे गुड़ियों की तरह जहां तहां बिखरे शरीर..
कुमाऊं रेजिमेंट ने अपने 113 सैनिकों की लाशें इकट्ठा की। 18 नवंबर 1962 की उस काल रात्रि में चीनी सेना ने भी अपने 1200 से ज्यादा सैनिक खोए। बाद में आई रिपोर्ट्स बताती है कि चीन को सबसे ज्यादा नुकसान रेजांग ला में हुआ था।
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उस रात, चीनियों नें आसपास की कई पहाड़ियों को बिना लड़े कब्जा किया था। भारतीय सेना के कम फौजी होने के कारण उन्हें पीछे हटकर रिग्रूप होने को कहा गया था।
यह आदेश, रेजांगला में मेजर शैतान सिंह भट्टी को भी मिले थे। मगर उनकी कम्पनी में अपने रिस्क पर, पोस्ट न छोड़ना तय किया था।
नतीजा शहादत होगा, वे जानते थे।
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मेजर शैतान सिंह को परमवीर चक्र मिला। रेजांगला में उस पहाड़ी पर एक स्मारक बनाया गया। जहां कुमाऊं रेजिमेंट के 113 वीर अपनी जान दे गए।
स्मारक 60 सालों तक चीन की ओर देखकर फुसफुसाता था- यहां न किसी को घुसने दिया गया, न आने दिया गया है।
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60 साल बाद वह इलाका, आखिरकार बिना लड़े हम हार गए। इलाका "बफर जोन" हो गया है।
स्मारक तोड़ दिया गया। मेजर शैतान सिंह की हार आज हुई है। यह खबर भारतीय अखबारों में नही है।
"You should not be afraid of someone who has a library and reads many books; you should fear someone who has only one book; and he considers it sacred, but he has never read it."
– Friedrich Nietzsche