ब्रेकिंग: यह है असली हिम्मत 🗿
पत्रकार –– आप छात्रों के विरोध-प्रदर्शन के बारे में क्या कहना चाहते हैं?
एक्टर जॉनी लीवर 🔥 –– "मैंने वे दृश्य देखे और मुझे दुख हुआ; छात्रों को तकलीफ में देखकर मेरा मन खराब हो गया। सरकार को उनकी बात सुननी चाहिए।"
आमिर, अक्षय और अमिताभ को इससे सीखना चाहिए 🫡
तुम हालातों की भट्टी में
जितना भी मुझको झोंकोगे
तप-तप के सोना बनूंगा मैं
तुम मुझको कब तक रोकोगे 🔥
‘जन-नायक’ की रगों में शहीदों का खून है !
@RahulGandhi जिंदाबाद 👊🏻
राहुल का धरना ही दोपहर 3:30 बजे शुरू हुआ, परीक्षा 11 से 2 बजे के बीच थी, और आपका बेटा आधे घंटे फिर भी लेट हो गया।
अगर 11 बजे की परीक्षा में आपका बेटा लेट पहुंचा तो यह ट्वीट कर कहीं आप इनडायरेक्टली दिल्ली पुलिस की ट्रैफिक व्यवस्था पर सवाल तो नहीं खड़े कर रहे?
फिर से भस्मासुर?
E20 फ्यूल से खराब हुई मारुति की कार, अब कंपनी कस्टमर को नई कार देगी!
रायपुर कंज्यूमर कोर्ट ने एक ग्राहक की शिकायत के बाद Maruti Suzuki को निर्देश दिया है कि वह 45 दिनों के भीतर शिकायतकर्ता की ख़राब कार वापस लेकर उसी मॉडल की नई E20 फ़्यूल पावर्ड कार उपलब्ध कराए.
अगर कंपनी ऐसा नहीं करती है, तो उसे वाहन की क़ीमत 18.29 लाख रुपये, आरटीओ शुल्क 1,86,850 रुपये और बीमा प्रीमियम 34,644 रुपये, यानी कुल 20,50,494 रुपये लौटाने होंगे.
इसके साथ ही मानसिक क्षति के लिए एक लाख रुपये तथा वाद-व्यय के रूप में 10 हज़ार रुपये का भुगतान भी करना होगा.
दसअसल, रायपुर के रहने वाले डॉक्टर प्रेमराज देब्ता ने जून 2024 में मारुति कंपनी की ग्रैंड विटारा स्ट्रॉन्ग हाइब्रिड जेटा प्लस एसयूवी ख़रीदी थी. जो एक शाम अचानक से बंद हो गई.
गाड़ी को कंपनी के सर्विस सेंटर ले जाया गया, जहां बताया गया कि पेट्रोल में मिलावट के चलते ऐसा हुआ है. ग्राहक का आरोप था कि कार खरीदते समय उन्हें यह नहीं बताया गया कि कार का इंजन E20 पेट्रोल के लिए पूरी तरह उपयुक्त नहीं है.
पूरी खबर: https://t.co/IUTk7MgQss
A New Fear in Modi: Chhatron Ki Goonj
भाजपा सरकार ने 17 जुलाई को माननीय नेता प्रतिपक्ष श्री @RahulGandhi जी के "छात्रों की गूंज" कार्यक्रम के लिए पहले स्वीकृत परेड ग्राउंड की अनुमति निरस्त कर दी है। लेकिन छात्रों की आवाज़ को दबाया नहीं जा सकता। अब यह ऐतिहासिक छात्र-युवा संवाद कार्यक्रम रेसकोर्स स्थित बन्नू स्कूल मैदान में आयोजित होगा। सभी छात्र-युवाओं, कांग्रेस कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों से आग्रह है कि पहले से कहीं अधिक संख्या और उत्साह के साथ कार्यक्रम में पहुंचें। आइए, शिक्षा, रोजगार, पेपर लीक और युवाओं के भविष्य के सवालों पर अपनी लोकतांत्रिक आवाज़ को और बुलंद करें। "छात्रों की गूंज" हर हाल में गूंजेगी।
#छात्रोंकीगूंज #ChhatronkiGoonj
सारे सवाल राहुल से ही क्यूँ! यह मक्कारी कब तक चलेगी !!
हम कभी नही पूछते कि जब देश के आर्थिक विपत्ति में होने के कारण प्रधानमंत्री जी ने जनता से विदेश यात्रा न करने की अपील थी, तो यह जिम्मेदारी जनता की ही क्यों है. वे ख़ुद 8000 करोड़ के विमान में वे बार बार विदेश यात्राएँ क्यों कर रहे हैं, क्यों 45 हज़ार NRIs को चार्टेड विमान से उनके स्वागत के लिये बुलाया गया, वह धन कहाँ से आया?
एक व्यक्ति जिस पर देश की जिम्मेदारी है वह न शिक्षा पर बोल रहा, न पैट्रोल एथेनॉल पर, न मंदिर चोरी पर, सारे ज्वलंत मुद्दों से मुँह चुराकर जनता के पैसे से सिर्फ़ विदेश में घूम रहा है, उसे हम हर सवाल से बरी करे रखते हैं, मगर हमारी पैनी नज़र राहुल के एक एक क्रिया कलाप पर बनी रहती है.
महामानव सत्ता के हर जंजाल और सवाल से परे हैं
मगर सत्ता का हरेक सुख उन्हें चाहिए.
जब देश के लोग सड़क पर हैं
देश का प्रधानमंत्री और गृहमंत्री कहाँ हैं?
स्कूल का कोई रिकॉर्ड नहीं है,
शादी का कोई सबूत नहीं है,
पिता की कोई तस्वीर नहीं है,
30 - 35 साल भिक्षा कहां मांगी पता नहीं है,
वड़नगर में चाय कहां बेची, मालूम नहीं है,
डिग्री छुपाकर रखी है , कहां रखी है ये मालूम नहीं है,
लेकिन मफलर संभालकर रखा है भाई ने 😂
मेरा जन्म 1997 में हुआ, उसी साल जिस साल 5 जुलाई को पार्टी की स्थापना हुई।
छोटी थी, जब कभी-कभी पापा घर के आए मेहमानों के सामने अक्सर दो ही चीज़ें पूछा करते थे~“बेटा, अंग्रेज़ी में कुछ बोलकर दिखाओ” और दूसरा, “बिहार की मुख्यमंत्री कौन हैं?” मैं हमेशा गर्व से कहती, “Rabri Devi is the CM of Bihar.” गर्व का भाव इसलिए क्योंकि एक महिला मुख्यमंत्री थीं और गर्व इसलिए भी क्योंकि अपने आस-पास ही देखती थी कि छोटी उम्र में बच्चियों की शादी कर दी जा रही है, पढ़ाने-लिखाने में पूंजी सिर्फ़ बेटों पर खर्च की जा रही है उस वक़्त एक महिला को CM देखना एक बच्ची के कोमल मन को शीतलता देता था।
जब JNU पहुँची, तो धीरे-धीरे राजनीति और विचारधाराओं को समझने की शुरुआत हुई। जब बटलर, सिमोन द बुवार, रोज़ा पर्क्स, रोज़ा लक्ज़मबर्ग, हन्ना अरेंड्ट, सावित्री बाई, माया एंजेलू इत्यादि को पढ़ रही थी, तब पता चला कि बिहार में लालू जी ही वे नेता हुए जिन्होंने महिलाओं को महावारी के दौरान दो दिन का अवकाश दिया, जो दुनिया में बहुत कम देशों में है। जिस जातिगत सच्चाई और आर्थिक बेबसी से निकली थी, ख़ुद को राजद से जोड़ पाई और छात्र राजद से जुड़ी और राष्ट्रीय प्रवक्ता का सफ़र तय किया, जिसमें सबसे बड़ी भूमिका मेरे नेता तेजस्वी जी की रही।
हमेशा इस बात पर गर्व महसूस करती हूँ कि स्थापना दिवस से ही पार्टी ने महिला CM दिए। राबड़ी जी को जब मौक़ा मिला, पहली बार बिहार का बजट सरप्लस हुआ। जब से पार्टी की स्थापना हुई, तब-तब जब-जब हमारी सरकार रही, चाहे मंत्रिमंडल हो, विधायक हों, संसद हो या राज्यसभा, हर जगह सामाजिक और आर्थिक, दोनों स्तर पर विविधता देखने को मिली। राष्ट्रीय जनता दल की स्थापना के बाद इसके पहले 3 प्रदेश अध्यक्ष कमल पासवान जी, उदय नारायण चौधरी जी और पीताम्बर पासवान जी दलित वर्ग से रहे। अल्पसंख्यक समुदाय से अब्दुल बारी सिद्दीक़ी जी रहे। पिछड़े वर्ग से रामचन्द्र पूर्वे जी रहे, जगदानंद सिंह जी रहे और अभी अतिपिछड़े वर्ग से मंगनीलाल मंडल जी हैं। राष्ट्रीय जनता दल इस देश का पहला दल है जिसने 2019 में अपने सांगठनिक चुनावों में कुल 45% आरक्षण लागू किया, 28% पिछड़ों-अतिपिछड़ों के लिए और 17% दलितों-आदिवासियों के लिए।
राजद ने शोषितों की सोई हुई चेतना को झकझोरने का काम किया, वही काम जो कर्पूरी ठाकुर जी ने, जगदेव प्रसाद जी ने, कांशीराम जी ने किया। वही, जिसे लालू जी ने मज़बूती से धरातल पर उतारा। राष्ट्रीय जनता दल ने विचारों से लैस कर वंचितों को सशक्त किया। अन्याय का प्रतिकार करना सिखाया और हक़ व आत्मसम्मान के लिए लड़ना सिखाया। राजद करोड़ों लाचार, वंचित, उपेक्षित, बेबस लोगों की पार्टी है, जो उनकी आकांक्षाओं के लिए काम करती है।
जिस बिहार में मेरा जन्म हुआ, वहीं दो तरह के CM देखे- एक घुटना टेक मुख्यमंत्री और दूसरे सीना तान मुख्यमंत्री। एक परिस्थितिओं के मुख्यमंत्री दूसरे संभ्रांत वर्चस्वादी ताकतों को चुनौती देने वाले मुख्यमंत्री।
नीतीश जी हमेशा वर्चस्वशाली शक्तियों के आगे घुटने टेकते रहे, वहीं लालू जी उस संघर्ष के प्रतीक हैं, जिसमें लड़ाई आर-पार की रही और विचारों से कोई समझौता नहीं हुआ, और उस धारा को तेजस्वी जी आगे बढ़ा रहे हैं। ये कारवाँ निरंतर बढ़ता रहे।
राष्ट्रीय जनता दल ज़िंदाबाद रहे।
समाजवाद ज़िंदाबाद रहे।
सामाजिक न्याय ज़िंदाबाद रहे।
ये है दिल्ली का इंजीनियरिंग मार्वल द्वारका एक्सप्रेसवे। एक ही बारिश में अंडरपास पानी से भर गया। अंडरपास को बंद करना पड़ा।
ये वही प्रोजेक्ट है जिसमें तय क़ीमत के हिसाब से 18 करोड़ रुपया प्रति किलोमीटर खर्चा आना था लेकिन बाद में अज्ञात कारणों से ये क़ीमत बढ़ाकर 250 करोड़ रुपये प्रति किलोमीटर कर दी गई थी। अब माननीय एथेनॉल मंत्री श्री धृतराष्ट्र गडकरी जी बताएं कि इस प्रोजेक्ट में किस ठेकेदार ने कितना खाया और आपको कितना प्रतिशत मिला?
आजमा फसाद बाका!!
औरंगजेब ने 40 की उम्र में गद्दी हथियाई, और वह 89 की उम्र में मरा। उसने मुगल साम्राज्य का अभूतपूर्व विस्तार किया, जिसकी सीमाएं, सुदूर दक्षिण से अफगानिस्तान तक थी। समृद्ध, शक्तिशाली और प्रभावशाली साम्राज्य!
दरअसल, जिस सोने की चिड़िया, या अखण्ड भारत का जिक्र हम सोशल मीडिया पर देखते है, वह कभी साकार हुआ, तो औरंगजेव के दौर में..
और औरँगजेब के मरते ही खण्ड खण्ड भी हो गया। इसका कारण- तख्त, या तख्ता!!
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औरँगजेब के 5 बेटे, 4 बेटियां थी।
पहला- मोहम्मद सुल्तान। उत्तराधिकार के युद्ध मे उसने बाप का नही, उसके बड़े भाई शुजा का साथ दिया। तो 18 साल बाद, जेल में एड़ियां रगड़ते मरा।
दूसरे बेटे, अकबर से आप परिचित है, अगर छावा देखी हो।साहसी, योग्य, और बाप की नीतियों से असहमत। उसने मराठों, और राजपूतों से मिलकर औरँगजेब को हटाने की कोशिश की।
हारा। जान बचाकर ईरान भाग गया।
एक बेटी, जैबुन्निसा कवियत्री थी। भाई अकबर से बड़ा प्रेम था। सो उसे कैद कर लिया गया। उसे अकबर के लिए जासूसी के आरोप में, जेल हुई। दुख भरी शायरी करते हुए वह 15 साल बाद चल बसी।
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तीसरा बेटा मुअज्ज्म। वह भी ताकतवर और बुद्धिमान था। सो वह भी बाप के खिलाफ था। जेल में डाल दिया गया। तब छूटा जब औरँगजेब की मृत्यु हो गयी।
चौथा आजम था, जो औरंगजेब की मौत के बाद बादशाह बना। लेकिन जेल से निकले मुअज्जम ने उसे मारकर गद्दी हथिया ली।5वां बेटा कामबख्श लड़ने आया। मुअज्जम ने उसे भी मार गिराया।
उसने जब बहादुरशाह (प्रथम) के नाम से गद्दी सम्हाली, तब 65 साल का था। 70 का होते होते चल बसा।
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बाबर से हुमायूं, और फिर अकबर से जहांगीर तक उत्तराधिकार काफी साफ सुथरा रहा।
फिर शाहजहां ने गद्दी की लड़ाई में भाई शहरयार को मारा। एक नजीर खींच दी। तो उसके बेटे औरँगजेब ने 3 भाइयो मुराद, शुजा और दारा शिकोह को मारा। बल्कि बाप को भी कैद किया।बड़ी नजीर खींच दी।
और इसी नजीर के डर के साये में जीता रहा। जानता था, कि उसके बेटे भी, वही करेंगे। उसे जेल में डालकर, मारकर गद्दी हथिया लेंगे।
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खुद के बूढ़े होने, और बच्चो के जवान होने के साथ, ये डर बढ़ता गया। 60 का होते होते उसने बच्चो की कड़ी खुफियागिरी शुरू कर दी। शक होने पर जेल में डाल देता।
जो बच्चे, दमदार थे- विद्रोही हुए, जेल गए।निकम्मे और सलामत बचे रहे। यह फसल अंत समय मे औरँगजेब को साफ दिख रही थी।आजम शाह और कामबख्श को लिखे पत्र गवाह है।
वह लिखता है- "आजमा फसाद बाका"
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याने मेरे बाद सिर्फ तबाही है,
फसाद है, अराजकता है।
पछतावे से भरा वह लिखता है- मैंने राज्य का कोई सच्चा शासन नही किया। मैं अकेला आया, और अकेला जा रहा हूँ। मेरे बाद साम्राज्य, सेना और अधिकारियों का बुरा हाल होगा।
इन पत्रों में वह पुत्रो को समझाने की कोशिश कर रहा है कि मिलकर रहना। ऐसी सीख, जिसके उलट नजीर, वह अपने बच्चो के सामने खुद था।
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बहरहाल, बहादुरशाह, 5 साल तक आखरी बादशाह हुआ, जो खुदमुख्तार था। मगर उम्रदराज और अनुभवहीन था। तो अधिक से अधिक, सैयद बंधुओ पर निर्भर होता गया।
जो दरबारी ब्यूरोक्रेट थे। 1712 में बहादुरशाह की मौत के बाद, वे राजकुमारों को जेल में डलवाने, जेल से भगाने, एक के हाथ दूसरे को दूसरे को मरवाने की रवायत जारी रखे।
और 1719 तक चार बादशाह आये, और मरे। यही चला, जब तक उन्होंने मोहम्मद शाह (रंगीला) को जेल से निकालकर, गद्दी पर बिठाने की गलती न कर दी।
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रंगीले की जिंदगी की उपलब्धि यही थी, कि वह सैयद भाइयो से ज्यादा चालाक निकला। बादशाह बनते ही, एक सैय्यद भाई को जहर दिया। दूसरे की हत्या करा दी। जब गद्दी सुरक्षित हो गयी, मरते दम तक मौज की।
अगले 30 साल, जी के अरमान भरपूर निकाले। नाच गाना, उत्सव और औरतों में डूबा रहा। इलाके हाथ से निकलने लगे। नादिरशाह चढ़ आया। लेकिन बादशाह विकास के पोस्टर छपवाकर आत्ममुग्ध बने रहे।
मुगल सल्तनत का जनाजा निकल गया।
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सत्ता अनंत नही होती।
आपके बाद कौन आयेगा, कैसी शासन वृत्ति रखेगा, उसके लिए आप क्या नजीर बिठा रहे है, वह बहुत महत्वपूर्ण है।
तो बाबर से हुमायूं से अकबर से जहांगीर तक, एक एक ईंट जोड़कर, साम्राज्य बनता है। पर बाप शाहजहां की नजीर, औरँगजेब फॉलो करता है। और अपने बच्चो के लिए ऐसी नजीर छोड़ जाता है,
जिसका नतीजा सिर्फ फसाद है।
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दिल्ली में फिर से उत्तराधिकार का युद्ध है। शासन के योग्य प्रतिद्वंद्वी तो राजाजी ने बहुत पहले ही निपटा दिए थे। अब अगली पीढ़ी के कमीनो के बीच रार ठनी है।
मुकदमे, षड्यन्त्र, कुटिल चाल चली जा रही है। राज्य की किसी को परवाह नही। देश गर्त में गिरता जा रहा है। 78 साल के बूढ़े, लाचार, आत्ममुग्ध औरँगजेब को अगर पढ़ना आता है,
तो दीवार पर लिखी इबारत पढ़े।
"आजमा फसाद बाका"