बस्तर में बह रही यह नदी खून की वजह से नहीं, बल्कि बस्तर की लोहे की खदानों से निकलने वाली आयरन ओर ( कच्चा लोहा ) का लाल मिट्टी (वेस्ट मटेरियल ) है की वजह लाल है।
बस्तर के खदानों से निकलने वाला कच्चा लोहा ( आयरन ओर ) देश और विदेशों की फैक्ट्री में जा रहा है, पर बस्तर का वही खजाना ( आयरन ओर ) बस्तर वासियों के लिए श्राप बन चुका है। बस्तर से निकलने वाला उपयोगी आयरन ओर का पैसा देश और राज्य के विकास में लग रहा है, पर बस्तर के लोगों को मिलती है तो सिर्फ बची हुई लाल मिट्टी, जो बस्तर के आदिवासियों के लिए काल बन चुकी है। उसी हानिकारक लाल मिट्टी ( वेस्ट मटेरियल ) से बस्तर के जल-जंगल-जमीन बर्बाद हो रहे हैं। लाल मिट्टी नदी और नालों को प्रदूषित कर रहे हैं। पीने के पानी के स्रोतों को प्रदूषित कर रहे हैं। जहां-जहां यह लाल मिट्टी डाली जा रही है वहाँ की जमीन बंजर हो रही हैं। जंगलों के पेड़ सूख कर मर रहे हैं। खेती की उपजाऊ जमीन बंजर हो रही है। कई जगहों पर लाल मिट्टी का दलदल बन चुके हैं जहां फंसकर ग्रामीणों के गाय और बकरियों की मौत हो चुकी हैं। स्थिति यह है कि बस्तर के जलसों तो में या लाल मिट्टी इतनी घुल चुकी है कि उन्हें पीने का साफ पानी तक उपलब्ध नहीं हो पता है। लाल पानी पीने और लाल धूल सांस में जाने से स्थानीय ग्रामीणों में त्वचा रोग, पेट की बीमारियां, किडनी की समस्याएं और फेफड़ों के गंभीर रोग (सिलिकोसिस) तेजी से फैल रहे हैं।
स्थिति ये है कि बस्तर से निकलने वाला आयरन ओर ( कच्चा लोहा ) दूसरे राज्यों में ले जाया जाता है और कच्चा लोहा निकालने के बाद जो लाल मिट्टी ( वेस्ट मटेरियल ) बच जाती है वो वापस छत्तीसगढ़ में डंप करने भेज दिया जाता है। एक पाइप से लौह अयस्क प्रेशर के साथ दूसरे राज्य भेजा जाता है, वहीं दूसरी पाइप से उसी अयस्क का वेस्ट मटेरियल वापस बैलाडीला लौटा दिया जाता है। इस वेस्ट को खपाने के लिए बस्तर लौह खदानों में काम करने वाली कंपनियों ने कई जगह बड़े-बड़े तालाब खुदवा दिए हैं, जिनमें लाल मिट्टी नुमा आयरन वेस्ट भरा गया है। यह वेस्ट अब दलदल का रूप ले चुका है। इस खराब लाल मिट्टी भी वापस छत्तीसगढ़ को भेजा जाता है जो बस्तर के जंगल को नष्ट कर रही है और हमारी कृषि की उपजाऊ जमीन को बंजर बना रही है। जो लाल मिट्टी हमारे बस्तर के जल स्रोतों को प्रदूषित कर रही, उस लाल मिट्टी के दलदल में फंसकर पशुओं की जान जा रही है। यानी मुनाफा बाहर का और नुकसान बस्तर का विनाश बस्तर का और रोजगार दूसरे राज्य के लोगों को।
बस्तर से केंद्र सरकार को सिर्फ लोहा चाहिए, बस्तर से हर साल भारत सरकार और रेलवे हजारों करोड़ रुपये कमाता है। NMDC को सबसे ज्यादा लोहा बस्तर से मिलता है, देश के आयरन और स्टील इंडस्ट्री को चलाने में बस्तर के लौह खदानों का बहुत बड़ा योगदान है, लेकिन बस्तर का विकास करने के लिए कोई भी प्रयास नहीं किया जाता। केंद्र सरकार द्वारा हजारों करोड़ का आय देने के बाद भी बस्तर के विकास के लिए पैसा नही दिया जाता।
छत्तीसगढ़ की जनता और खासकर बस्तर के लोगों को छत्तीसगढ़ के नेताओं से यह जरूर पूछना चाहिए कि बस्तर की बर्बादी पर यहाँ के नेताओं का मुँह क्यों नहीं खुलता?
@vishnudsai@ArunSao3@vijaysharmacg@bhupeshbaghel@TS_SinghDeo@INCChhattisgarh@DrCharandas@DeepakBaijINC@BJP4CGState@KedarKashyapBJP@KiranDeoBJP@drramansingh@brijmohan_ag@nmdclimited@CmdNmdc@thelens_in
बस्तर की आज की यह खबर उनके लिए है, जिन्हें लगता है कि खदान खोलने से आदिवासियों का विकास होता है.
राज्य सरकारों को इस पर एक अध्ययन कराना चाहिए कि पिछले 50-60 सालों में खदानों के कारण आदिवासी इलाकों पर क्या प्रभाव पड़ा है? आदिवासियों की जिंदगी कितनी बदली है?
"Dalit-Adivasi students are becoming doctors with -40 marks" you've probably heard this line before. Here's the truth: the General category is a flat zero out of 800. And this exact rule existed in 2023 too, with zero outrage back then. Full data breakdown in the video.
चंद्रशेखर रावण पहली बार सांसद बन गए तो पोंगा पंडित का दर्द ज्यादा बढ़ गया है !!
चार शंकराचार्य हमेशा ब्राह्मण बनेंगे वह अच्छा है मगर एक दलित अपने दम पर सांसद बन जाएगा तो पोंगा लोगों के पेट में दर्द हो जाता है !!
@BhimArmyChief@AzadSamajParty
संघियों का बस एक काम है न पढ़ेंगे और पढ़ने देंगे और जो लोग सवाल उठाये उन्हें पीटेंगे!!
आज जयपुर में CJP और अन्य समूहों के लोग जब जयपुर के एक स्कूल में पहुंचे तब ये हुआ था।
वहाँ ये सब राष्ट्रवाद के श्रेणी म आथे, छत्तीसगढ़ म कोनो छत्तीसगढ़िया और छत्तीसगढ़ी भाषा के बात कर ही त ओला क्षेत्रवाद कहीके ट्रोल करे जाही। गाली दिए जाही।
हमर ईहा के जिम्मेदार मन ल ये सब करे बर हिम्मत चाही सर, जेन हय नई।
कुछ गधों, अन्धभक्त, चमचों को यह समझ में नहीं आता👇
मीडिया को हमेशा विपक्ष में रहना चाहिए क्योंकि उसका प्रमुख कार्य सत्ता और समाज के बीच एक संतुलन बनाए रखना है। सत्ता में बैठे लोगों के ग़लत कार्यों और नीतियों की आलोचना करके मीडिया जनता की आवाज़ को सशक्त करता है और सरकार को जवाबदेह बनाता है। अगर मीडिया सत्ता के पक्ष में हो जाए तो जनहित की अनदेखी हो सकती है और तानाशाही प्रवृत्तियों का उभरना संभव है। विपक्ष में रहकर मीडिया निष्पक्ष रिपोर्टिंग और जांच करता है जिससे लोकतंत्र मजबूत होता है और नागरिकों को सटीक जानकारी मिलती है। इसका उद्देश्य जनहित और पारदर्शिता को बनाए रखना है।
शिक्षक भर्ती में फर्जीवाड़ा सामने आने के बाद भी कार्रवाई अगर कागजों तक सीमित रह जाए तो सवाल उठना स्वाभाविक है। नवभारत की रिपोर्ट के मुताबिक तीन जांचों में फर्जीवाड़ा साबित हुआ तीन डीईओ बदले गए लेकिन डीपीआई के स्पष्ट आदेश के 21 माह बाद भी संबंधित शिक्षिका पर कार्रवाई नहीं हुई। आखिर ऐसा कौन-सा दबाव या प्रभाव है जिसके आगे विभागीय आदेश भी बेअसर नजर आ रहे हैं?
मामला और गंभीर तब हो जाता है जब जांच में नियुक्ति को फर्जी पाए जाने की बात सामने आई और बर्खास्तगी, वेतन वसूली तथा कानूनी कार्रवाई के निर्देश दिए गए। इसके बावजूद कार्रवाई लंबित क्यों है? क्या अधिकारियों की जिम्मेदारी तय होगी? क्या स्थापना शाखा की भूमिका की भी जांच होगी? सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि दस्तावेजों के आधार पर फर्जी नियुक्ति साबित हो चुकी है तो विभाग अब तक निर्णायक कदम क्यों नहीं उठा पाया? नियम आम कर्मचारी के लिए हैं या प्रभावशाली लोगों के लिए भी समान रूप से लागू होते हैं?
देश में ‘दिमाग़ी नक़्सल’ कोई नहीं है , बस ये समझिये कि ये ‘जेरेंटोक्रेसी’ है - जवान देश पर बूढ़ों का क़ब्ज़ा 🎯
भारत देश की औसत उम्र 28 साल है, मगर भारत का शासन तंत्र बूढ़ा है. सत्ता हो या विपक्ष बड़ी कंपनियों के मालिक और बोर्ड बुजुर्ग लोग बैठे हैं. नौकरशाही के शीर्ष पर अनुभवी मगर उम्रदराज बूढ़े अफ़सर हैं.
एक जवान देश और एक बूढ़ा नेतृत्व पूरे तंत्र में दिखता है.
मंत्रिमंडल तो और भी बुजुर्ग है, जहाँ औसत उम्र 60 साल है. सबसे युवा मंत्री 43 साल का है और बुजुर्ग 73 साल का. यानि जो देश चला रहे हैं, वह देश की औसत जनता की आयु से 28 साल बड़े हैं. यह भारत की गवर्नेंस का सबसे भयावह जनरेशन गैप है.
भारतीय कंपनियों के प्रमोटर्स, बोर्ड्स, तमाम संस्थाओं के मुखिया, सामाजिक नेतृत्व में बैठे लोग हर जगह वही पैटर्न है.
एक जवान देश है, मगर हर ऊंची कुर्सी पर एक बुजुर्ग बैठा है. पार्कों में निकलिए, ट्रेन में सफर करिए, प्लेन में सफर करिए, सोसाइटी में देखिए. हर तरफ जेरेंटोक्रेसी है.
एक बूढ़ा भारत, देश के उस भविष्य का फैसला कर रहा है जिसके बारे में वह खुद कुछ नहीं जानता.
#WhatsApp_अंकलों_वाला_देश
मोदी सरकार किस तेजी से सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स से कंटेंट हटवा रही है।
उसका आंकड़ा देखिए 👇🏼
• पिछले 5️⃣ महीने में सरकार ने Meta और YouTube जैसे प्लेटफ़ॉर्म को 1.95 लाख ब्लॉकिंग ऑर्डर दिए
• यानी- हर 68 सेकंड पर एक ब्लॉक ऑर्डर दिया गया
• एक दिन में औसतन 1,275 ब्लॉक ऑर्डर
मतलब- इधर सरकार ने ऑर्डर भेजा और उधर लोगों का कंटेंट उनके पेज से उड़ गया।
VIP ड्यूटी में तैनात पुलिसकर्मी पुलिस वाहन के अंदर ही सिगरेट पी रहे हैं। ऊपर से वीआईपी काफिले के कारण जनता को रोका जा रहा है। जनता के वोट से जीतने वाले ये नेता लोग VIP बन जाते हैं और इनको वोट देकर जिताने वाली जनता तुच्छ हो जाती।
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री और गृहमंत्री इस मामले में चुप क्यों है??
मुंबई की बाइक राइडर रिद्धि ठक्कर की मौत के बाद आखिर गृहमंत्री विजय शर्मा ने अपने प्रायोजित पीआर से पल्ला क्यों झाड़ लिया ??
दरअसल, अबूझमाड़ में वुमन बाइक राइडर को बुलाकर छत्तीसगढ़ सरकार स्वतंत्रता दिवस सेलिब्रेट करना चाहती थी और यह दिखाना चाहती थी कि बस्तर कितना सुरक्षित है।
लेकिन अनुभवहीन इवेंट ऑर्गनाइजर्स के साथ मिलकर इन्होंने बाइक राइडर बिरादरी और देश की महिलाओं के जान से खिलवाड़ किया।
आखिर धमतरी कांकेर बस्तर के घने जंगल रूट पर ये ट्रूप रात 3.00 बजे सफ़र पर क्यों था?
इनके साथ एंबुलेंस या टो व्हीकल क्यों नहीं थे?
जिन बाइक का उपयोग किया जा रहा था उनकी सुरक्षा फिटनेस जांच आखिर क्यों नहीं हुई?
रिद्धि की मौत के बाद मुख्यमंत्री गृहमंत्री कहां छिप गए और इस आयोजन से पल्ला क्यों झाड़ लिया?
क्या इस सरकार के पीआर के चक्कर में रिद्धि की बलि चढ़ गई?
पर छत्तीसगढ़ के शिक्षा मंत्री जी का कहना है कि छत्तीसगढ़ में तो शिक्षकों की कोई कमी नहीं है। सरकार ने युक्तियुक्तकरण का चूरन भी यही कहते हुए दिया था कि जिन स्कूलों में शिक्षक नहीं वहां पर शिक्षक भेजे जाएंगे, पर स्कूलों की वास्तविक स्थिति यह है कि स्कूल में शिक्षक न होने के कारण बच्चों से पैसे लेकर शिक्षक रखे जाएंगे।
गृहमंत्री @AmitShah जी, भ्रष्टाचार के समाप्ति की भी कोई तारीख तय नहीं हो सकती है क्या?
बस्तर के ऐसे विकास की कल्पना तो नहीं की है जनता ने।
Video From @BastarTalkies
‘जो कहोगे, वही पद देंगे। महामंडलेश्वर बना देंगे। जगतगुरु भी बना सकते हैं। बस 20 लाख रुपए का व्यवहार करना होगा। आश्रम खोलना है, जमीन अखाड़े के नाम पर होगी। देखरेख और संचालन आप ही करना।’
ये ऑफर रिपोर्टर को देश के तीन बड़े अखाड़ों में ऊंचे पदों पर बैठे महंतों ने अलग-अलग मुलाकातों में दिया। रिपोर्टर ने खुद को अमेरिका से लौटा IT प्रोफेशनल बताया। कहा कि पिछले 15-20 साल से अमेरिका के क्यूपर्टिनो में नौकरी की। वाइस प्रेसिडेंट बना। खूब पैसा कमाया।
उज्जैन और मेरठ में जमीन भी है। अब कॉर्पोरेट लाइफ से मन भर गया। सब छोड़कर धर्म की राह पर चलना है। सामान्य साधु नहीं, सीधे महामंडलेश्वर बनना है। इसके लिए पैसा या जमीन कुछ भी दे सकते हैं।
पड़ताल जूना, निर्वाणी और निर्मोही अखाड़े में हुई। तीनों अखाड़ों के महंत-श्रीमहंत से फोन पर बात की। मिलने का वक्त तय हुआ। नासिक और हरिद्वार में मुलाकात हुई। हर अखाड़े की महामंडलेश्वर बनाने की अपनी-अपनी शर्तें और प्रक्रिया है, लेकिन भास्कर इन्वेस्टिगेशन में पता चला कि ये अखाड़े पैसों और जमीन के बदले महामंडलेश्वर का पद दे रहे हैं।