ग़ैरों से उम्मीद करें क्या,अपनों के ठुकराये लोग
फूलों से घबरा जाते हैं काँटों से टकराये लोग
ख़ुशहाली में अक्सर आँखें धोखा खाती रहती हैं
बदहाली में खुल जाते हैं,अपने और पराये लोग
शीशे के महलों में रहकर,पत्थर से याराना है
जाने कैसे रिश्तों की बैठे हैं रस्म निभाये लोग
#FolloMe
अपनी-अपनी खोल दुकानें बैठे हैं बाज़ारी सब
सच पे पर्दा डाल रहे हैं, झूठ के कारोबारी सब
सच को सच कह पायेंगे कुछ इनसे मत उम्मीद करो
चुप रहने की क़ीमत पाकर बैठे हैं दरबारी सब
जाने कैसी सनक चढ़ी है,आज सियासतदानों को
दोनों हाथों बाँट रहे हैं, नफ़रत बारी-बारी सब
@DrKumarVishwas कहीं रोली लगे अक्षत,मिठाई याद करती है
बहन-भाई के रिश्तों की दुहाई याद करती है
बड़ी शिद्दत से चौखट पर, महादेवी के हाथों में
कोई राखी निराला की कलाई याद करती है
कहीं रोली लगे अक्षत,मिठाई याद करती है
बहन-भाई के रिश्तों की दुहाई याद करती है
कहीं पर भोर से रक्खी हुयीआकुल प्रतीक्षामें
कोई राखी निराला की कलाई याद करती है
अमृतपान कराया सबको ख़ुद केवल विषपान किया है
सबकी नेकी करते-करते बस अपना नुक़सान किया है
रिश्ते नाते प्यार वफ़ा सब केवल सीढ़ी भर होते हैं
ख़ुदगर्ज़ों पर अक्सर हमने ऐसा अनुसंधान किया
सदा हमारे पथ पर आकर उसने काँटे ही बोये हैं
फूल बिछाकर जिसकी राहों को हमने आसान किया है
प्रतिवादी था जो कल तक वो वादी भी हो सकता है
कोई भी विश्वासी इक दिन बाग़ी भी हो सकता है
आँधी,लहरें,मझधारों को नाहक मत बदनाम करो
कश्ती बह जाने का कारण माझी भी हो सकता है
कुआँ का जल स्वयं क्या अंजुरी के पास जाता है
ज़रूरतमंद ही अक्सर किसी के पास जाता है
चली जाती हैं कोसों-कोस मिलने स्वयं ही नदियाँ
समंदर क्या कभी कोई नदी के पास जाता है
#follower#poetry#highlight#everyone
जाने कहाँ पे किस ख़ुशी को ढूँढ़ते रहे।
यूँ ज़िन्दगी में ज़िन्दगी को ढूँढ़ते रहे।
तुमको तलाश थी कि कोई देवता मिले,
हम आदमी में आदमी को ढूँढ़ते रहे।
कारण रहा नज़रिया हमारी शिकस्त का,
हर बाँस में जो बाँसुरी को ढूंढ़ते रहे।
~देवेश दीक्षित "देव"
@DeveshDixitDev7