मनुष्यों की श्रेष्ठता का पैमाना बुद्धि का उपयोग है न कि देही का जोर....तो जो क्रांतिकारी DNA की श्रेष्ठता की बात करते हैं वो जरा इधर भी ध्यान दें....राजस्थान में कांग्रेस की सरकार बनी तो सीएम या तो अशोक गहलोत होंगे या फिर सचिन पायलेट.....मगर आपने कभी देखा कि कोई माली या गुर्जर युवक बीजेपी का उग्र विरोध कर रहा हो या जेल जा रहा हो....भजनलाल को हटाने के लिए G के टाँके तुड़वा रहा हो ....फिर जाटों पर ऐसी ���्या आफ�� आ गई जो भजनलाल का विरोध कर रहे हैं .....कांग्रेस सरकार बनती है तो सबसे पावरफुल मंत्री जैन बनते हैं मगर कोई जैन भी कहीं बीजेपी को हराने की माथाफोड़ी करता नजर नहीं आता .....अभी जिन मोडों की जमीन बचाने के लिए किसानों के बच्चे जेल गए हैं तो क्या किसी मोडे ने भी पलट कर मदद की है या किसी मोडे ने घरवालों को फोन करके ही दिलासा दी हो ....कुल मिलाकर जाट मुझे तो श्रेष्ठ नहीं बल्कि मूर्ख नस्ल लगती है !!
#जाट #Jat
भारत की विकास यात्रा को समझना हो तो चौधरी चरण सिंह जी के विचारों को समझना होगा। उनका दृढ़ विश्वास था कि राष्ट्र की समृद्धि का मार्ग गांवों, खेतों और खलिहानों से होकर गुजरता है। उन्होंने किसान को केवल अन्नदाता नहीं, बल्कि भारत की आर्थिक और सामाजिक शक्ति का केंद्र माना।
किसान मसीहा, भारत रत्न चौधरी चरण सिंह जी की पुण्यतिथि पर उन्हें सादर ���मन।
#ChaudharyCharanSingh #BharatRatna
आज चौधरी चरण सिंह जी की पुण्य तिथि पर @RLDparty के अध्यक्ष श्री @jayantrld जी राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में चौधरी चरण विचार मंच को पुनः शुरू करने का सराहनीय काम करने का निर्णय लिया है !
"राह दिखाता जो जन-जन को,
लोगों का विश्वास सो गया!
तुम क्या सोये ज���ुना तट पर,
गांवों का इतिहास सो गया !!
तेरी गर्जन ललकारों से,
सत्ता की दीवारें हिलती!
झोपड़ियां खुशियों से फूली,
शोषण की मीनारें हिलती !!
जिससे ईर्ष्या थी देवों को,
दुर्लभ वो इन्सान सो गया!
जमना बोली मेरे तट पर,
आज गांवों का भगवान सो गया !!"
भारत रत्न, भूतपूर्व प्रधानमंत्री, किसान मसीहा चौधरी चरण सिंह की 39वीं पुण्यतिथि पर शत्-शत् नमन… 💐💐💐
#ChoudharyCharanSingh
ज़रूरी है अब भाजपा की मर्यादा की मास्टरक्लास!
राजस्थान की राजनीति में भाषा की मर्यादा का नया विश्वविद्यालय खुल गया है। हुआ यह कि आरएलपी नेता हनुमान बेनीवाल ने सरकार या उसके कुछ मंत्रियों को “मूर्ख-वूर्ख” जैसा कुछ कह दिया। बस, फिर क्या था! भाजपा के कई नेता एक साथ भाषाशास्त्री, संस्कृताचार्य और नैतिकता-प्रवक्ता बनकर मैदान में उतर आए। सबने एक सुर में बेनीवाल जी को समझाया कि राजनीति म��ं भाषा की मर्यादा होनी चाहिए, शब्दों का चयन संयमित होना चाहिए और सार्वजनिक जीवन में बोलचाल का स्तर गिरना नहीं चाहिए। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ तो बहुत ही भावुक हो रहे थे कि आख़िर भाषा का इतना पतन कैसे हो सकता है!
यह पाठ अभी चल ही रहा था कि सहकारिता मंत्री गौतम दक का कथित वायरल ऑडियो सामने आ गया, जिसमें भाषा की ऐसी पुष्पवर्षा बताई जा रही है कि हिन्दी के शब्दकोश ने भी शायद संकोच में पन्ने मोड़ लिए होंगे। अब प्रश्न यह है कि जब भाजपा के पास भाषा-संस्कार का ऐसा जीवंत, प्रायोगिक और लोकभाषाई मॉडल उपलब्ध है तो हनुमान बेनीवाल को अलग से नसीहत देने की ज़रूरत ही क्या है?
बेनीवाल जी को चाहिए कि वे तुरंत गौतम दक जी से मर्यादित भाषा की एक क्लास लें। पाठ्यक्रम का नाम रखा जा सकता है : “सार्वजनिक जीवन में शब्द-संयम: सिद्धांत और व्यवहार।” पहले अध्याय में बताया जाए कि “मूर्ख” कहना असं���दीय है; लेकिन कथित रूप से गाली-प्रधान संवाद अगर अपने ही खेमे से निकले तो वह शायद “भावावेश”, “व्यक्तिगत बातचीत” या “संदर्भ से काटी गई क्लिप” कहलाता है।
राजनीति में यही सुंदरता है। विरोधी बोले तो भाषा बिगड़ती है, अपना बोले तो भावनाएं उमड़ती हैं। विपक्ष का वाक्य अपराध है, सत्ता का अपशब्द परिस्थिति है।
इसलिए बेहतर होगा कि भाजपा अब ��ेनीवाल को डांटने के बजाय अपने भीतर एक “भाषा-शुद्धि शिविर” लगाए। उद्घाटन गौतम दक करें, अध्यक्षता वे नेता करें जो कल तक मर्यादा पर प्रवचन दे रहे थे, और मुख्य अतिथि प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह को सार्वजनिक सभा में साला कहने वाले वे महान नेता हों, जो अपने पीछे मर्यादित भाषा की एक लंबी परंपरा छोड़कर गए हैं और खुद गवर्नर हो गए हैं। ऐसे में यह तो बनता है कि श्रोता हनुमान बेनीवाल और उन जैसे लोग हों ताकि ��े सीख सकें कि राजनीति में शब्दों की असली मर्यादा वही है, जो पार्टी देखकर तय होती है।
@hanumanbeniwal @madanrrathore
ये तो सच है कि हनुमान बेनीवाल असभ्यता के साथ अपनी बात कह देते हैं लेकिन इस बार उन्होंने लोकतांत्रिक हदों में रहकर बयान दिया है। उसी पर हो - हल्ला मच गया।
हनुमान बेनीवाल ने मुख्यमंत्री जी को "��ूर्ख" कह दिया है। उनके इस बयान पर हनुमान बेनीवाल को सभ्यता और भाषा का स्तर सिखाने वाले लोग क्या यह भूल गए हैं कि हमारी लोकतांत्रिक क्षमताएं क्या हैं ?
शासक को मूर्ख या फिर महामूर्ख कह देना कब से असभ्यता हो गई ?
अरे भाई आज तो हम लोकतांत्रिक भारत गणराज्य में बात कर रहे हैं। जनता में इतना कह देने की क्षमता तो मुगल काल में भी थी। जिस मुगल काल में हाथियों के पैरों के नीचे कुचल देने की सजाएं इनायत हो���ी थीं उस दौर में भी जहांदार शाह को "लम्पट मूर्ख" कहा गया था। मुगल काल में भी जनता इतनी निडर थी कि लालकिले के नीचे से पतंग के कागज पर बादशाह को मूर्ख लिखकर भिजवाती थी। मोहम्मद बिन तुगलक को बुद्धिमान मूर्ख कहा गया था।
शासक या नेता को मूर्ख कह देना तो कोई असभ्यता हो ही नहीं सकती और ना भाषा के स्तर में गिरावट की बानगी है। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने "अंधेर नगरी" नाटक यूं ही नहीं लिख दिया।
जॉर्ज बुश को किसी ��क्त जनता और मीडिया ने जी भरकर "इडियट" कहा था। बोरिस जॉन्सन को बफून (मसखरा) कहने वाला भी मीडिया ही था।
फिर हनुमान बेनीवाल ने अलग और नया क्या कह दिया कि एक डेमोक्रेटिक स्टेटमेंट पर बिना बात ही मीडिया और जनता भैराणा मुद्दे को छोड़कर डायवर्ट हो रही है।
10.09 सेकेंड की रफ्तार… और भारत ने
लिख दिया इतिहास!
भारतीय स्प्रि���टर गुरिंदरवीर सिंह ने 100 मीटर दौड़ में नया राष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाकर पूरे देश को गौरवान्वित किया है। अब दुनिया देख रही है, भारत सिर्फ दौड़ नहीं रहा, इतिहास रच रहा है।
#GurindervirSingh @IndiaSports @Media_SAI
#IndianAthletics #NationalRecord #FederationCup
कार्यकर्ताओं का तो फिर भी समझ आ जाता है। दिग्गज नेताओं की भी खबर नहीं ली जा रही है।
विराटनगर के पूर्व विधायक और RSS के दिग्गज नेता रहे फूलचंद भिंडा बीते काफी समय से लकवे में हैं। फूलचंद भिंडा उन नेताओं में शुमार रहे हैं जिनकी भैरोसिंह शेखावत के दौर में तूती बोलती थी। 40 साल से ज्यादा RSS में विभिन्न पदों पर काम किया। आज के नेता किसी वक्त टिकिट के लिए उनके आगे - पीछे होते थे। जीवनभर बेदाग रहे और संगठन की ��ोर थामकर जिंदगी गुजार दी।
लेकिन अब वे जिस हालत में है वो बताने के लायक नहीं है। बीजेपी का एक भी नेता अब तक उनकी खबर लेने घर नहीं पहुंचा। उन्हें छोटे - छोटे काम के लिए भी परेशान होना पड़ रहा है।
क्या ही कहें और क्यों कहें क्योंकि कोई सुनने वाला नहीं है...
@BJP4Rajasthan @BhajanlalBjp @madanrrathore
श्री @ashokgehlot51 जी सही ही कहते हैं कि मुख्यमंत्री की कुर्सी वे तो छोड़ना चाहते हैं लेकिन CM की कुर्सी ही उन्हें नही छोड़ रही है!
आज की @rpbreakingnews की ख़बर और सामाजिक संगठन भी इसकी पुष्टी कर रहे हैं !!
आम और आम आदमी चूसा ही जाता है। चूसकर फेंक दिया जाता है। आम का चूसा जाना सकर्मक क्रिया है और आम आदमी को चूसना राजनीतिक क्रिया है।
इस देश में एक यक्ष प्रश्न था कि क्या प्रधानमंत्री जी आम चूसकर खाते हैं ?
लेकिन मुख्यमंत्री जी ने आम चूसे जाने के मसले पर कोई प्रश्न बाकी नहीं छोड़��। सरेआम आम उठाया और चूस फेंका। लेकिन आम और आम आदमी में एक बुनियादी फर्क है। आम पकने के बाद चूसा जाता है और आम आदमी चूस - चूस कर पका दिया जाता है।
अब तो आम भी इतने महंगे हो गए हैं कि उसे आम आदमी नहीं चूस सकता और आम आदमी इतना सस्ता हो चुका है कि रोज ही चूसा जा रहा है - बजट के बहाने, योजनाओं के बहाने, चुनावों के बहाने, राजनीतिक दलों और जातियों के बहाने। और न जाने किस - किस बहाने। आम के चूसे जाने का एक मौसम होता है, ऋतु होती है, तापमान होता है लेकिन आम आदमी का क्या ? हर मौसम, हर सिस्टम और हर तापमान में उसे चूसा जा रहा है। पेट्रोल, गैस, महंगाई, रोजगार जैसे मसले मौसम देखकर क्यों नहीं आते ? ताकि आम आदमी भी कभी "आम" की बराबरी कर पाए।