साहब जी, मैं कुम्हार हूँ,
मिट्टी को मेहनत से सींच कर गढता हूँ,
विश्व में विज्ञान का, विश्व की प्राचीन सभ्यता की पहचान हूँ,
दुनिया के अंधेरों को मिटाता हूँ,
दीपक का आकार हूँ
सदियों से, शहरों और गांवों में शीतल जल,
का भंडार हूँ
21 वीं सदी में मैं ही दरकिनार हूँ,
मै सर्जनहार हूँ,
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मैं एक कुम्हार हूँ,
इस धरती का सृजनकार हूँ।
जब मनुष्य जीने के लिए लड़ रहा था,
तब मैं मिट्टी का रंग बदल रहा था।
उसने पाया कहाँ ऐसा जीवन,
जब मेरी कलाकृति का हुआ उदबोधन।
हजारों करोड़ वर्षों तक वो अंधकार में रहा,
चाक चला मेरा चमक उसकी आँखों में रहा।